बुधवार, 3 दिसंबर 2014

वह प्यारी सी लड़की...

वह प्यारी सी लड़की...

वह प्यारी सी लड़की
भरना चाहती थी
आँचल में अपने
एक मुट्ठी आसमान
ब्रह्म से सांध्य निशा तक
पूर्व से पश्चिम दिशा तक
गगन का हर रंग
प्राची का हर छंद
इंद्रधनुषी ख्वाब
बटोर लाती आँचल में|

प्रात की मधुरिम बेला 
वेद ऋचा का गान लिए
पवित्र सी मुस्कान लिए
चकित देखती ध्रुवतारा
तोड़ लाती किरन एक
पिरो देती मुस्कुराकर
पंखुड़ियों पर बिखरे
कोमल शबनमी मोती
मखमली आँचल बनाती 
वह प्यारी सी लड़की|

भरी दोपहरी में
निज साया सिमटता
अपने ही आसपास
माँग लाती सूरज से
तपता सा लाल धागा
पिरो देती हुलसकर
दिव्य श्रम बिंदु
दिप दिप करता आँचल
देख देख इतराती
वह प्यारी सी लड़की|

शांत क्लांत साँझ नभ से
माँग लाती उधार
सुरमई सांतरी तार
टपक जाते स्निग्ध दृगों से
इंतेजार के मोती चार
मौन दर्द का साक्षी बन
मधुर मिलन नैनों में भर
झिलमिल झिलमिल
फैला लेती थी आँचल
वह प्यारी सी लड़की|

निशा की मूक बेला में
फलक से इकरार कर
चंदा से मनुहार कर
चट से तोड़ लाती
चाँदनी की ओढ़नी से
एक किरन रुपहली सी
टाँक कर तारे सितारे
अपने अम्बर आँचल पर
पुलकित हो जाती
वह प्यारी सी लड़की|

नव सृजन का प्रसव झेल
नींद के आगोश से निकल
नव प्रात की अँगड़ाई ले 
चहक जाती देखकर आँचल
अपरिमित विस्तार तले
गौरैया बुलबुल तितलियाँ
नन्हे छौने मृगों के
निर्भीक निडर सुरक्षित
उनकी नजरें उतारती
वह प्यारी सी लड़की|

अम्बर में फैले चार पहर|
कह जाते जीवन का सफर||
..............ऋता शेखर 'मधु'

4 टिप्‍पणियां:

  1. मौन दर्द का साक्षी बन
    मधुर मिलन नैनों में भर
    झिलमिल झिलमिल
    फैला लेती थी आँचल
    वह प्यारी सी लड़की|...बहुत प्यारी कविता दीदी....

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (05.12.2014) को "ज़रा-सी रौशनी" (चर्चा अंक-1818)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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