गुरुवार, 24 मार्च 2016

रंग

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वो...जो अनदेखा है ...अनाम है...पर सबके साथ है...

2122 2122 2122 212

आज अपने साथ लाया ढेर सारे रंग वो
द्वेष को है छोड़ आया होलिका के संग वो

हर तरफ सद्भाव से निखरी पड़ी है ये फिजा
फाग की इन मस्तियों में साधता मिरदंग वो

मौसमी बदलाव का कोई असर है ना कहीं
ठंडई में है घोंटता किलकारियों का भंग वो

हरित पीले बैंगनी की धार मतवाली हुई
मुख पुते हैं लाल से जो लग रहा बजरंग वो

शोर गलियों में सुनें तो भागते डरपोक हैं
सामने आया खुशी से बन रहा शिवगंग वो

सरहदों पर जो मिटे अपने घरों के दीप थे
दस्तकें होली में देकर लौटता बेरंग वो

शब्द जो कागजों पर श्वेत श्यामल है 'ऋता'
मन उमंगित कर चला तो बन रहा बहिरंग वो
*ऋता शेखर 'मधु'*

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (25-03-2016) को "हुई होलिका ख़ाक" (चर्चा अंक - 2292) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    रंगों के महापर्व होली की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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