मंगलवार, 24 जनवरी 2017

समस्या-लघुकथा



समस्या

सुबह सुबह कमरे से आती खुसरफुसर की आवाज उनके कानों में पड़ रही थी|
''आज शाम को बॉस ने पार्टी में बुलाया है| जाना अत्यंत आवश्यक है| मैं तुम्हे बैंक से ही पिकअप कर लूँगा रमा| बॉस की बात है तो कुछ पहले जाना ही पड़ेगा ताकि उनकी मदद कर उनपर अपना इम्प्रेशन जमा सकूँ| अगले महीने ही प्रमोशन की लिस्ट निकलने वाली है|''


''किन्तु माँजी की व्यवस्था करनी होगी न संदीप| पार्टी से लौटते हुए देर भी हो सकती है| घर आकर खाना भी बनाना होगा माँजी के लिए|''

''अरे हाँ, ये तो सोचा ही नहीं| ठीक है मैं अकेले ही चला जाऊँगा| किन्तु तुम भी चलती तो...खैर जाने दो''

रसोई में बरतनों के खटपट की आवाज आने लगी| रमा चाय की कप लेकर सास के कमरे में पहुँची|
''बहू, आज मेरा व्रत है| मैं कुछ नहीं खाऊँगी| घर में जो फल है वही खा लूँगी|''
रमा के चेहरे पर की खुशी को उन्होंने भली भाँति महसूस किया|

''संदीप, समस्या खुद ही सुलझ गई| आज माँजी का व्रत है|''

संदीप ने हिंदी महीने का कैलेंडर देखा| माँ द्वारा किए जाने वाले सभी व्रत से वह वाकिफ़ था| फिर आज कौन सा व्रत है यह देखने गया| कोई व्रत नहीं था| रमा की खुशी देखकर वह कुछ कहने की हिम्मत न जुटा सका|
रसोई से आती आवाज सुनकर उन्होंने नमी को पलकों पर ही थाम लिया|
--ऋता शेखर 'मधु'

1 टिप्पणी:

  1. समझदार माँ कहें या फिर मजबूर मां
    ये समझ से बाहर है
    सादर

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