गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

बंदगी जब की खुदा की हौसले मिलते गए

मतला--
दो दिनों की जिंदगी है आदमी के सामने
जान है क्या चीज बोलो दोस्ती के सामने

हुस्ने मतला--

आँधियाँ भी जा रुकी हैं हिमगिरी के सामने
चाल भी बेजार बनती सादगी के सामने

अशआर--

बेटियाँ हों ना अगर तो बहु मिलेगी फिर कहाँ
कौन सी दौलत बड़ी है इस परी के सामने

बंदगी जब की खुदा की हौसले मिलते गए
झुक न पाया सिर मिरा फिर तो किसी के सामने

नारियाँ सहमी दबी सी ठोकरों में जी रहीं
हर खुशी बेकार है उनकी नमी के सामने

हो अमीरी या गरीबी रख रही इक सी नजर
रौशनी की बात क्या है कौमुदी के सामने

फूल भी खिलते रहे हैं कंटकों के बीच में
खुश्बुएँ बिखरी रही हैं हर किसी  के सामने

*ऋता शेखर 'मधु'*

बह्र -- 2122 2122 2122 212
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
काफिया -- ई (स्वर)
रदीफ़ -- के सामने

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 09 अक्टूबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (09.10.2015) को "किसानों की उपेक्षा "(चर्चा अंक-2124) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

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  3. दो दिनों की जिंदगी है आदमी के सामने
    जान है क्या चीज बोलो दोस्ती के सामने.

    बहुत सुंदर.

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