रविवार, 26 अगस्त 2012

बहू, घर चलो...


http://www.rachanakar.org/2012/08/51.html
रचनाकार पर कहानी प्रतियोगिता आयोजन में मेरी यह कहानी शामिल की गई है|
मैं अनु जी एवं वंदना गुप्ता जी की आभारी हूँ जिन्होंने रचनाकार पर इस कहानी को अपनी बहूमूल्य राय से सुशोभित किया है|आप भी पढ़ें...
बहू, घर चलो...

रात बीतने को आई किन्तु वकील साहब की आँखों में नींद नहीं थी| सारी सात वे अँधेरे में ही कमरे की छत की ओर आँखें गड़ाए ताकते रहे| कभी करवट बदलते, कभी उठकर बैठ जाते| लग रहा था बहुत ही उधेड़बुन में थे| जिन्दगी में अक्सर दोराहों का सामना हो जाता है जिनमें किसी एक रास्ते को चुनना बहुत कठिन लगता है| किन्तु निर्णय तो लेना ही पड़ता है उन्हें, जो सभ्य और संस्कारी होते हैं| जिनमें दूरदर्शिता नहीं होती उनके सामने कभी दोराहे नहीं आते...जीवन जैसे चल रहा है, बस ठीक है|
    वकील साहब का एक सुखी परिवार था| सुंदर पत्नी और शादी के लायक एक बेटा था जिसे वे बहुत प्यार करते थे| गाँव में अपनी खेती-बाड़ी थी, प्रैक्टिस भी खूब चलती थी| धनाढ्‌यों में गिनती होती थी उनकी| महल जैसा घर और घर में नए मॉडल की दो गाड़ियाँ थीं, एक उनके लिए और दूसरी उनके सुपुत्र के लिए| वकील साहब दिन भर किताबों में उलझे रहते| बेटे की देख-रेख का सारा भार उनकी पत्नी पर था| नवाबों की तरह वह पल रहा था| जब भी पैसे की जरूरत होती माँ इन्कार नहीं करती| बेटे से सख्ती नहीं कर पाती थीं| नतीजा यह रहा कि वह बिगड़ैल नवाब के रूप में जाना जाने लगा| किसी तरह से उसने ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की थी| आकर्षक डीलडौल, घुँघराले बाल, गोरा चिट्टा था| बचपन से कभी अभाव नहीं जाना था इसलिए पैसे को पानी की तरह बहाता था| गुस्सा तो नाक पर ही रहता| जब वह किसी तरह की कोई नौकरी में नहीं जा सका तो वकील साहब ने बिजनेस में लगा दिया| यहाँ वह सफल हुआ, क्योंकि उस बिजनेस में दबंग की ही जरुरत थी|
   इतने धनी-मानी घर में अपनी बेटी को देने के लिए कई पिता उत्सुक थे| खूब रिश्ते आने लगे| अन्त में हर प्रकार से जिसे योग्य समझा गया वह निहारिका थी| लड़की की सारी खूबियों से सुशोभित...अर्थात लम्बी , गोरी, घर के कामकाज में निपुण, सुशील और आज्ञाकारिणी| सभी खुश थे| वकील साहब की पत्नी बड़े ही शौक से शादी की खरीदारियाँ कर रही थीं| निश्चित समय पर विवाह संपन्न हुआ| घर में खूब रौनक आ गई| इस घर में आकर निहारिका भी अपने भाग्य सराह रही थी|
  सुंदर पत्नी पाकर वकील साहब का बेटा भी प्रसन्न था| हमेशा दोस्तों के साथ घूमने के बजाय घर में ही रहता| किन्तु अपने बेटे के स्वभाव को लेकर वकील साहब सदा सशंकित रहते| बहू की हर जरूरत और सुख सुविधा पर नजर रखते| बहू भी सास-ससुर की सेवा में तल्लीन रहती| समय बीता...वकील साहब और उनकी पत्नी दादा-दादी बने| पोते को गोद में ले फूले न समाते थे| दिन बीतने लगे|
एक दिन वही हुआ जिसका डर था...सभी लोग डायनिंग टेबल पर बैठे खाना खा रहे थे| बेटे ने निहारिका को गरम पराठा लाने को कहा...तभी मुन्ना रोने लगा| निहारिका उसे संभालने चली गई| नवाबज़ादे ने इसे अपनी तौहीन समझा और खाने की प्लेट जमीन में पटक दिया| माता-पिता तो उसके गुस्से से वाकिफ़ थे ही, किन्तु निहारिका के लिए पति का यह रूप नया था| वह सहम गई और रोने लगी| वकील साहब ने भी खतरे की घंटी को समझा| किसी तरह से बहू को समझाया| निहारिका बच्चे के कारण उसपर अधिक ध्यान नहीं दे पाती थी| इस कारण वह रईसजादा अधिकतर समय घर के बाहर बिताने लगा और बुरी  संगति में पड़ने लगा|
  उसके बाद इस तरह की घटनाएँ अक्सर घटने लगीं| मैके के अच्छे संस्कार लेकर आई थी, इसलिए घर को अखाड़ा नहीं बनाना चाहती थी| वह हरसंभव चुप रहने का प्रयास करती| निहारिका की चुप्पी वकील साहब के बेटे की हिम्मत बढ़ाती गई| अब वह कभी- कभी निहारिका पर हाथ भी उठा देता| यह निहारिका को बहुत बुरा लगता फिर भी सास- ससुर का ख्याल करके चुप रह जाती क्योंकि उनसे उसे कोई शिकायत नहीं थी|
  गुस्सैल तो वह था ही, किन्तु हर हमेशे  मार-पीट का माहौल निहारिका को बरदाश्त नहीं होने लगा| अब तो वह किसी किसी रात घर भी नहीं आता था| वकील साहब की चिन्ता बढ़ती जाती थी| बेटे को समझाना चाहा, लेकिन उसका मन तो कहीं और उलझ गया था| वह निहारिका की ओर देखना भी पसन्द नहीं करता था| एक बार निहारिका का मन हुआ कि वह सब कुछ छोड़छाड़ कर वापस मैके चली जाए किन्तु संस्कार यह कदम उठाने की इजाजत नहीं दे रहे थे|
  एक दिन तो हद ही हो गई...वह नशे में धुत लड़खड़ाता हुआ आया और पत्नी को घर से निकल जाने का आदेश दिया| वह सकते में आ गई| उसने ससुर जी की ओर देखा| वकील साहब ने उसे समझाने की कोशिश की किन्तु वह कहाँ समझने वाला था| उसने उनके साथ भी बदतमीजी से बात की| निहारिका कुछ बोलना चाह रही थी तो नवाबज़ादे ने उसे जोर से धक्का मारा| अचानक हुए इस प्रहार को वह झेल नहीं पाई| गोद में मुन्ना भी था| दोनों ही औंधे मुँह गिर पड़े| उसने किसी तरह मुन्ने को तो बचा लिया किन्तु खुद उसका सर जमीन से टकरा गया| सर से खून निकलने लगा| मुन्ना बेतहाशा रोए जा रहा था|  माँ ने कुछ कहना चाहा तो उन्हें भी चुप कर दिया| परिस्थिति बेकाबू हो गई थी| वकील साहब बेटे की इस हरकत से बहू के सामने शर्मिन्दगी महसूस कर रहे थे| समय पर बेटे पर अंकुश न लगाने का परिणाम सामने था| उन्होंने डॉक्टर को बुलाया और बहू की मरहम पट्टी करवाई| डॉक्टर से उन्होंने झूठ बोल दिया कि वह सीढ़ियों से गिर गई है|
  अभी तक निहारिका ने अपने मैके में कुछ नहीं बताया था| किन्तु वह पढ़ी-लिखी लड़की थी| जहाँ तक हो सका उसने सहनशीलता दिखाई...किन्तु कब तक? यह सवाल उसके जेहन में बार-बार उठने लगे| मुन्ने के भविष्य का सवाल भी सामने था|
     उसने घर छोड़ने का फैसला ले लिया| अश्रुपूरित नजरों से उसने सास-ससुर से विदाई ली| वकील साहब के पास कहने के लिए कोई शब्द ही नहीं थे|
   निहारिका पिता के घर के दरवाजे पर खड़ी थी| उसे विश्वास था कि पिता जी उसका साथ देंगे| काँपते हाँथों से उसने कॉलबेल बजाया| दरवाजा पिता ने ही खोला| बेटी के सर पर बँधी पट्टी देखकर उनका कलेजा मुँह को आ गया| अनुभवी आदमी थे, पल भर में ही सारा माजरा समझ गए| बेटी को गले से लगा लिया|पिता का स्नेहिल स्पर्श पाते ही वह फूट पड़ी| उसने रोते-रोते सबकुछ बताया| पिता ने निर्णय सुना दिया कि अब वह उस हैवान के पास वापस नहीं जाएगी|
     इधर सारी दुनिया के लिए लड़ने वाले वकील साहब को अचानक सामने दोराहा नजर आने लगा| एक तरफ बेटा था तथा दूसरी ओर बहू और पोता| इसी उधेड़बुन में उन्हें सारी रात नींद नहीं आई थी| बेटा को घर छोड़ने के लिए कहें , दिल यह मानने को तैयार नहीं था| बहू जिसने कभी शिकायत का मौका नहीं दिया, उसे कैसे बेघर कर दें| उनका दिमाग काम नहीं कर रहा था| बहुत सोच-विचार कर उन्होंने फैसला ले लिया| पत्नी मानने को राजी न थी| उसे भी समझाया|
  वकील साहब बहू के मैके पहुँचे| निहारिका और उसके पिता ने आवभगत में कोई कसर नहीं रखा| वकील साहब ने कहा- बहू, घर चलने के लिए तैयार हो जाओ|
निहारिका ने पिता की ओर देखा|
पिता ने कहा- क्षमा कीजिए वकील साहब, मैं आपकी इज्जत करता हूँ किन्तु बेटी को न भेजूँगा| मुझे उसकी जान पर खतरा नजर आ रहा है| शार्ट टेम्पर्ड व्यक्ति कब क्या कर बैठे, इसका कोई ठिकाना नहीं| आप यहाँ आते-जाते रहें, पर निहारिका को न भेजूँगा|
   मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, ऐसा कुछ न होगा| मेरा घर बहू और पोते का है, अपने बेटे को मैंने घर से निकाल दिया है| निहारिका सम्मान के साथ वहाँ रहेगी|
   निहारिका के पिता अवाक् रह गए| ऐसा भी होता है कि बहू के सम्मान के लिए इकलौते बेटे को घर से निकाल दें| जिसने भी सुना वकील साहब के न्याय पर दाँतों तले ऊँगली दबाकर रह ग‌या| वकील साहब बहू और पोते को आदर के साथ घर ले आए| बहू अपने स्वभाव के अनुरूप घर को सँभालती हुई मान मर्यादा से रहने लगी| पोते को उन्होंने बहुत अच्छी शिक्षा दी| अब वह एक ऊँचे पद पर कार्यरत था| एक बार वकील साहब के बेटे ने घर आने की कोशिश की किन्तु पिता से दो टूक जवाब सुनकर वापस लौट गया|
धीरे-धीरे वकील साहब का शरीर वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहा था| निहारिका और मुन्ना जी जान से उनकी सेवा करते| कभी किसी भी काम के लिए उन्हें दोबारा नहीं बोलना पड़ता| वकील साहब की पत्नी बेटे के लिए दुखी रहती थी पर बहू और पोते से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी| समय बीता, मौत आनी थी, आई| वकील साहब का निधन हो गया| निहारिका निःशब्द रोए जा रही थी| उसे यही लग रहा था कि यदि उन्होंने सहारा नहीं दिया होता तो पिता के घर में वह जी जाती किन्तु एक बेचारी की तरह जिन्दगी हो जाती| माता-पिता बेटी को घर में रखकर समाज की आलोचना का शिकार बनते सो अलग| 
  अब दाह-संस्कार की बारी आई|वकील साहब का बेटा भी पिता के अन्तिम दर्शन के लिए मौजूद था| मुखाग्नि वही देना चाहता था| वकील साहब ने कह रखा था कि मरने के बाद उनकी वसीयत तुरत पढ़ी जाए और उस अनुसार ही काम किया जाए| वसीयत में यह लिखा था कि दाह-संस्कार का काम पोते के हाथो ही संपन्न हो| पत्नी के निधन के उपरांत सारी जायदाद निहारिका के नांम लिखी गई थी| जिसने भी सुना वकील साहब के न्याय पर दंग रह गया| अपने बेटे को छोड़ दूसरे की बेटी को सहारा देकर वकील साहब ने समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था|

ऋता शेखर मधु

11 टिप्‍पणियां:

  1. समाज के लिए अनुकरणीय उदाहरण।
    प्रेरणादायी कहानी।

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  2. यह कहानी रचनाकार पर भी पढ़ी थी .... अनुकरणीय कहानी ।

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  3. समाजी विसंगतियों का अंत ही हो जाये यदि यही आचरण हर बुजुर्ग अपना ले ,सार्थक संवेदनशील ओर प्रशंसनीय |

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    1. संगीता जी, आपको पुनः ब्लॉग पर देखकर हार्दिक प्रसन्नता हुई...शुभकामनाएँ !!

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  4. मन को भिगोती है ये संवेदित रचना ... समाज को दिशा देती भावुक करती कहानी ...

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  5. दुनिया मिसालों से भी भरी है... वाकई , शिक्षाप्रद कहानी ... मेरी शुभकामनायें

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  6. एक शिक्षाप्रद और अनुकरणीय कहानी ..बहुत सुन्दर

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  7. बहुत ही अच्‍छी लगी यह कहानी ... बधाई सहित शुभकमानाएं

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  8. कथा के पात्र वकील साहब ने जो आदर्श दिया वो पाठक के मन में घर करेगा ! निहारिका के पिता के आबाक होना ही स्पष्ट करता है! कि आपने इससे गुरेज नहीं किया के अचानक हम आदर्शशील व्यक्तीत्व देखें तो खुद भौच्चके हो जाते हैं !

    बहुत ही शिक्षाप्रद और अनुकरणीय कहानी !

    सह्र्दय आभार ब्लाग लिंक साझा करने हेतु !

    नमन

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