शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

सूक्ष्म से साकार तक


सूक्ष्म से साकार तक
आत्मा से परमात्मा तक
मुर्छा से चेतना तक
नई अनुभूतियाँ
कई विसंगतियाँ
सहेजता अंत:करण
कहीं पुष्प की रंगिनियाँ
या कंटकों की है चुभन
कहीं अट्टहास उल्लास है
या अंतस में भरा रुदन
अंतहीन सी राह पर
मंजिल की कोई थाह नहीं
अनवरत चलते रहो
अनवरत जीवन सफ़र
उभर रही संवेदना
लिए हृदय में वेदना
अपेक्षाओं के सिलसिले
शिकवों से भरे दिल मिले
यही काल का चक्र है
कहीं सीधा कहीं वक्र है
प्रेम सीख कर जो चलें
हो जाएँ रस्ते सरल
जीव जन्म का सत्व यही
जीवन का अमरत्व यही|
..........ऋता

14 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (16-11-2013) "जीवन नहीं मरा करता है" चर्चामंच : चर्चा अंक - 1431” पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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    1. पूराथोड़े शब्दोंमे जिंदगी निचोड़ -बहुत सुन्दर रचना
      नई पोस्ट मन्दिर या विकास ?
      नई पोस्ट लोकतंत्र -स्तम्भ

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  2. मने हम का कहें , निचोड़ तो अंतिम पंक्तियाँ दे गई. मृत्युमाँ अमृतम गमय .

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  3. सुन्दर सन्देश देती रचना , गर फुरशत हो तो मेरे ब्लॉग "बेनकाब " पर

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  4. सुन्दर भाव लिए रचना...
    बहुत बेहतरीन....
    :-)

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  5. प्रेम ही जीवन का सच है ...
    बहुत सुंदर रचना ..

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  6. वाह !! बहुत सुंदर भाव लिए रचना बहुत बधाई , ऋता शेखर मधु जी ।

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  7. प्रेम ही सर्व है .. प्रेम ही सकल है साकार है ...

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