बुधवार, 16 सितंबर 2015

कहानी अब पुरानी है परी तितली गुलाबों की


बह्र  1222-1222-1222-1222
काफ़िया - आरा
रदीफ़ - है

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तसव्वुर में छिपे थे जो नजारों में उतारा है
जरा इतना तो कह दो जान तुझपे आज वारा है
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किसी की ख्वाहिशों में तुम सदा शामिल बने रहते
कभी यह देखना तुम बिन पिता कितना बिचारा है
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सवालों में घिरे रहकर कहाँ तक तुम भी जाओगे
तग़ाफ़ुल में रहे हरदम लगे किसको ये प्यारा है
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चले जाते जहाँ से जो चले आते हैं यादों में
न समझें हाल दिल का वो उन्हें कितना पुकारा है
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कहानी अब पुरानी है परी तितली गुलाबों की
कि दादी और नानी से हुआ अब तो किनारा है
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गिरह
हमें अदना समझना मत हमीं से है जमाना ये
हमारी उम्र कम है पर तजुर्बा ढेर सारा है

ऋता शेखर ‘मधु’

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 17 सितम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा 17-09-2015 को चर्चा मंच के अंक चर्चा - 2101
    में की जाएगी
    धन्यवाद

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  3. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा 17-09-2015 को चर्चा मंच के अंक चर्चा - 2101
    में की जाएगी
    धन्यवाद

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  4. आप न भी कहें तो भी आपका तजुर्बा आपकी भाषा से बयान हो रहा है बेहतरीन

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