बुधवार, 27 सितंबर 2017

बेटी दिवस पर

बेटियों,
तुम पिता का प्यार हो
माँ के गले का हार हो
तुमसे ही तो राखियाँ हैं
तुम खुशी का आधार हो|

तुम आई तो कली मुस्काई
कभी समझो न खुद को पराई
दिल में रहती हो तुम भी हमारे
जैसे वहाँ रहता है भाई|

तुम अपरिमित संभावना हो
लेखनी की परिभावना हो
तुम से है रौशन सारा जहाँ ये
तुम एक मीठी सी भावना हो|

अब आँखों में आँसू न लाना
विद्या से जीत लेना जमाना
खुद में संचार करो शक्ति का
आततायियों को सबक है सिखाना|

जूही बन कर महका करो
चिड़ियों सी तुम चहका करो
अब धूप में कुम्हलाना नहीं
पलाश बन के दहका करो|

छल से भरा अब ये जगत है
तालाब पर बगुला भगत है
तुम भोली मछली न बनना
मगरमच्छ भी मध्यगत है|
--ऋता शेखर “मधु”

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28-09-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2741 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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