शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

बचपन के जैसा फिर यहाँ मंजर नहीं देखा

बचपन के जैसा फिर यहाँ मंजर नहीं देखा
गोदी हो जैसे माँ की, वो बिस्तर नहीं देखा

हिन्दू या मुसलमान में आदम यहाँ उलझे
हों सिर्फ़ जो इंसान वो लश्कर नहीं देखा

धरती पे लकीरें हैं दिलों में हैं दरारें
काटे जो समंदर वही नश्तर नहीं देखा

बिखरे जो कभी गुल तो, रहे साथ में ख़ुशबू
जो तोड़ दे जज़्बात वो पत्थर नहीं देखा

शीरीं हो ज़ुबाँ और मुहब्बत की अदब हो
संसार में उसको किसी का डर नहीं देखा
-ऋता शेखर ‘मधु’

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (11-11-2017) को "रोज बस लिखने चला" (चर्चा अंक 2785) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 109वां शहादत दिवस - कनाईलाल दत्त - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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