बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

हँसते हुए पलों को रखो तुम सँभाल कर

लफ्जों में प्रीत पालकर उनको निहाल कर
दुखती हुई रगों से कभी ना सवाल कर

मिलती रही हैं मुश्किलें जीवन की राह में
हँसते हुए पलों को रखो तुम सँभाल कर

माना तेरी हर बात पर मुझको रहा यकीं
अब जिंदगी से पूछकर तू ना बवाल कर

कहती रही हैं कुछ तो ये अमराइयाँ हमें
उनको गज़ल में ढालकर तू भी कमाल कर

जो वक्त आज बीत गया अब वो अतीत है
क्या फायदा मिलेगा उसे ही उछाल कर
-ऋता शेखर 'मधु'

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (12-02-2017) को
    "हँसते हुए पलों को रक्खो सँभाल कर" (चर्चा अंक-2592)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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