गुरुवार, 4 सितंबर 2014

स्त्री एक-विशेषण अनेक

स्त्री एक-विशेषण अनेक

स्त्रियों का जावन हमेशा से दूसरों का मोहताज रहा है| स्त्री सबसे सहज और सरल विवाह के पहले बेटी और बहन के रूप में रह पाती है| किन्तु बचपन से ही यहाँ भी उसे मानसिक रूप से तैयार किया जाता है कि पिता का घर उसका घर नहीं| लड़की फिर भी विवाह के पहले घर पर अधिकार जताती रहती है| उसकी बातों को मान्यता दी जाती है| कमोबेश यह स्थिति सुखद ही होती है|
सबको एक जैसा जीवन या एक जैसी परिस्थिति नहीं मिलती| सब कुछ अनुकूल रहा तो विवाह योग्य होने पर लड़की विवाहबंधन में बँध जाती है| वह एक पल जिस वक्त वह सुहागप्रतीक सिन्दूर या मंगलसूत्र धारण करती है, उसके जीवन में बहुत सारे विशेषण जुटने की पृष्ठभूमि तैयार कर देता है| हमने हर परिस्थिति की महिलाओं के लिए समाज में विभिन्न विचार देखे| सारे विवाहप्रतीक धारण की हुई ‘सुहागन’ स्त्री के लिए सम्मानपूर्ण सम्बोधन और विचार होते हैं| किन्तु इस सम्मानपूर्ण स्थिति के लिए जिम्मेदार लड़की के पति या सास ससुर ही होते हैं| एक अच्छा घर हर स्वभाव की लड़की को अच्छे से रखकर समाज में  सम्मान दिलाता है| यदि थोड़े भी टेढ़े मेढ़े विचार वाले लोग मिल गए तो एक से एक सुशील लड़की भी समाज की नजरों में बुरी साबित कर दी जाती है| तो लड़की का अच्छा या बुरा कहा जाना उसके ससुरालवालों पर निर्भर करता है , न कि उसके अपने व्यक्तित्व पर| लड़किया ज्यादातर सुशील और मिलजुल कर रहने वाली ही होती हैं|
एक बदचलन और आवारा पति,या किसी अन्य कारण से पति- पत्नी अलग हो गए हों तो ‘परित्यक्ता’ की उपाधि से विभूषित लड़की कितनी भी काबिल क्यों न हो,अवहेलना- सहानुभूति का पात्र बन जाती है| वह कितना भी अच्छा व्यवहार करे, समाज में वह सम्मान नहीं पा पाती जिसकी वह हकदार है| जमाना बदल चुका है पर घर के अन्दर की तथाकथित सुहागन रिश्ते उसे यह एहसास दिलाते रहते हैं कि वह एक छोड़ी गई स्त्री है|
स्त्री के लिए एक विशेषण ‘तलाकशुदा’ है| इन स्त्रियों के लिए समाज की नजर बदल जाती है| हर पग पर उन्हें शक की दृष्टि से देखा जाता है| घर की पति के साथ रहने वाली महिलाए अन्य पुरुषों के साथ कितने भी हँसी मजाक कर लें , उन्हें कोई कुछ नहीं कहता, तलाकशुदा ने दो बातें कर लीं तो समाज की भवें तन जाती हैं| तलाकशुदा महिलाओं को लोग तेजतर्रार की श्रेणी में रखते हैं| मैंने एक लेखिका के विचार पढ़े थे-'मैं विधवा कहलाना पसन्द करूँगी मगर तलाकशुदा नहीं|'
तलाकशुदा या परित्यक्ता वाली स्थिति मनुष्यजन्य परिस्थितियाँ हैं | एक परिस्थिति ईश्वरजनित होते है और वह है ‘विधवा’ हो जाना| विधवाओं को किसी भी मंगलकार्य से दूर रखा जाना सर्वविदित है| इस तरह की महिलाएँ परिवार में किसी शुभ कार्य में जाने से कतराने लगती हैं|
यही सारी परिस्थितियाँ पुरुषों के सामने भी होती हैं मगर उन्हें कोई कुछ नहीं कहता| तन से नाजुक, मन से सरल स्त्रियों के लिए इतने भारी भारी विशेषणों के बोझ उनके जीवन को दुरूह बना दते है| अब पहले जैसी बात नहीं लगती ,मगर पूरी तरह से जमाना बदल गया है यह कहना भी मुश्किल है|

एक विशेषण है ‘बाँझ’, मगर बाँझपन का मूल कारण क्या है यह कोई नहीं जानना चाहता| इन स्त्रियों को भी परिवार में जन्मोत्सव या बच्चे से सम्बन्धित शुभ कार्यों से दूर रखा जाता है| 
इस प्रकार बेकसूर होते हुए भी सामाजिक अवहेलना की शिकार इन स्त्रियों के प्रति रवैया बदलना आवश्यक है ताकि वे हीन भाव से बाहर आ सकें| पल भर में कौन किस श्रेणी में आ जाएगा यह कोई नहीं जानता ...फिर अनावश्यक टीकाटिप्पणी क्यों ? स्त्री तो बस स्त्री है, ममता है, दुआ है, शुभकामना है, और कुछ भी नहीं|

9 टिप्‍पणियां:

  1. स्त्री सही मायनों में मुखर हो जाए
    स्त्री अपने बेटे की कमी पर चुप और बहु पर कटाक्ष करना बंद कर दे
    सही को सही ढंग से स्वीकार करे
    एक अकेली औरत को घूरकर ना देखे
    परिवर्तन के असली उजाले तभी दिखेंगे
    ..........

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  2. स्त्री को ही तय करना है कि जमाने को कितना बदलना है सही दिशा में बदलाव के लिये ।

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (05.09.2014) को "शिक्षक दिवस" (चर्चा अंक-1727)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  4. "स्त्री तो बस स्त्री है, ममता है, दुआ है, शुभकामना है, और कुछ भी नहीं|"
    --
    यही सत्य है बस।

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  5. स्त्री की अलग अलग विश्लेषणों का चित्रण करता अच्छा आलेख ! ये विश्लेषण स्त्री की अंतर्दशा पर गहरा प्रभाव डालते हैं लेकिन इन विश्लेषणों को बढ़ावा भी स्त्रियों की तरफ से ही मिलता है और इन विश्लेषणों का शिकार भी स्त्री ही होती है !

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  6. स्त्री तो बस स्त्री है, ममता है, दुआ है, शुभकामना है, जिसे संयम का तप विरासत में मिला होता है ....

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  7. स्त्रियों के पास संवेदन्शील दिल है तो निश्चय की ताकत भी है जरूरत है उसे वह कैसे
    इस्तेमाल करे?
    अब उसे जागना ही होगा.

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  8. स्त्री तो बस स्त्री है !!
    सार यही है , बाकि सब व्यर्थ !

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  9. स्त्री होना अपने आप में एक उपलब्धि लगती है मुझे -अगर सही महत्व पहचान लें (वह स्वयं भी )!

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