शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

कैसे उतरूँ पार- कुंडलिया छंद

गूगल से साभार










कैसे उतरूँ पार


भवसागर में हूँ फँसी,  आओ तारणहार|
मुझे राह सूझे नहीं,  कैसे  उतरूँ  पार|
कैसे उतरूँ पार,  बहुत ही गहरा सागर|
पाना चाहूँ थाह, भर दो भक्ति से गागर|
बस तुम में ही आस, सुनो हे नटवर नागर|
खेना मेरी नाव, पार हो यह भवसागर||


ऋता शेखर 'मधु'


पहली बार ये छंद लिख रही हूँ|त्रुटियों के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ|
विद्वतजनों का मार्गदर्शन मिले तो आभार होगा और मैं इनमें सुधार कर पाऊँगी|

20 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत भक्तिमयी प्रस्तुति...

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  2. भाव विभोर होगए..बहुत सुन्दर..

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  3. बहुत सुन्दर ऋता जी...
    भक्ति भाव का मधुर एहसास हुआ..

    सस्नेह.

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  4. भक्ति रस में डूबा , बढ़िया कुंडलिया छंद.

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  5. भवसागर से जीवन रुपी नैया को पार लगाने के लिए परमात्मा से भक्तिपूर्ण गुजारिश|
    क्या खूब कुंडलिया छंद है!

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  6. वाह! बहुत ही सुन्दर भक्तिपू्र्ण प्रस्तुति....
    आपकी छंद लिखने की कला विकसित हो|
    शुभकामनाएँ|

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  7. भवसागर पार करने वाले तारणहार ..बहुत सुंदर भक्तिमय रचना .

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  8. भक्तिभाव से ओत-प्रोत सुंदर छंद।

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  9. जीवन भवसागर के पार होने की कोशिश स्वयं को अभिव्यक्त करती सार्थक पोस्ट है बधाई |

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  10. बस तुझ में मेरी आस,सुनोहे गिरधर नागर
    खे देना मेरी नाव,पार हो जाए ये भवसागर,

    ऋता जी,...मेरी राय ये टीक रहता...

    वाह!!!!!बहुत सुंदर प्रस्तुति ,अच्छे भाव

    NEW POST....
    ...काव्यान्जलि ...: बोतल का दूध...
    ...फुहार....: कितने हसीन है आप.....

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  11. बेहतरीन ...जो भाव था उसे सटीक शब्दों में ढाला

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  12. आभार, मेरा प्रोत्साहन उद्धत करने हेतु|

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  13. सुन्दर भाव ...छंद का अपना ही सौंदर्य है

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  14. सुन्दर अर्चना प्रभू के चरणों में ...
    अच्छा छंद ...

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  15. आदरणीया ऋता शेखर मधु जी
    सस्नेहाभिवादन !

    विलंब से पहुंचा हूं, तदर्थ क्षमा चाहता हूं ।
    …लेकिन सच में आनंद आ गया आपकी इस प्रविष्टि को पढ़ कर …
    त्रुटि कोई नहीं … इतना अच्छा लिखा है आपने ।
    मुझे बहुत पसंद आई यह कुंडली !
    अगर मैं लिखता , तो नाममात्र परिवर्तन के साथ ऐसे लिखता…
    भवसागर में हूँ फँसी, आओ तारणहार !
    मुझे राह सूझे नहीं, कैसे उतरूँ पार !?
    कैसे उतरूँ पार, बहुत ही गहरा सागर |
    कभी बुझे ना प्यास , भरो भक्ति से गागर ॥
    बस तुम में ही आस, सुनो हे नटवर नागर !
    खेना मेरी नाव, पार हो यह भवसागर ॥


    आप चाहें तो इन मामूली परिवर्तनों को देखलें :)

    हार्दिक शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  16. उत्साहवर्धन के लिए आप सभी आदरणीय विद्वतजनों का हार्दिक आभार|आगे भी सद्भाव बनाए रखने की कृपा करें|

    आदरणीय राजेन्द्र सर,

    आप तो छंद विधा के उत्कृष्ट रचनाकार हैं|
    मेरी रचना में कोई त्रुटि नहीं,यह जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है|इस ब्लॉग पर मैंने घनाक्षरी और हरिगीतिका भी पोस्ट किया है जो लेबल में दिख रहा है|आप यदि उन छंदों पर अपनी बहुमूल्य राय देने की कृपा करें तो बहुत आभार होगा|

    सादर
    ऋता शेखर 'मधु'

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