बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

आत्मा की बेड़ी




पितृपक्ष चल रहा है...पिण्डदान और तर्पण भारत की परम्परा है|
इसी बहाने हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं...तो बस यूँ ही ख्याल आया...   

आत्मा की बेड़ी

आत्मा है
बेड़ी रहित
अमर उन्मुक्त
अजर अनन्त|

बेख़बर है
खुशी और गम से
अनजान है
दर्द और संघर्ष से|

जगत की चौखट पर
रखते ही कदम
आरम्भ होती
बेड़ियों की श्रृंखला|

सर्वप्रथम मिलती
काया की बेड़ी,
फिर जकड़ती
एहसास की बेड़ी,
महसूस होने लगता
खुशी और गम
दर्द और जलन|

जन्म लेते ही चढ़ता
शरीर पाने का ऋण
होता वह    
मातृ-पितृ ऋण की बेड़ी|
चुकता है तभी यह उधार |
करते जब उनका शरीरोद्धार|


जन्म लेते ही
स्वत: जाती है जकड़
रक्त-सम्बन्ध की बेड़ी|
प्यार से निभाएं अगर
रहती है रिश्तों पे पकड़|


सभ्य समाज ने जकड़ी
अनुशासन की बेड़ी,
दाम्पत्य की बेड़ी,
वात्सल्य की बेड़ी|
इन प्यारी बेड़ियों को
रखना है साबूत,
कर्त्तव्य की बेड़ी को
करना होगा मज़बूत|
                       
कुछ बेड़ियाँ होती भीषण
फैलातीं भारी प्रदूषण|
हैं वह
 कट्टर धर्म की बेड़ी
 जातीयता की बेड़ी
अहम् की बेड़ी,
जलन की बेड़ी|
                 
बेड़ी मोह माया की
तोड़ना नहीं आसान,
स्वत: टूट जाएंगी
होगा जब काया का अवसान|

जीवन विस्तार को भोग
होंगे पंचतत्व में विलीन|
आत्मा फिर से होगी
बेड़ी रहित
स्वच्छन्द और उन्मुक्त|
      ऋता शेखर मधु

18 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल श्राद्ध चल रहा है। पिंडदान और तर्पण भी चल रहे है
    अच्छी रचना, या कहें पूरा दर्शन है आपकी कविता में

    बेड़ी मोह माया की
    तोड़ना नहीं आसान,
    स्वत: टूट जाएंगी
    होगा जब काया का अवसान|


    बहुत सुंदर

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  2. बीड़ियों में जकड़ी आत्मा .... सुंदर प्रस्तुति

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  3. जीवंत भावनाएं.सुन्दर चित्रांकन,बहुत खूब
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति

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  4. सुख बंधन में है या मुक्ति में...कौन जाने....

    सुन्दर रचना ऋता जी....
    सस्नेह
    अनु

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  5. बेड़ी मोह माया की
    तोड़ना नहीं आसान,
    स्वत: टूट जाएंगी
    होगा जब काया का अवसान|...बहुत सही कहा ऋता .. सुंदर प्रस्तुति

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  6. जीवन विस्तार को भोग
    होंगे पंचतत्व में विलीन|
    आत्मा फिर से होगी
    बेड़ी रहित
    स्वच्छन्द और उन्मुक्त|
    सशक्‍त भाव लिये उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

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  7. जीवन विस्तार को भोग
    होंगे पंचतत्व में विलीन|
    आत्मा फिर से होगी
    बेड़ी रहित
    स्वच्छन्द और उन्मुक्त ...उस उन्मुक्त आत्माओं का पक्ष् यानि पितृपक्ष सम्मानपूर्वक गुजरे -बेड़ियों से मुक्त

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  8. जन्म लेते ही
    स्वत: जाती है जकड़
    रक्त-सम्बन्ध की बेड़ी|
    प्यार से निभाएं अगर
    रहती है रिश्तों पे पकड़,,,,,,,,,

    पितृपक्ष के बहाने हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं..

    RECENT POST: तेरी फितरत के लोग,

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  9. बंधन और मुक्ति के की यही जद्दोज़हद हैरान करती है.... बेहतरीन रचना

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  10. उन्हों बेड़ियों की बदौलत समाज में अनुशासन रह पता है . बहुत खुबसूरत रचना

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  11. आत्मा की बेड़ी का़टने को मन को साधना पड़ेगा पहले -
    'माया मरी न मन मरा मर-मर गये सरीर '-कबीर

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  12. बहुत गहन भावों को व्यक्त करती बेहतरीन रचना..

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  13. बेड़ी मोह माया की
    तोड़ना नहीं आसान,
    स्वत: टूट जाएंगी
    होगा जब काया का अवसान|

    जीवन विस्तार को भोग
    होंगे पंचतत्व में विलीन|
    आत्मा फिर से होगी
    बेड़ी रहित
    स्वच्छन्द और उन्मुक्त|

    भावपूर्ण....!समस्त आत्माओं को श्रद्धांजलि...!!

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