शुक्रवार, 18 मई 2012

चिराग तले अँधरा



आज विद्यालय में बहुत चहल पहल थी.ग्यारहवीं कक्षा का आज से क्लास शुरू होना था.विद्यालय में बहुत सारे दूसरे स्कूलों से नए नए बच्चे आ रहे थे.स्कूल के अनुशासन से छूटे हुए बच्चों के लिए थोड़ी थोड़ी आजादी का दिन था.लड़कों के लिए वही साधारण ड्रेस था-फैंट शर्ट का किन्तु लड़कियों ने थोड़ी सीमा लांघी थी|दुपट्टे वाली ड्रेस  का स्थान जीन्स और छोटे छोटे टॉप ने ले रखा था|
आदर्श बाबू  उस विद्यालय के वरिष्ठ शिक्षक थे.वे दूर से ही सभी बच्चों को देख रहे थे और परखने की कोशिश कर रहे थे.कुछ लड़कियों के लिबास उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रहे थे.उस विद्यालय ने ड्रेस कोड नहीं लगाया था इसलिए बच्चों को अपनी पसंद के कपड़े पहनने की छूट थी.दूसरे दिन नोटिस बोर्ड पर एक नोटिस लगा था जिसमें लड़कियों के लिए सलवार कुर्ता और दुपट्टा पहनना अनिवार्य रखा गया था.कुछ लड़कियों ने इस नियम का पालन किया किन्तु कुछ विरोधी प्रकृति की लड़कियों ने बात नहीं मानी और छोटे टॉप में ही आईं.इसके लिए आदर्श बाबू ने शिक्षिकाओं को कहा कि वे उन लड़कियों को समझाएँ.फिर सब कुछ सही हो गया.
एक दिन एक लड़की स्कूल में आई.कहीं से भी उस लड़की के कपड़े शालीन नहीं कहे जा सकते थे.उसे अपने पापा से कुछ काम था इसलिए वह प्रिंसिपल की अनुमति पर आफिस में ही बैठ कर इन्तेजार करने लगी.कुछ देर में अन्य शिक्षक शिक्षिकाएँ भी अपने अपने क्लास से छुट्टी पाकर ऑफिस में आ गए.उस लड़की के कपडों को लेकर कानाफूसी हो ही रही थी तभी आदर्श बाबू आते दिखे.सभी इस बात के लिए तैयार हो गए कि उस लड़की की खैरियत नहीं है.किन्तु उस लड़की ने आदर्श बाबू को पापा कहकर सम्बोधित किया.सबकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं.इसे आदर्श बाबू ने भी समझा. सबके मन में एक ही सवाल था-पूरे विद्यालय को शालीन कपड़े पहनने का पाठ पढ़ाने वाले आदर्श बाबू अपनी ही बेटी को क्यों नहीं सिखा सके?

ऋता शेखर मधु

13 टिप्‍पणियां:

  1. पर उपदेश कुशल बहुतेरे....बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  2. सवाल उठना लाजमी है कि आदर्श बाबू अपनी ही बेटी को क्यों नहीं सिखा सके?
    बहुत सुंदर रचना,..अच्छी प्रस्तुति

    MY RECENT POST,,,,काव्यान्जलि ...: बेटी,,,,,
    MY RECENT POST,,,,फुहार....: बदनसीबी,.....

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  3. सुन्दर प्रस्तुति |
    बधाई स्वीकारें ||

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  4. पर उपदेश कुशल बहुतेरे कहावत ऐसे लोगों के लिए ही है ... वैसे ये भी होता है कि सही बात कहनेवाला अपनों से ही हारता है

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  6. दूसरों को उपदेश देना बहुत सरल है ... अच्छी लघुकथा

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  7. बहुत अच्छी सन्देश परक कहानी जिसके घर शीशे के हों उसे दूसरो के घरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए

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  8. मधु जी, आज ही ऑफिस से निकलते वक़्त दोस्तों से चर्चा चल रही थी की आजकल के बच्चे कितने नालायक हैं... माता पिता कितना त्याग और मेहनत करके उनके भविष्य की फिक्र कर रहे हैं लेकिन बच्चे अपने माता-पिता की कितनी उपेक्षा कर रहे हैं...
    मैं इस बात से कटाई इत्तेफाक नहीं रखता की आप अपनों को शिक्षा नहीं दे सके तो किसी और को भी मत दो...

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  9. आ० लोकेन्द्र जी
    आपने बिल्कुल सही कहा|सही शिक्षा देना हम बड़ों का कर्तव्य है|इस कहानी में मैं सिर्फ यह कहना चाह रही थी कि हम अपने ही घर में कितने बेबस हो जाते हैं.जो सीख हम सबको देते हैं उसे अपने ही घर में लागू नहीं करवा पाते और हार जाते हैं.
    सादर

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  10. ओह ....सच में उपदेश देना और स्वयं पर लागू करना ...दो नितांत फर्क बातें हैं ...!
    अच्छा लिखा है ...!

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  11. सही में चिराग तले अँधेरा...:)

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  12. वाह...बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति...

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