गुरुवार, 14 जुलाई 2016

वजन - लघुकथा

वजन
पुलिस ने धर्मेश जी को रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार कर लिया।
पत्नी और बेटा सामने ही खड़े थे किन्तु उनकी आँखों में कोई सहानुभूति न थी।
धर्मेश बाबू को अपने वृद्ध पिता की बात याद आ गई।

" बेटे, सरकारी नौकरी में सावधानी की बहुत जरूरत होती है। बिना वजन के सरकारी कागज को निपटाना सीखो। आज जिनकी सुख सुविधा के लिए वजन रखवाते हो, क्या पकडे जाने पर वे तुम्हारा साथ देंगे।"

" पिता जी, आप तो बस शुरू हो जाते हैं। बहती गंगा में हाथ धोने में क्या बुराई है।"

"बुराई है बेटा, इज्जत खो जाये तो फिर से वापस नहीं मिलती।  उस निर्जन राह का साथी कोई नहीं होता।"

जाते जाते पत्नी को कहते सुना धर्मेश जी ने, " इज्जत मिटटी में मिला दी इन्होंने, सहेलियो को क्या मुँह दिखाऊँगी।"

सरकारी फाइलों पर रखे वजन का बोझ सीने पर महसूस करते हुए धर्मेश जी मायूस और थके कदमों से पुलिस की गाड़ी में बैठ गए।
-----ऋता शेखर -----

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (15-07-2016) को "आये बदरा छाये बदरा" (चर्चा अंक-2404) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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