बुधवार, 24 दिसंबर 2014

दर्द की पूर्णाहुति

मन के अपरिमित वितान पर
बिछे हुए हैं शब्द अथाह
कुछ कोमल कुछ तपे हुए
कुछ हल्के कुछ सधे हुए
अधर द्वार पर टिक जाते
निकल पड़े तो बिक जाते
सरस सौम्य अरु कोमल शब्द
कोई सके न उनको तोल
प्रताड़ित अभिशापित शब्द
सिमट जाते खुद घबराकर
प्रेरित करते ज्ञानी शब्द
बन जाते अनमोल कथन
वर्ण से वर्ण जोड़ चले हो
अभिमानी को तोड़ चले हो

शब्द मूक तभी तक होते
जब तक सोते सुख की नींद
दर्द गंगोत्री बन जाता जब
निकल पड़ती धारा अनेक
शुष्क शब्दों को मिलत
नमी का साथ और
बन जाती है मधुर कविता
प्यारी सी नज़्म
या कोमल राज भरी ग़ज़ल
कुछ प्रेरणादायक छंद
या फिर व्यंग्य
चुभ जाने के लिए
हृदय की कोमल परत पर
बन जाते हैं गहरे निशान
और इसी निशान से रिसती है
रक्तबीज की तरह
एक के बाद एक अभिव्यक्ति
हो जाती है दर्द की पूर्णाहुति|
*ऋता शेखर 'मधु'*

6 टिप्‍पणियां:

  1. शब्द मूक तभी तक होते
    जब तक सोते सुख की नींद
    दर्द गंगोत्री बन जाता जब
    निकल पड़ती धारा अनेक.............सुन्दर पंक्तियाँ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (26.12.2014) को "जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि" (चर्चा अंक-1839)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. दर्द गंगोत्री बन जाता जब
    निकल पड़ती धारा अनेक.............सुन्दर पंक्तियाँ!

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है...कृपया इससे वंचित न करें...आभार !!!