मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

मनवाँ उनका थिरक रहा...





मनवाँ उनका थिरक रहा
मिल गया इस लोक में
वो पथ
जिसे
किसी ने
सजाया सँवारा
सुवासित फूलों को बिछाया
बस कदम धर चल दिए
श्रम के मोती जरा न बहे

खुश किस्मत हैं वो
मिल जाते जिन्हें
बने बनाए रास्ते
किन्तु उस पथ की तो सोचो
जो ले जाएँगे उस लोक
उसे तो स्वयं ही है सजाना
सुकुसुमित विचार है बिछाना
सद्‌भावों के इत्र छिड़क
प्यार की गंगा है बहाना
उस पथ का हमराही न कोई
बस साथ चलेंगे
अपने ही कर्म अपने ही धर्म
निश्छलता और निःस्वार्थता
स्वर्ग द्वार के दो पट नाम
इन्हें यहाँ है अपनाना
फल वहाँ है पाना|

ऋता शेखर मधु

12 टिप्‍पणियां:

  1. खुश किस्मत हैं वो
    मिल जाते जिन्हें
    बने बनाए रास्ते....वाह: बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  2. निश्छलता और निःस्वार्थता
    स्वर्ग द्वार के दो पट नाम
    इन्हें यहाँ है अपनाना
    फल वहाँ है पाना|... यही सार है जीवन का

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर अभिव्यक्ति.. यही है जीवन का सार । मेरे ब्लॉग पर नई पोस्ट पर आपका स्वागत है ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर रचना,बेहतरीन प्रस्तुति,.....

    RECENT POST...फुहार....: रूप तुम्हारा...

    उत्तर देंहटाएं
  5. निश्छलता और निःस्वार्थता
    स्वर्ग द्वार के दो पट नाम
    इन्हें यहाँ है अपनाना
    फल वहाँ है पाना|


    सही सीख है ....शुभकामनायें आपको !

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच कहा है उस लोक जाने का सभी का रास्ता अलग अलग ही है ... और स्वयं ही उसका निर्माण करना होता है ... सुन्दर भावपूर्ण रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. कल 17/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सही कहा आपने ...वहां तो अपने कर्मों की गति ही हमें पहुंचाएगी ......बहुत सुन्दर !

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है...कृपया इससे वंचित न करें...आभार !!!