बुधवार, 14 जनवरी 2015

गुलमोहर की ओट

१८
धरती रानी सोहती, पहन हरित परिधान,
क्यारी क्यारी सज गए, सकल सलोने धान|
सकल सलोने धान, देख कृषक जिया हर्षा,
जुटा रही आहार, मस्त मतवाली वर्षा|
सावन की सौगात, सुता की गोदी भरती,
पहन हरित परिधान, सुहानी लगती धरती|
१७
आमंत्रण हर बूँद में, भेज रहा है मेह,
सावन में आओ बहन, भर धागे में नेह|
भर धागे में नेह, तिलक की रोली लाना,
देकर आशिष आज, धन्य हमको कर जाना|
नम हैं मधु के नैन, बाँचती नेह निमंत्रण,
लख भावज का प्रेम, मान लेती आमंत्रण|

१६
तुम ही मेरे राम हो, तुम ही हो घनश्याम
ओ मेरे अंतःकरण, तुम ही तीरथ धाम
तुम ही तीरथ धाम, भक्ति की राह दिखाते
बुझे अगर मन-ज्योत, हृदय में दीप जलाते
थक जाते जब पाँव, समीर बहाते हो तुम
पथ जाऊँ गर भूल, राह दिखलाते हो तुम

१५
गुलमोहर की ओट में, वह था खड़ा उदास,
तपता सूरज जेठ का, छीन रहा था आस|
छीन रहा था आस, सहेगा वह दुख कैसे,
हँसकर बोला फूल, सहो, सहता मैं जैसे|
निखरे मनु का रूप, मान का मिलता मोहर,
ज्यों सहकर के धूप, खिले दिनभर गुलमोहर 
१४
सीढ़ी पर है मंजिलें, देख सके तो देख,
पायदान की हर कथा, बने अमिट आलेख|
बने अमिट आलेख, अडिग हो चढ़ते जाओ,
है  प्रकाश हर ओर, हथेली में भर लाओ|
कदमों में आकाश, लिए चलती हर पीढी, 
देख सके तो देख, मंजिलें होती सीढ़ी |
………ऋता शेखर "मधु"

4 टिप्‍पणियां:

  1. सराहनीय पोस्ट
    सक्रांति की शुभकामनाएँ।

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (16.01.2015) को "अजनबी देश" (चर्चा अंक-1860)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    मकरसंक्रान्ति की शुभकामनायें

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  4. ख़ूबसूरत हाइगा...सुंदर प्रभावी रचना...श्रेष्ठ, छंदबद्ध सृजन के लिए साधुवाद.

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