शनिवार, 23 अप्रैल 2016

सुप्रभाती दोहे - 1











समभाव से बाँट रहा, सूरज सबको धूप|
ऊर्जापोषित हम मनुज, खोलें मन का कूप||१०

स्वर्ण रथ पर सूर्य पथिक, आया मेरे देश|
मंजर उत्साहित हुए, मुदित बने परिवेश||९

एक गेंद लुढ़का दिया, रवि ने भोरम भोर|
उसके पीछे चल दिए, मनु पंछी अरु ढोर||८

सूरज का रस्ता कभी, ना होता है जाम|
रुकावटों का सिलसिला, मानव में है आम||7

सिन्दूरी आँचल धरे, उषा हुई अहिवात|
जग है उसका मायका, नभ धरती पितु मात ||6

बैजंती परिजात को , नहलाती है धूप|
श्रृंगारित शिव कृष्ण का, निखरा स्वर्गिक रूप||५

खिल रही अपराजिता, खिल रहे हैं गुलाब|
रथ पर रखे स्वर्ण कलश, सूरज बना नवाब||४

उगती जाती  रौशनी, नित प्राची की ओर|
तम पर पा लेती विजय, बिना मचाए शोर||३

सुबह सुनहरी रश्मियाँ, बनी चंद्रिका रात|
छुप कर रहती धूप में, शीतलता की बात||२

आया है परदेस से, सूरज अपने देश|
पश्चिम को भेजो जरा, गरिमा का संदेश||१
ऋता शेखर 'मधु'

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 24 अप्रैल 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है...कृपया इससे वंचित न करें...आभार !!!