मंगलवार, 10 जून 2014

कभी बैठ भी जाया करो

कभी बैठ भी जाया करो... 
सहेलियो, आज बस तुमसे बातें करने की इच्छा हो गई|
घर के कामकाज में उलझे रहते हैं हम हमेशा, कभी साथ बैठकर बोल बतिया भी लिया करो|
अच्छा, ये बताओ कि आज कामवाली आई या नहीं| अ र र नहीं आई, च्च्च् तब तो सारे काम ही तुम्हें करने पड़े होंगे| खाना बनाने के अलावा झाड़ू पोछा, कपड़े धोना, बरतन धोना वगैरह वगैरह| क्या कहा, तुम रोज ही करती हो| तब तो सही है|
सखियो, काम तो करती हो पर कभी यह ध्यान दिया है कि पूरे काम के दौरान तुम जमीन में कितनी बार बैठती हो| जमीन में पलथी मारकर नहीं, चुक्को मुक्को बैठ पाती या नहीं| उम्र के साथ कमर के बढ़ते घेरे कहीं बाधा तो नहीं पहुँचा रहे | एक जमाना वह हुआ करता था कि महिलाएँ सारा काम जमीन में बैठकर ही किया करती थीं| झाड़ू लगाना हो तो बैठकर पूरे घर के कोने कोने से धूल निकालने का काम स्वयं बड़े मन से करती थीं| अब क्या है, महरी नहीं आई तो बस कामचलाऊ झाड़ू दे दिया गया बिल्कुल नगरनिगम की ओर से तैनात सड़क के झाड़ूवाले की तरह| पोछा के लिए बाल्टी में पानी लेकर कपड़े निचोड़ निचोड़ कर पौंछा करती हो या वो लम्बे से डंडे में स्पंज वाला पोछा खड़े खड़े मार लेती हो| मसाला भी तो सिल बट्टे पर नहीं पीसे जाते| मिक्सर, या नहीं तो बाजार के मिलावटी पाउडर वाले मसाले| अब बताओ, यह काम भी खड़े खड़े हो गया कि नहीं| कपड़े बैठकर धोए होंगे तो ठीक है या वाशिंग मशीन में डाला और सिर्फ कपड़े फैलाने में जो मेहनत करनी पड़ी हो| फिर तुम बैठी कब ? बरतन धोने के लिए भी सिंक का ही इस्तेमाल कर लेती हो| खड़े खड़े बरतन भी धुल जाते हैं| मेरी एक सहेली है वह पूजा भी खड़े खड़े ही करती है, पूरी चालीसा पढ़ लेती है| अब रसोई में चलते हैं| कोई आधुनिक फुड प्रोसेसर है तो कहने ही क्या, नहीं भी है तो स्लैब पर फटाफट सब्जी काटा और सब्जी भूँजने की जहमत भी कौन उठाए| सारे मसाले डालो और सीटी मार दो| पेट तो भर ही जाएगा चाहे सब्जी में सोंधापन आए या नहीं| बच्चों ने नाश्ते की फ़रमाइश की तो मैगी-पास्ता जिन्दाबाद!! कुछ बदलने की फरमाइश हो तो ब्रेड के बीच खीरा प्याज भर दो| बैठने की गुंजाइश यहाँ भी नहीं| खाना ठंडा हो जाए तो गैस के पास जाने की ज़हमत भी कौन उठाए| अरे भाई, माइक्रोवेव है तो वारे न्यारे| बचपन में जब हम संयुक्त परिवार में रहते थे तो परीक्षा के बाद जो डेढ़ महीने की छुट्टी होती थी तो पूरे परिवार की रोटियाँ बनानी पड़ती थीं| दादा दादी,मम्मी पापा, चाचा चाची, बुआ, अतिथि के रूप में विराजमान कुछ लोग और भाई बहन, अर्थात पचास साठ रोटियाँ- अब पहले के लोग रोटियाँ गिनकर थोड़े ही खाते थे| कोई अच्छी सब्जी बनी तो थोड़ी ज्यादा भी खा लेते थे| उतनी रोटियाँ चाहे कोई भी बनाए वह बैठकर आँच वाले चुल्हे पर ही बनेंगे| पीढ़े पर बैठकर रोटियाँ बेलते हुए पेट भी बेचारा चिपका रहता घुटनों के बीच में, अब सोचती हूँ कितना सेहतमन्द काम था ये| अब सोचो सखियों, अपने नन्हे से परिवार में तुम कितनी रोटियाँ सेंकती हो ? सेंकती भी तो खड़े खड़े ही न|
सारे काम खड़े होकर करने की आदत भारी पड़ रही है| हर दिन कोई भी एक काम घुटने मोड़कर बैठकर करो| यदि पाँच मिनट से ज्यादा नहीं बैठ पाती तो राम बचाए, स्थिति थोड़ी विकट है| पर घबराने की कोई बात नहीं| साफ घर मे ही किसी एक कमरे में बैठकर पोछा मार लो घुटने को जमीन पर रखे बिना| जितना समय जिम में व्यतीत करती हो उतने में घर का ही काम करो| शरीर तो मशीन है, चलाते रहने से जंग नहीं लगता और स्लिम भी दिखोगी| ठीक है सखियो, अब हम चलते हैं| पन्द्रह दिन बाद बताना पेट कुछ कम हुआ या नहीं |

............................ऋता शेखर 'मधु'

3 टिप्‍पणियां:

आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है...कृपया इससे वंचित न करें...आभार !!!