बुधवार, 25 जनवरी 2017

मुसीबत राह में आई मिले हमदर्द भी हरदम

ग़ज़ल

जरा भर लो निगाहों में कि उल्फ़त और बढ़ती है
हया आए जो मुखड़े पर तो रंगत और बढ़ती है

निगहबानी खुदा की हो तो जीवन ये महक जाए
मुहब्बत हो बहारों से इबादत और बढ़ती है

मुसीबत राह में आई मिले हमदर्द भी हरदम
खिलाफ़त आँधियाँ करतीं तो हिम्मत और बढ़ती है

जमाने में शराफ़त की शिकायत भी लगी होने
ज़लालत की इसी हरकत से नफ़रत और बढ़ती है

फ़िजा महफ़ूज़ होगी तब कटे ना जब शज़र कोई
हवा में ताज़गी रहती तो सेहत और बढ़ती है
--ऋता शेखर 'मधु'

1222  1222  1222  1222

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति की लिंक 26-01-2017को चर्चा मंच पर चर्चा - 2585 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 27 जनवरी 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह क्या बात है ! हर शेर लाजवाब है ! बहुत बढ़िया ॠता जी !

    उत्तर देंहटाएं
  4. सहज, सरल और प्रवाहपूर्ण कविता. 'उल्फत' के स्थान पर 'उल्फ़त' और 'जलालत' के स्थान पर 'ज़लालत'कर दीजिए.

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (29-01-2017) को "लोग लावारिस हो रहे हैं" (चर्चा अंक-2586) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है...कृपया इससे वंचित न करें...आभार !!!