बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

मैं वसुन्धरा


मैं वसुन्धरा
खिले पलाशों से मिल मिल कर
खुद बासंती होती जाऊँ

सरस फाग के गीत सुहाने
अलि पपीहा आए सुनाने
पारिजात भर देता दामन
मस्त हवा ने गाए तराने

पीत रंग सरसो से लेकर
मीठे सपनो को ले आऊँ

ग्रंथों में न होगी पुरानी
विरह मिलन की कथा कहानी
शब्दों में भी जान आ गई
जब मौसम ने की नादानी

मसि सागर से माणिक चुन चुन
गीत बनी पल पल इतराऊँ

भोर सांध्य नभ है नारंगी
कलरव में बजती सारंगी
भाँति भाँति की खुश्बू लेकर
मुकुलित पुष्प हुए बहुरंगी

तितली के सुन्दर पंखों से
परागों के गुलाल उड़ाऊँ

उल्लास उजास गुण होली के
बीत गये अब दिन टोली के
द्वेष दंभ कालिख ले आये
मन सूना बिन रंगोली के

श्वेत श्याम होते नैनों से
कैसे सबका मन बहलाऊँ

अंतरजाल पर होली खेलें
लिखते हैं मुख से ना बोलें
शुभसंदेशों की लगी झड़ी
इस घर से उस घर में ठेलें

नए जमाने की धारा में
आभासी बन कर सकुचाऊँ

-ऋता शेखर ‘मधु’

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 01.03.2018 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2896 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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