गुरुवार, 20 सितंबर 2012

इस प्रेम का क्या नाम दूँ...





एक प्रेम के कई रूप हैं
कहीं छांव यह कहीं धूप है
कहीं ये भक्ति कहीं है शक्ति
कहीं विरक्ति तो कहीं आसक्ति|

चमक रही थी चपल दामिनी
अनवरत बारिशों की झड़ी थी
पुत्र-प्रेम में वासुदेव ने
यमुना में ज्यों पांव धरे थे
यमुना क्यों उपलाई थी
पग कान्हा के छूकर उसने
अपनी प्यास बुझाई थी|
वात्सल्य-प्रेम में कान्हा के
यशोदा भी हरषाई थी|
कौन सा था प्रीत कान्हा
कौन सा वह राग था
शायद मधुर सी रागिनी से
बह रहा अनुराग था
बेबस बनी थी राधा प्यारी
लोक-लाज भूली थी सारी|
भक्ति में डूबी थी मीरा
महलों की वह रानी थी
मन के ही एहसास थे उनके
बन गई कृष्ण-दीवानी थीं|

निष्ठुर बने थे मोहन प्यारे
वृंदावन को छोड़ चले
विकल गोपियाँ सुध-बुध खोईं
किस प्रेम में वे थीं रोई|

पितृ-प्रेम में रामचन्द्र ने
वनवास भी स्वीकार किया
परिणीता सीता का पति-प्रेम था
दुर्गम वन अंगीकार किया
भ्रातृ-प्रेम से लक्ष्मण न चूके
उर्मि को विरह का भार दिया|

देख पति की आसक्ति
हाड़ा-रानी विचलित हुई
देश-प्रेम की खातिर उसने
अपने सिर का उपहार दिया
मनु ने झाँसी के प्रेम में
वीरांगना-भेष धार लिया|

पेड़ों से चिपक बहुगुणा ने
वृक्ष-प्रेम का दिया परिचय
जीवों से प्रेम करने का
मनेका का था निश्चय|

संयुक्ता को ले गए स्वयंवर से
प्रेम में कई समर हुए
मन-मंदिर में बसा इक दूजे को
लैला-मजनू अमर हुए|

अमृता की कविता इमरोज
इमरोज के चित्र में अमृता
इस प्रेम का क्या नाम होगा?
नाम से परे
यह एक एहसास है
दूर रहकर भी लगे
वह हमारे पास है
रूह से महसूस करो
चल रही जब तक सांस है
प्रेम की पराकाष्ठा
बन जाता उच्छवास है

प्रभु को प्रेम है कण-कण से
हर जन से हर मन से
प्रेम की बातें मधुरतम
सिर्फ वो ही जानते
जो प्रेम से बढ़कर जगत में
और कुछ ना मानते|

ऋता शेखर मधु
[चित्र गूगल से साभार]


रश्मि दी ने इसे नीचे की लिंक पर लगाया है--
http://vyakhyaa.blogspot.in/2012/09/2.html

25 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम जब पराकाष्ठा की हद पार कर लेता है,,,तो प्रेम अमर हो जाता है,,,

    RECENT P0ST ,,,,, फिर मिलने का

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  2. और जो आप लिख गयीं इतना सुन्दर...ये काव्य से..शब्दों से...भावों से....ख़्वाबों ख्यालों से...लेखनी/लेखन से प्रेम ही है न...
    :-)

    बना रहे प्रेम इस दुनिया में....
    सस्नेह
    अनु

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    1. सही कहा अनु, यह भी प्रेम ही है लेखनी से जो हम सब को बाँधे है|
      बहुत प्यारी बातें हैं आपकीः)
      सस्नेह

      हटाएं
  3. प्रभु को प्रेम है कण-कण से
    हर जन से हर मन से
    प्रेम की बातें मधुरतम
    सिर्फ वो ही जानते
    जो प्रेम से बढ़कर जगत में
    और कुछ ना मानते|
    .....सही कहा ..बहुत सुन्दर प्रेमप्रधान रचना..ऋता

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  4. प्रेम बहुत प्यारा, मीठा अहसास है..
    और उतनी ही प्यारी आपकी यह रचना...
    मनभावन....
    सुन्दर...
    :-)

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  5. प्रेम के मनोहारी भावों की सरल और सार्थक अभिव्यक्ति को सलाम | मेरी नई पोस्ट तन्हाईयाँ पर स्वागत है |

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  6. प्रेम की ...प्रेम भरी कविता

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  7. सुन्दर चित्रांकन प्रेम के विविध रूपों का.. और अंतिम पंक्तियों में तो जीवन का सच्चा सार लिखा हुआ है.. बहुत सुन्दर कविता ..
    सादर
    मधुरेश

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  8. प्रेम-अनाम,अकथ,अविचल,अहर्निश....नाम से परे

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  9. प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति..बहुत सुन्दर

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  10. पोस्ट दिल को छू गयी.कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं ...बहुत खूब
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
    और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  11. प्रभु को प्रेम है कण-कण से
    हर जन से हर मन से
    प्रेम की बातें मधुरतम
    सिर्फ वो ही जानते
    जो प्रेम से बढ़कर जगत में
    और कुछ ना मानते|
    भावमय करते शब्‍दों का संगम

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  12. प्यार को प्यार ही रहने दो,कोई नाम न दो....

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  13. Ah.. flavours of love, thats what I call beauty. Nicely written n explained. Good work

    Please keep writing..

    regards
    Sniel

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  14. कौन सा था प्रीत कान्हा
    कौन सा वह राग था
    शायद मधुर सी रागिनी से
    बह रहा अनुराग था
    madhur bhav
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत सुन्दर .....प्रेम के विविध रूप वाह

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  16. प्रेम के विभिन्न रूपों की बहुत ही सुंदर व्याख्या

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  17. prem ka itna sundar arth diya hai aapne. maine apni haal ki post me kuch swal kiye hai, jisem radha or meera ki preet ke bare me bhi hai. jarur padiyega.


    my post KYUN???

    http://udaari.blogspot.in

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