शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

कोदंड

 

उत्कृष्ट पत्रिका अनुभूति के कोदंड विशेषांक में प्रकाशित

शक्ति का प्रतीक कोदंड 


मर्यादा संग शक्ति का प्रतीक बना कोदंड

देख अविनय के भाव को

होता रहा प्रचंड


रघुनन्दन के तरकश में अस्त्र यह कड़े बाँस का

प्रत्यंचा संग भृकुटि ताने थमता दृग हर साँस का

निष्फल होता है नहीं चुभ जाए शर-फाँस का

लक्ष्य बेधने निकल पड़ा

काँपने लगा भूखंड

 

कोदंड नामक यह धनुष साथी है श्रीराम का

हठ दुराग्रह का शत्रु मित्र पुरु निष्काम का

सागर से पथ पाने में अनुनय था न काम का

वरुण देव देख घबराए

प्रत्यंचा दिव्य अखंड

 

दंडकारण्य में निर्मित किया कई असुर संहार

रावण सेना थी भयभीत कोदंड का सुन टनकार

कुम्भकर्ण के काटे पाँव जब हुई उससे तकरार

कोदंड चमक उठा ऐसे

नभ में ज्यों मार्तंड

 

मन के अंदर लंका हो कोदंड हमे बनना होगा

छल कपट को त्यागकर मर्यादा से तनना होगा

दसमुख का हो विनाश उसे सदा कुचलना होगा

हर काल सच्चाई बने

ऐसा निर्मित हो प्रखंड

ऋता शेखर

१ अक्टूबर २०२५

गुरुवार, 10 जुलाई 2025

ऋषि मुनि और उनका आध्यात्म



*' ऋषि मुनि और उनका आध्यात्म'*

इस विषय के अंतर्गत सर्वप्रथम हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि आध्यात्म क्या है और ऋषि, मुनि, संत एवं महर्षि में मूलभूत अंतर क्या है एवं मानव कल्याण में उनकी आध्यात्मिक भूमिका क्या है ?

ऋषि, मुनि, संत, महर्षि, ब्रह्मर्षि, और राजर्षि, ये सभी शब्द भारतीय संस्कृति और धर्म में विभिन्न प्रकार के आध्यात्मिक गुरुओं या ज्ञानियों को दर्शाते हैं। इनमें से प्रत्येक शब्द एक विशेष स्तर या प्रकार के आध्यात्मिक विकास को दर्शाता है। 

*ऋषि:* ऋषि शब्द का अर्थ है "दृष्टा" या "जानने वाला"। प्राचीन काल में, ऋषि उन लोगों को कहा जाता था जिन्होंने वेदों की ऋचाओं (मंत्रों) की रचना की या उन्हें देखा। ऋषि ज्ञान और तपस्या के माध्यम से सत्य को जानने का प्रयास करते हैं। 

*मुनि:* मुनि शब्द का अर्थ है "मनन करने वाला" या "शांत रहने वाला"। मुनि वे होते हैं जो अपनी इंद्रियों को वश में करके मन को शांत करते हैं और ज्ञान प्राप्त करने के लिए गहन चिंतन करते हैं। मुनि आमतौर पर एकांत में रहते हैं और तपस्या करते हैं। 

*संत:* संत शब्द का अर्थ है "सत्य को जानने वाला" या "सत्यनिष्ठ व्यक्ति"। संत वे होते हैं जिन्होंने सत्य को जान लिया है और उसे अपने जीवन में उतार लिया है। संत आमतौर पर सांसारिक सुखों का त्याग कर देते हैं और दूसरों को सत्य का मार्ग दिखाते हैं। 

*महर्षि:* महर्षि शब्द का अर्थ है "महान ऋषि"। महर्षि वे ऋषि होते हैं जिन्होंने ज्ञान और तपस्या के माध्यम से उच्च स्तर की आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त कर ली है। वे न केवल ज्ञानवान होते हैं, बल्कि वे दूसरों को ज्ञान देने और उनका मार्गदर्शन करने में भी सक्षम होते हैं। 

*ब्रह्मर्षि:* ब्रह्मर्षि शब्द का अर्थ है "ब्रह्म को जानने वाला ऋषि"। ब्रह्मर्षि वे ऋषि होते हैं जिन्होंने ब्रह्म (सर्वोच्च वास्तविकता) को पूरी तरह से जान लिया है और उसमें लीन हो गए हैं। ब्रह्मर्षि को ऋषियों में सबसे महान माना जाता है। 

*राजर्षि:* राजर्षि शब्द का अर्थ है "राजा होते हुए भी ऋषि"। राजर्षि वे राजा होते हैं जिन्होंने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए भी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया है और ऋषि का दर्जा प्राप्त किया है।

अध्यात्म को हमें वेद, पुराण, उपनिषद और ग्रन्थों के माध्यम से समझने का प्रयास करना होगा। यहाँ पर हम श्रीमद्भगवतगीता में वर्णित अध्यात्म की परिभाषा को सामने लाने एवं आत्मसात करने का प्रयत्न करते हैं।

भगवद गीता के अनुसार, अध्यात्म  का अर्थ है अपने स्वयं के स्वरूप का, अपनी आत्मा का अध्ययन करना। यह  व्यक्ति के भीतर की चेतना और प्रकृति के गुणों के बारे में है, और यह दर्शाता है कि कैसे मनुष्य अपने कर्मों और स्वभाव के माध्यम से विकसित होता है। 

अध्यात्म का अर्थ है  सांसारिक मोह-माया से परे होकर आत्मा के परम सत्य को प्राप्त करना।

अध्यात्म एक दर्शन है, चिंतन-धारा है, विद्या है, हमारी संस्कृति की परंपरागत विरासत है और ऋषियों, मुनियों के चिंतन का निचोड़ है। आत्मा, परमात्मा, जीव, माया, जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, सृजन-प्रलय की अबूझ पहेलियों को सुलझाने का प्रयत्न है अध्यात्म। वैदिक काल से हमारा देश कृषि और पशुपालन युग में था। उस समय के निवासी कर्मठ, फक्कड़, प्रकृ‍तिप्रेमी, सरल और इस जीवन को भरपूर जीने की लालसा वाले थे। उन्होंने कुछ प्राकृतिक शक्तियों जैसे मेघ, जल, अग्नि, वायु, सूर्य, उषा, संध्या आदि की पहचान की और इन्हें संचालित करने वाले काल्पनिक आकारों ,जैसे वरुण, इंद्र, रुद्र आदि को देवों के रूप में मान्यता दी। फिर इन्हें प्रसन्न रखने और इनके आक्रोश से उत्पन्न अनिष्ट से अपने जीवन, अपनी फसलों, अपने पशुओं को बचाने के लिए इनके निमित्त अनुष्ठान किए जाने लगे। ये अनुष्ठान फिर अपनी कामना-पूर्ति और बीमारियों, शत्रुओं पर विजय पाने के तंत्र के रूप में विकसित हो गए। 

ऋषियों ने आध्यात्मिक ज्ञान को आकार देने, पवित्र ज्ञान को संरक्षित करने और व्याख्या करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिन्दू धर्म में प्रसिद्ध  ऋषियों के दिव्य आध्यामिक जीवन व आध्यात्मिक योगदान पर चर्चा करते हैं। 

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*1.महर्षि वेदव्यास* वेदों के विभाजक और महाकाव्यों के रचयिता हैं।

महर्षि वेदव्यास, जिन्हें कृष्ण द्वैपायन व्यास के नाम से भी जाना जाता है, सनातन धर्म के आदिगुरु हैं। उनके नाम के साथ  ‘व्यास’ शब्द  एक उपाधि है, जो  द्वापर युग में वेदों का विभाजन करने वाले प्रत्येक महापुरुष को मिलती थी। 

 इन्हें गुरुओं का भी गुरु माना जाता है, और गुरु पूर्णिमा इन्हीं को समर्पित है। पुराणों के अनुसार इन्होंने अट्ठावन बार वेदों का विभाजन किया।

 इन्होंने महाभारत जैसे महाकाव्य और अठारह पुराणों की रचना की। 

ये त्रिकालदर्शी थे। 

युधिष्ठिर को ‘प्रतिस्मृति’ विद्या का ज्ञान दिया।

धर्म की क्षीण होती स्थिति को देखकर वेदों का व्यास किया।

*2 महर्षि वशिष्ठ:* ज्ञान, तेज और मर्यादा के प्रतीक हैं।

वे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और सप्तर्षियों में प्रमुख थे। 

ऋग्वेद के सप्तम मंडल के वे मुख्य द्रष्टा माने जाते हैं।

वे श्रीराम के गुरु थे। राम के वनवास से लौटने के बाद, इन्हीं के द्वारा उनका राज्याभिषेक हुआ था।

 कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच हुए संघर्ष में, विश्वामित्र ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, पर वशिष्ठ के अद्वितीय तपोबल के आगे उन्हें हार माननी पड़ी। इसी घटना ने विश्वामित्र जी को ब्रह्मर्षि बनने की प्रेरणा दी।

इनसे संबंधित कई महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं जैसे ‘योग वशिष्ठ’ ज्ञान और वैराग्य का अनुपम ग्रंथ है।‘वशिष्ठ संहिता’ में  उनके ज्ञान और शिक्षाओं का सार।

*3 विश्वामित्र* की क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि तक की यात्रा अद्भुत है।

 विश्वामित्र का जन्म एक क्षत्रिय राजा के रूप में हुआ था। ऋषि वशिष्ठ से पराजित होने के बाद, उन्होंने ब्रह्मर्षि बनने का दृढ़ निश्चय किया। उनकी यह यात्रा दृढ़ इच्छाशक्ति, कठोर तपस्या और अटूट संकल्प का प्रतीक है जिससे वो सबसे शक्तिशाली ऋषि बन सके।

उन्होंने वर्षों तक कठोर तपस्या कर ब्रह्मा और शिव से सभी दिव्यास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। 

अपनी साधना से उन्होंने इतना तेज अर्जित किया कि एक समानांतर सृष्टि की रचना तक आरंभ कर दी। बाद में ब्रह्मा जी द्वारा मान्यता प्राप्त कर वे ब्रह्मर्षि कहलाए।

 हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और शक्तिशाली गायत्री मंत्र के द्रष्टा, महर्षि विश्वामित्र को माना जाता है।

उनकी “मानसिक सृष्टि” शक्ति इतनी प्रबल थी कि वे केवल विचार से ही नई वस्तुओं का निर्माण कर सकते थे।

*4 महर्षि भृगु:* ज्योतिष, संजीवनी और त्रिदेव की सहनशीलता के परीक्षक थे।

महर्षि भृगु भगवान ब्रह्मा के मानसपुत्रों में से एक थे और सप्तर्षियों में उनका विशेष स्थान है। 

उन्होंने ‘भृगु संहिता’ की रचना की, जो ज्योतिष शास्त्र का एक विशाल और प्राचीनतम ग्रंथ है।

 महर्षि भृगु ने संजीवनी विद्या की खोज की थी, जिससे मृत प्राणी को पुनः जीवित किया जा सकता था। 

उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और शिव की सहनशीलता की परीक्षा ली थी। भगवान विष्णु की अपार सहनशीलता को सिद्ध किया। 

5 महर्षि अगस्त्य: ब्रह्मतेज और लोक कल्याण के प्रतीक थे।

महर्षि अगस्त्य वैदिक युग के महान सप्तर्षियों में से एक थे और वशिष्ठ मुनि के ज्येष्ठ भ्राता थे। ब्रह्मतेज से परिपूर्ण अगस्त्य मुनि, देवताओं के अनुरोध पर उत्तर भारत से दक्षिण की ओर गए और वहीं निवास करने लगे।

वे अभूतपूर्व दैत्य संहारक थे। महर्षि अगस्त्य ने अपनी मंत्र शक्ति से संपूर्ण समुद्र को पी कर दुष्ट राक्षसों का विनाश किया था। उन्होंने इल्वल और वातापि नामक दुष्ट दैत्यों द्वारा किए जा रहे ऋषि-संहार को भी अपनी शक्ति से रोका।

एक बार विंध्याचल पर्वत ने अपनी ऊंचाई बढ़ाकर सूर्य का मार्ग अवरुद्ध कर दिया। सूर्यदेव की प्रार्थना पर, महर्षि अगस्त्य ने विंध्य पर्वत को स्थिर करते हुए कहा, “जब तक मैं दक्षिण से न लौटूँ, तुम ऐसे ही निम्न बने रहो।” चूंकि अगस्त्य जी वापस नहीं लौटे, विंध्याचल उसी प्रकार निम्न रूप में स्थिर रह गया और सूर्य का मार्ग सदा के लिए प्रशस्त हो गया।

*6 महर्षि भारद्वाज* ऋग्वेद के द्रष्टा, विज्ञानवेत्ता और ज्ञान के भंडार थे।

उन्हें ऋग्वेद के छठे मण्डल का द्रष्टा माना जाता है, जिसमें उनके 765 मंत्र संग्रहित हैं। अथर्ववेद में भी उनके 23 मंत्र मिलते हैं। 

महाभारत के अनुसार, उन्होंने ‘धनुर्वेद’ पर प्रवचन दिया।

उन्हें ‘राजशास्त्र’ का भी प्रणेता माना जाता है।

उन्होंने ‘यन्त्र-सर्वस्व’ नामक एक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी, जो प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का एक अद्भुत प्रमाण है।

 इंद्र ने भारद्वाज को सावित्र्य-अग्नि-विद्या का विधिवत ज्ञान कराया, जिससे उन्होंने अमृत-तत्त्व प्राप्त किया और स्वर्गलोक में जाकर आदित्य से सायुज्य प्राप्त किया।

यह शक्तिशाली ऋषि आयुर्वेद के प्रयोगों में परम निपुण थे, जो उनके लोक कल्याणकारी स्वभाव को दर्शाता है।

*7 महर्षि कश्यप* सृष्टि के प्रजापति और विज्ञान-अध्यात्म के संयोजक थे।

 उनकी कुल सत्रह पत्नियाँ थीं, जिनमें दक्ष प्रजापति की तेरह पुत्रियाँ प्रमुख थीं। इन्हीं पत्नियों से देवों, असुरों, नागों और अनेक अन्य प्राणियों का जन्म हुआ, जिससे उन्हें सृष्टि के प्रजापति के रूप में जाना जाता है।

भगवान विष्णु ने अपना पाँचवाँ अवतार, वामन अवतार, ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी आदिति के पुत्र के रूप में लिया था।

उन्होंने ‘कश्यप संहिता’ की रचना की, जिसमें आयुर्वेद का संपूर्ण ज्ञान समाहित है। इसके अतिरिक्त, वे ‘शिल्प शास्त्र’ के भी रचयिता थे।

*8 अत्रि ऋषि* का जन्म ब्रह्माजी के नेत्रों से हुआ था, इसलिए उन्हें ब्रह्मा का मानस पुत्र माना जाता है। 

अत्रि ऋषि ने कर्दम ऋषि की पुत्री अनुसूया से विवाह किया था। अत्रि ऋषि और अनुसूया ने पुत्र प्राप्ति के लिए ऋक्ष पर्वत पर कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने उनके पुत्र के रूप में अवतार लिया। विष्णु के अंश से दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, और शिव के अंश से दुर्वासा ऋषि का जन्म हुआ। 

अत्रि ऋषि को त्याग, तपस्या और संतोष का प्रतीक माना जाता है।  अश्विनीकुमारों की उन पर विशेष कृपा थी।अत्रि ऋषि ने देश में कृषि के विकास में भी योगदान दिया। कहा जाता है कि अत्रि ऋषि ने अंजुली में जल भरकर सागर को सोख लिया था, जिसके बाद सागर ने उनसे याचना की कि उसे जलविहीन न करें। 

*9 महर्षि पराशर:* उन्होंने अपने तपोबल से यमुना नदी की धारा को परिवर्तित कर दिया और उनके मंत्रों की शक्ति से कालकेय राक्षसों का संहार हुआ।

वे महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास के पिता थे।

उन्होंने ज्योतिष शास्त्र के मूल ग्रंथ ‘बृहत् पराशर होरा शास्त्र’ की रचना कर ग्रह-नक्षत्रों के गूढ़ रहस्यों को उजागर किया। यह ग्रंथ वैदिक ज्योतिष का आधार स्तंभ है।

उन्होंने ‘पराशर स्मृति’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की भी रचना की, जिससे वेदों के गूढ़ रहस्यों को जनसामान्य तक पहुँचाया जा सके।

*10 गौतम ऋषि* का उल्लेख, त्रेता युग एवं द्वापर युग में मिलता है।वे राहुगण नामक ऋषि के पुत्र थे, इसलिए उन्हें गौतम राहुगण के नाम से जाना जाता है।। 

वे ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा थे।उन्हें मंत्रों का आविष्कारक माना जाता है। ऋग्वेद में उनके नाम से कई सूक्त मिलते हैं, जो उनके महत्व को दर्शाते हैं। 

उनके दो पुत्र ,वामदेव और नोधा, भी मंत्रों के ज्ञाता थे। शतपथ ब्राह्मण में भी गौतम ऋषि का उल्लेख मिलता है, जहां उन्हें पुरोहित के रूप में दर्शाया गया है। 

गौतम राहुगण ने अग्नि अर्थात दिव्य इच्छा की स्तुति में एक स्तोत्र की रचना की, जो शतपथ ब्राह्मण में वर्णित है। 

*11:ऋषि जमदग्नि:*

जमदग्नि ऋषि, भृगुवंशी ऋचीक के पुत्र  थे। जिन्होंने गोवंश की रक्षा के लिए ऋग्वेद के 16 मंत्रों की रचना की। 

*12 महर्षि कपिल:* सांख्य दर्शन के प्रणेता थे जो भारतीय दर्शन के छह प्रमुख आस्तिक दर्शनों में से एक है। उन्होंने अपनी माता देवहुति को वैराग्य और मोक्ष का उपदेश दिया, जो ‘कपिल गीता’ के नाम से प्रसिद्ध है।

*13 कात्यायन ऋषि*

कात्यायन ऋषि एक प्रसिद्ध प्राचीन भारतीय ऋषि थे, जो वैदिक काल के अंतिम महान गणितज्ञों में से एक माने जाते हैं। वे एक व्याकरणविद, वैदिक पुरोहित और ऋषि भी थे। उन्होंने श्रौतसूत्र और गृह्यसूत्र जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी कात्यायनी, जिन्हें नवदुर्गा में से एक माना जाता है, ऋषि कात्यायन की पुत्री थीं। 

*14 कण्व ऋषि*

ऋग्वेद के आठवें मंडल के अधिकांश मंत्रों को कण्व ऋषि और उनके वंशजों द्वारा रचित माना जाता है. 

कण्व ऋषि ने एक स्मृति धर्मशास्त्र की भी रचना की है, जिसे 'कण्वस्मृति' के नाम से जाना जाता है. 15 नारद मुनि, हिंदू पौराणिक कथाओं के एक प्रसिद्ध ऋषि और भगवान विष्णु के भक्त हैं। उन्हें देवर्षि भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है देवताओं का ऋषि। नारद मुनि को तीनों लोकों ; स्वर्ग, पृथ्वी, और पाताल में विचरण करने वाला माना जाता है और उन्हें "सृष्टि के पहले पत्रकार" के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि वे विभिन्न लोकों की खबरें एक-दूसरे तक पहुंचाते थे. नारद मुनि को ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक माना जाता है.

वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे।  उन्होंने कई ग्रंथ लिखे, जिनमें नारद पुराण, नारद भक्ति सूत्र, और पांचरात्र हैं।

इसके अतिरिक्त हिन्दू धर्म में आकाशगंगा में अवस्थित सात तारों के समूह को सप्तऋषि मंडल के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक तारा को एक ऋषि का नाम दिया गया है। इनकी नामावली हर काल में बदली गयी है। अभी तक चार नामावली ज्ञात है जिसकी चर्चा करेंगे।सभी सूचियों को मिलाकर जितने भी ऋषि हैं उनमें कुछ के आध्यात्मिक योगदान की चर्चा ऊपर की जा चुकी है। बाकी बचे ऋषियों पर आगे चर्चा करेंगे।

सप्तऋषि

ऋषियों की संख्या 7 ही क्यों? 

 धार्मिक शास्त्रों में इसके बारे में बकायदा वर्णन किया गया है। तो आइए जानते हैं शास्त्रों में शामिल इससे संबंधित श्लोक व उसका अर्थ- 

श्लोक- 

सप्त ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षय:।

कण्डर्षिश्च, श्रुतर्षिश्च, राजर्षिश्च क्रमावश:।। 

अर्थात: 1. ब्रह्मर्षि, 2. देवर्षि, 3. महर्षि, 4. परमर्षि, 5. काण्डर्षि, 6. श्रुतर्षि और 7. राजर्षि- ये 7 प्रकार के ऋषि होते हैं इसलिए इन्हें सप्तर्षि कहते हैं।

सनातन धर्म के ग्रंथों व पुराणों में काल को मन्वंतरों में विभाजित कर प्रत्येक मन्वंतर में हुए ऋषियों के ज्ञान और उनके योगदान को परिभाषित किया है। इसके अनुसार प्रत्येक मन्वंतर में प्रमुख रूप से 7 प्रमुख ऋषि हुए हैं। 

सप्तर्षि (सप्त + ऋषि) सात ऋषियों को कहते हैं जिनका उल्लेख वेद एवं अन्य हिन्दू ग्रन्थों में अनेकों बार हुआ है।

वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:-

1.वशिष्ठ, 2.विश्वामित्र, 3.कण्व, 4.भारद्वाज, 5.अत्रि, 6.वामदेव 7.शौनक।

इनमें ऋषि वशिष्ठ, विश्वमित्र, कण्व, भारद्वाज एवं अत्रि की चर्चा ऊपर की जा चुकी है।

अब ऋषि वामदेव और ऋषि शौनक के बारे में जानते हैं।

 *ऋषि वामदेव:* 

वे ऋग्वेद के चौथे मंडल के द्रष्टा ऋषि थे, जिसमें अग्नि, इंद्र, वरुण, सोम और आदित्य जैसे देवताओं की स्तुति में रचित मंत्र हैं. 

वे महर्षि गौतम के पुत्र थे।

उन्हें 'जन्मत्रयी' का अर्थात अपने पिछले तीन जन्मों का ज्ञान था. 

वामदेव शिव के भक्त थे और शरीर पर भस्म धारण करते थे. 

वामदेव का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, जहां वे राजा वसुमना को उपदेश देते हैं.

*ऋषि शौनक*

पुराणों के अनुसार ऋषि शौनक एक वैदिक आचार्य थे, जो भृगुवंशी शुनक ऋषि के पुत्र थे। इनका पूरा नाम इंद्रोतदैवाय शौनक था।

बताया जाता है कि ऋषि शौनक ने कुल 10 हज़ार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलापित का विलक्षण सम्मान हासिल किया था। 

इन्हें शौन राजा के नाम से भी जानते हैं।

इन्होंने महाभारत काल में राजा जनमेजय का अश्वमेध और सर्पसत्र नामक यज्ञ संपन्न करवाया था।

ऋषि शौनक ने ऋक्प्रातिशाख्‍य, ऋग्वेद छंदानुक्रमणी, ऋग्वेद ऋष्यानुक्रमणी, ऋग्वेद अनुवाकानुक्रमणी, ऋग्वेद सूक्तानुक्रमणी, ऋग्वेद कथानुक्रमणी, ऋग्वेद पादविधान, बृहदेवता, शौनक स्मृति, चरणव्यूह, ऋग्विधान आदि अनेक ग्रंथ लिखे हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने ही शौनक गृह्सूत्र, शौनक गृह्यपरिशिष्ट, वास्तुशा्सत्र ग्रंथ की रचना भी की थी।

पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण के अनुसार सातवें मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :-

वशिष्ठकाश्यपोऽत्रिर्जमदग्निस्सगौतमः।

विश्वामित्रभरद्वाजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।

अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज। इनमें सभी ऋषियों की चर्चा की जा चुकी है।

इसके अलावा अन्य पुराणों के अनुसार सप्तऋषि की नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वसिष्ठ और मरीचि है।

इस भाग में ऋषि क्रतु, पुलह, पुलस्त्य और मरीचि की चर्चा करेंगे।

ऋषि क्रतु

ऋषि क्रतु को भगवान ब्रह्मा के मस्तिष्क से उत्पन्न माना जाता है।

उन्हें सप्तर्षियो में से एक माना जाता है, जो मनु के युग में महत्वपूर्ण थे।

क्रतु सोलह प्रजापतियों में से एक भी हैं, जो सृष्टि के आरंभ में देवताओं और मनुष्यों के पूर्वज माने जाते हैं।

क्रतु को वेदों का विभाजन करने का श्रेय दिया जाता है।

बालखिल्य ऋषि थे।

क्रतु के 60,000 पुत्र थे, जिन्हें बालखिल्य कहा जाता था, वे अंगूठे के आकार के थे और सूर्यदेव की पूजा करते थे।

क्रतु ऋषि को ध्रुव की प्रदक्षिणा में लीन रहने के लिए भी जाना जाता है, जो निरंतर योग और ध्यान का अभ्यास करते थे। 

 उन्हें भार्गवों में से एक माना जाता है.

ऋषि पुलह

पुलह ऋषि, ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक माने जाते हैं और सप्तर्षि में भी गिने जाते हैं।पुलह ऋषि को प्रजापति भी कहा जाता है, और उन्हें सृष्टि के रचनाकारों में से एक माना जाता है।

पुलह ऋषि को भगवान ब्रह्मा का मानसिक पुत्र माना जाता है, जो उनकी इच्छा से उत्पन्न हुए थे।

महर्षि पुलह ने महर्षि सनंदन को गुरु स्वीकार किया। उनसे शिक्षा दीक्षा ग्रहण की। संप्रदाय की रक्षा की ज़िम्मेदारी ली। आश्रम में रह कर तत्वज्ञान का संपादन किया। बाद में महर्षि गौतम ने इन्हें गुरु बनाया। उन्होंने गौतम को अपने ज्ञान का भंडार दिया। गौतम ने भी पुलह ऋषि से प्राप्त ज्ञान का विस्तार किया।

पुलह ऋषि भगवान शिव के भक्त थे और उन्होंने काशी में पुलहेश्वर नामक शिवलिंग की स्थापना की थी।

पुलह ऋषि ने जगत को आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक शांति प्रदान करने का कार्य किया।

महाभारत के अनुसार, किम्पुरुषों की जाति पुलह ऋषि की संतान है।

ऋषि पुलस्त्य

ऋषि पुलस्त्य, ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक थे। वे सप्तर्षि  में से एक थे। 

ऋषि पुलस्त्य को ब्रह्मा से विष्णु पुराण प्राप्त हुआ था, जिसे उन्होंने पराशर को सुनाया, जिन्होंने इसे मानव जाति के लिए जाना।

ऋषि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा थे, जिनके पुत्र रावण और कुबेर थे। 

कुछ मान्यताओं के अनुसार, ऋषि पुलस्त्य का विवाह कर्दम प्रजापति की पुत्री हविर्भू से हुआ था, और वे कनखल के राजा दक्ष के दामाद भी थे।

एक कथा के अनुसार, ऋषि पुलस्त्य ने मेरु पर्वत पर तपस्या करते समय, अप्सराओं को परेशान करने पर उन्हें श्राप दिया था कि जो भी महिला उनके सामने आएगी, वह गर्भवती हो जाएगी।

 ऋषि पुलस्त्य ने अपने पोते रावण को सहस्त्रार्जुन से मुक्त कराया था। 

ऋषि अंगिरा

अंगिरा ऋषि, जिन्हें वेदों के रचनाकारों में से एक माना जाता है, ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। उन्होंने अग्नि को सबसे पहले उत्पन्न किया और धर्म तथा राज्य व्यवस्था पर महत्वपूर्ण कार्य किया। अंगिरा स्मृति की रचना भी उन्होंने की, जिसमें उपदेश और धर्माचरण की शिक्षा दी गई है। 

अंगिरा ऋषि को वेदों में अग्नि के पहले ज्ञाता के रूप में जाना जाता है। 

उन्होंने धर्म और राज्य व्यवस्था पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया, जिससे समाज में व्यवस्था बनी रहे। 

उन्होंने अपने नाम से अंगिरा स्मृति की रचना की, जो धार्मिक और नैतिक शिक्षाओं का संग्रह है। 

अंगिरा ऋषि की तपस्या इतनी महान थी कि उनका तेज अग्निदेव से भी अधिक था। 

उनके पुत्र बृहस्पति, जो देवताओं के गुरु बने, भी बहुत प्रसिद्ध हुए। 

ऋषि मरीचि

महर्षि मरीचि परमपिता ब्रह्मा के प्रथम मानस पुत्रों में से एक हैं जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मन से हुई मानी जाती है, जिसके कारण उनका नाम 'मरिचि' पड़ा। 

इनका निवास स्थान मेरु पर्वत के शिखर पर बताया गया है। मरीचि सहित अन्य सप्तर्षियों की गिनती १० प्रजापतियों में भी की जाती है। अन्य तीन प्रजापति हैं - नारद, भृगु और प्रचेता। इनकी महानता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अर्जुन को गीता का ज्ञान देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं - 'हे पार्थ! आदित्यों में मैं विष्णु हूँ, तेज में मैं सूर्य हूँ, मरुतों में मैं मरीचि हूँ और नक्षत्रों में मैं चंद्र हूँ।' यही कारण है कि इन्हे प्रजापतियों में श्रेष्ठ समझा जाता है। महाभारत में इन्हे 'चित्रशिखण्डी' कहा गया है।

महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं।

 एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली के अनुसार सप्तर्षि - कश्यप, वशिष्ठ, मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु हैं।

इस प्रकार भारतवर्ष में ऋषि मुनि अध्यात्म के प्रणेता माने जाते हैं।ऋषि वशिष्ठ हर मन्वंतर में निर्विवाद रूप से सप्तऋषियों में एक माने गए हैं। जनमानस के मानसिक विकास एवं शांति में अध्यात्म का बहुत महत्व है।

ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 17 जून 2025

कलम

 रचनाकार - ऋता शेखर 'मधु' 

विधा - नवगीत

विषय - कलम, लेखनी


चिंतन की भीड़ से पन्नों को आस

कलम की सड़क पर शब्द चले खास


परिश्रम के पेड़ पर मीठे लगे फल

स्याही की बूँद से हुलस गए पल

खबरों में शब्दों की हो रही हलचल

बधाई की खुशी में पेन गयी मचल

सधे हुए हाथ जुटे लेखनी के पास


बसा रही लेखनी किताबों के नगर

कृष्ण से प्रीत करे पनघट की डगर

श्याम रंग स्याही के दावात हुए घर

बारिश की नमी में पेन को लगे पर

चिट्ठियों में जा बसे गुलाब के सुवास


हिमालय की चोटी या नदियों की धार

मनहर हर दृश्य को पेन रही उतार

प्रेरणा की गाथा में आशा का संचार

लेखनी को भा रहे प्रभाती सुविचार

नीब से अमर है विश्व का इतिहास


बाइबल कुरान संग रच रही वेद

ग्रन्थों में लेखनी करे न कोई भेद

कविता के लय में तुकों के हैं स्वेद

ज्यों धुन सँवारते बाँसुरी के छेद

कलम से दोस्ती कवि का प्रभास।

ऋता शेखर 'मधु'

17/06/2025

गुरुवार, 12 जून 2025

परिधान

 परिधान

सभ्यता उन्नत हुई, तब आया परिधान।

पहनावा भी है  नियत, है इनका भी स्थान।।


लहँगा चुन्नी साड़ियाँ, दुल्हन का परिधान।

मंडप पर होता नहीं, जींस टॉप में दान।।


पूजाघर में सोच लो, बिकनी का क्या काम।

सूट साड़ी ओढ़नी, लेती उसको थाम।।


 स्वीमिंग पूल में कहाँ, साड़ी बाँधें आप।

सोचो ट्रैक सूट बिना, छोड़ें कैसे छाप।।


सेना वर्दी में रहें, तब होती पहचान।

स्कूल ड्रेस जब से बनी, बच्चे हुए एक समान।।


धोतियाँ शेरवानियाँ, लड़के पहनें सूट।

कश्मीरी जूता सहित, भाते उनको बूट।।


वस्त्रों से माहौल भी, पा जाता है भेद।

मातम में अक्सर मनुज, भाता रहा सफेद।।

ऋता शेखर


क्यों दिखलाते अंग को, कैसी है अब सोच।

गरिमा तन की भूलकर, दिखलाते हैं लोच।।


कितनी फूहड़ सी लगें, आधे वस्त्रों में नार।

उल्टे सीधे तर्क में, छोड़ें सद्व्यवहार।।

गौरवशाली भारत

गौरवशाली भारत देश

दोहे...

यहाँ सनातन सभ्यता, यहाँ अनूठा प्यार।

मेरे भारत देश में, मिलता सद्व्यवहार।।


संस्कृति या अध्यात्म में, सदा रहा अनमोल।

कत्थक गरबा डांडिया, तबला हो या ढोल।।


हड़प्पा मोहनजोदड़ो, कहता है इतिहास।

प्राचीन काल से यहाँ, होता रहा विकास।।


वैदिक कालखंड बने, सभ्यता के प्रमाण।

पूजे जाते देश में, नदी और पाषाण।।


वेद ऋचाएँ हैं गहन, वहाँ भरा है ज्ञान।

भरते दया विनम्रता, महिमामंडित दान।


ऋग्वेद सामवेद में, अनुभव का भंडार।

आयुर्वेद अथर्व रचे, जीवन का हर सार।।


रघुनन्दन के राज्य में, स्थापित है धर्म।

द्वारकाधीश कह गए, रखना सुन्दर कर्म।।


भगवद्गीता के सार में, जीवन की है सीख।

मर्यादा जब भंग हो, लड़ो, न माँगो भीख।।


पूजा होती अन्न की, पूजे जाते नीर।

पर्व त्योहार में बन रहे, केसर वाली खीर।।


ज्योतिष वास्तुशास्त्र गणित, गणना में अनमोल।

अद्भुत संख्या शून्य के, बड़े बड़े हैं बोल।।


राष्ट्र में हो अखंडता, रखना है यह ध्यान।

विश्वगुरू बनकर रहे, आर्यावर्त महान।।


-ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 25 मई 2025

अंधेरों का सफर- हाइकु संग्रह पर पाठकीय प्रतिक्रिया

 


पुस्तक - अंधेरों का सफर ( वृद्धावस्था पर केंद्रित हाइकु)

पृष्ठ - 111

मूल्य - 320.00 रुपये

प्रकाशक - अयन प्रकाशन, नई दिल्ली - 110059, मोबाइल - 9911313272

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*पाठकीय प्रतिक्रिया*

*"अंधेरों का सफ़र" पर प्रकाश डालते हाइकु - ऋता शेखर 'मधु'*


तकनीकी प्रसार से आधुनिक युग अत्याधुनिक हो गया है। आज के युग में पल पल की खबर सभी को है, चाहे वह देश दुनिया की खबर हो, रिश्ते नातों की हो या घर परिवार की। यदि खबर नहीं है तो जीवन की साँझ में बैठे घर के ही लोगों की। सारी दुनिया की कुशलता उनके मोबाइल में है, लेकिन घर में एकाकी जीवन जी रहे माता-पिता, दादा-दादी की जरूरतों की ओर उनकी नजर नहीं। ऐसा नहीं है कि आज की पीढ़ी लापरवाह है या रिश्तों की समझ नहीं। पर थोड़ा स्वार्थ तो है अपनी सुख सुविधा पर। बुजुर्गों की कद्र भी करते हैं , फिर भी कुछ तो है जो बड़े स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं। यह पीढ़ियों से पीढ़ियों तक चलने वाला नियम है। 

आज के युग में साहित्य जगत से जुड़ना आसान है। बिना किसी से मिले भी बड़े बड़े समूह बन जाते हैं और महत्वपूर्ण विषयों पर साझा पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। नवीन विषयों की तार्किक पुस्तकें  पाठकों को लुभा भी रही हैं। 

जापानी छंद विधा हाइकु ने साहित्य जगत में अपना स्थान बनाया है। इसी विधा में डॉ सुरंगमा यादव लेकर आई हैं," अंधेरों का सफर".  बत्तीस हाइकुकारों ने अंधेरों का सफर करते वृद्धावस्था पर प्रकाश डाला है और यह पुस्तक सटीक सारगर्भी बन गयी है। वृद्धावस्था स्वयं पर आई हो या उस अवस्था के बुजुर्ग घर में हैं तो जो भी लिखा गया है, अंतर्मन से लिखा गया है और हर एक हाइकु से पाठक अपने अनुभव जोड़कर समझ सकते हैं। पुस्तक मुझे कुछ दिन पहले मिली थी, तभी से लिखना चाह रही थी। मन में चाह रही तो आज कलम उठा लिया। लगभग सभी रचनाकारों के 30 हाइकु हैं। मेरा प्रयत्न है कि मैं सबके एक हाइकु लूँ।

डॉ सुधा गुप्ता जी अब हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु लिखे शब्द तो अमर होते हैं।

*नीड़ बेकार/ शावक उड़ गए/ पंख पसार।*

रामेश्वर कम्बोज हिमांशु जी के हाइकुओं की व्यथा के बीच इस हाइकु की सकारात्मकता ने आकर्षित किया।

*अकेला कहाँ/ जब बीसों गौरैया/ आ बैठी यहाँ।*

वृद्धावस्था जीवन की अवस्था है। उम्र के इस पड़ाव तक पहुँचने वाले लोग के साथ अनुभवों का मंजूषा होता है। बचपन और युवावस्था की तरह शारीरिक स्वस्थता साथ नहीं रहती तो सब कुछ वीराना सा लगता है।

सुदर्शन रत्नाकर जी के हाइकु इसे बखूबी परिभाषित कर रहे।

*रूठी बहारें/ छूटी अपनी काया/ वक़्त की धारा।*

डॉ कुँवर दिनेश सिंह जी ने बुजुर्गों के साथ एक आदर्श घर की कल्पना की है। 

*शाम सुहानी/ बरामदे में कुर्सी/ बूढ़ों की बानी।*

कमला निखुरपा जी ने बेहद कोमल,प्यारे और नाजुक भाव को अपने हाइकु का हिस्सा बनाया।

*साँझ के संग/ नन्ही भोर चलती/ दादी औ पोती।*

पुष्पा मेहरा जी ने गहन हाइकु की रचना की है। 

*गिनते दिन/ गिना रहे निवाले/ अपने पोसे।*

डॉ शिवजी श्रीवास्तव जी ने आधुनिक युग के वृद्धजन के बारे में सही विवेचना की है। इस तकनीकी युग में वृद्ध अपनी खुशी के लिए किसी के मोहताज नहीं। वे भी आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ चले हैं और अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग हैं। उनकी सक्रियता और जिंदादिली युवा वर्ग को भी पीछे छोड़ रही।

*बूढ़े ठहाके/ युवाओं पर भारी/ पार्क में योग।*

डॉ जेन्नी शबनम जी ने कहा, वृद्धावस्था में अमीर होना कोई मायने नहीं रखता। जब शरीर साथ न दे तो कुछ भी ठीक नहीं होता।

*बदले कौन/ मखमली चादर/ बुढ़ापा मौन।*

ऋता शेखर ने वृद्ध आश्रम के सकारात्मक पहलू को उभारा है।

*वृद्ध आश्रम/ दोस्तों की महफ़िल/ हो गयी जवां।*

डॉ सुरंगमा यादव जी ने बुढ़ापे का सार लिख दिया। वही  अपनाया जाये तो मानसिक कष्ट अवश्य कम रहेगा।

*बुढापा आया/ कितने समझौते/ संग ले आया।*

जिन नौनिहालों को सुखद सार्थक जीवन देने के लिए माता पिता न जाने कितना त्याग करते हैं, वे बाद में उनका अवमूल्यन करते हैं तो बेहद कष्ट होता है।

अनिता ललित जी का ये हाइकु सटीक है।

*लेके आकार/ आँखों के सपनों ने/ दिया नकार।*

डॉ उमेश महादोषी जी ने मार्मिक हाइकु लिखा है। वृद्धों को आश्रम मिलता है, साथ ही यह भी विचारणीय है कि नन्हें बच्चों को

घर से दूर क्रेच में डाला जाता है। दोनों ही घर से दूर होकर अपनत्व खो देते हैं। बचपन और बुढापा, जब एक समान गुजरते हैं तो मार्मिक अभिव्यक्ति सामने आती है।

*एक ही कथा/ क्रेच से वृद्धाश्रम/ उम्र की व्यथा।*

जीवन भर के कर्मों का लेखा-जोखा करती हुई वृद्धावस्था की नजरें अंतिम सफ़र के लिए प्रतीक्षारत हो जाती हैं। डॉ कविता भट्ट जी का हाइकु देखिए।

*प्राण पखेरू/ उड़ने की प्रतीक्षा/ करो समीक्षा।*

भावना सक्सेना जी ने नवीन पीढ़ी को सुन्दर सन्देश दिया है।

*ले लो उनसे/ परंपरा की थाती/ अमूल्य धन।*

बड़े सुझाव देकर पछताते हैं। क्यों ? यह डॉ आशा पांडेय जी के हाइकु में देखिए।

*चले न कुछ/ समझ हुई दूर/ बच्चों के आगे।*

बढ़ती उम्र का असर आँखों, पैरों, दाँतों पर पड़ता है और कृत्रिम चीजों का सहारा लेना बाध्यता हो जाती है। इसे रमेश कुमार सोनी जी ने बखूबी उकेरा है।

*छड़ी-ऐनक/ ज़िंदगी को चलाते/ दाँत नकली।*

मीनू खरे जी ने सारगर्भित बिम्ब लेते हुए वृद्धावस्था की सशक्तता को दर्शाया है।

*बूढ़ी दीवार/ जवान बरगद/ तन के खड़ा।*

अनिता मांडा जी के हाइकु वृद्ध मन के सफर पर लिखती हैं,

*वापसी बेला/ कहाँ-कहाँ डोलता/ मन अकेला।*

प्रियंका गुप्ता जी ने प्राकृतिक बिम्ब के सहारे बड़ों के महत्व को दर्शाया है। 

*कड़ी धूप में/ बहुत याद आये/ पेड़ों के साये।*

भीकम सिंह जी ने वृद्ध के दुखी और व्यंग्य बाणों से आहत अंतर्मन को समझा है।

*खाकर घात/ तलाश रहे वृद्ध/ मुक्ति की रात।*

बच्चे घर के दीपक कहे जाते हैं। उस दीपक को बड़े जतन से संसार में लाया जाता है। रश्मि विभा त्रिपाठी जी ने हाइकु में सारगर्भित सवाल किया है।

*बूढ़े के पास/ घर का चिराग़/ क्यों अँधेरे में?*

डॉ पूर्वा शर्मा जी ने सुन्दर हाइकु लिखे। अपनी सारी जिम्मेदारियां पूरी कर लेने के बाद बुजुर्गों की ज़िंदगी स्वयं की हो जाती है।

*बड़ी बेफ़िक्री/ अब रोज ही होती/ बाग की सैर।*

दादी के चले जाने के बाद कुछ काम अनदेखे रह जाते हैं। दिनेश चन्द्र पाण्डेय जी ने हाइकु में इसे इंगित किया है।

*दादी का चौथा/ तुलसी का बिरवा/ सिधार गया।*

डॉ छवि निगम जी ने आधुनिक अंतर्जाल को सकारात्मकता से जोड़कर लिखा है।

*बेतार जोड़े/ रिश्तों का अंतर्जाल/ वीडियो कॉल।*

विदेश में बस जाने वाले बच्चों के लिए डॉ उपमा शर्मा जी ने लिखा,

*सूना आंगन/ राह तकें बुजुर्ग/ बच्चे विदेश।*

अनिमा दास जी के सभी हाइकु दार्शनिकता से भरे हैं।

*प्राचीन कथा/ शेष शब्द की भाषा/ केवल व्यथा।*

अंजू निगम जी ने वृद्ध मन को यादों से जोड़ा है।

*मन बो रहा/ विगत की माटी में/ यादों के बीज।*

डॉ हरदीप कौर जी ने घर में बुजुर्ग की उपस्थिति को इस तरह से परिभाषित किया है,

*रात अंधेरी/ दे रही है पहरा/ बापू की खाँसी।*

कृष्णा वर्मा जी को बच्चों से कोई शिकायत नहीं। वे बहुत कुछ चाह कर भी नहीं कर पाते। उनके पास अपनी व्यस्तताएँ हैं।

*संतान व्यस्त/ एकाकी जीवन में/ जीवन त्रस्त।*

सविता अग्रवाल सवि जी ने दो बोल के लिए तरसते बुजुर्गों के लिए सुन्दर हाइकु लिखा।

*दर्द ये मेरा/ बंटता तो कटता/ छलके आँसू।*

एकाकीपन झेलते बुजुर्गों के लिए बाहरी आवाज सुनने का माध्यम टेलीविजन बन चुका है जिसे मंजू मिश्रा जी ने इस तरह से लिखा है।

*संगी न साथी/ बस एक टीवी ही/ बतियाता है।*

शशि पाधा जी ने जीवन की सच्चाई को इन शब्दों में उकेरा है।

*उम्र गुजरी/ पाई-पाई जो जोड़ी/ बाँट दी सारी।*

आवरण रश्मि शर्मा जी ने बनाया है जो बिल्कुल विषय के अनुरूप है।

अंधेरों के सफर पर प्रकाश डालते हाइकु समेटने और सहेजने के लिए सुरंगमा यादव जी बधाई की पात्र हैं। उन्हें हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं !!

ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 9 मई 2025

तटस्थता अस्तु

 


तटस्थता क्या है ?

कहीं बुद्धिमानी

कहीं है स्वार्थ

कहीं चालाकी

कहीं परमार्थ


कहीं निष्क्रिय

कहीं उदासीन

कहीं कुटिल

कहीं पदासीन


कहीं समझौता

कहीं समर्पण

कहीं उपेक्षा

कहीं है दर्पण


कहीं समस्या

कहीं समाधान

कहीं मूढ़ता

कहीं है ज्ञान।


कहीं अहंकार

कहीं अपना काम

कहीं युद्ध

कहीं है विराम।


तटस्थ रहने में

कोई न कोई भाव

होता है निहित

तटस्थता में

हित है या अनहित

अंतरात्मा ही जाने

क्या है सम्मिलित


ऋता शेखर

शनिवार, 11 जनवरी 2025

पाँच लघुकथाएँ - ऋता शेखर

1. असर कहाँ तक

"मीना अब बड़ी हो गई है। उच्च शिक्षा लेने के बाद नौकरी भी करने लगी है। कोई ढंग का लड़का मिल जाये तो उसके हाथ पीले कर दें !" चाय पीते हुए सरला ने पति से कहा।

     "हाँ, बेटी के पिता को दिल पर पत्थर तो रखना ही होता है। बेटी को खूब पढ़ाया-लिखाया और वह अब नौकरी भी करने लगी है। फिर भी, उसे विदा तो करना ही है।"

     "किसे विदा करना है पापा?" मीना जाने कब कमरे में आ गई थी।

     "तुम्हें विदा करना है, और किसे। उसी पर बातें हो रही है।" माँ  ने बेटी से कहा।

     "पर मुझे तो यहीं रहना है। मैं अपना घर-द्वार, सखी-सहेलियों को छोड़कर दूसरे घर क्यों जाऊँगी माँ। मेरी नौकरी है तो आर्थिक रूप से आपको किसी पर बोझ नहीं बनने दूँगी।"

      "यही समाज का नियम है। विवाह तो करना ही होता हैं।" माँ ने उसे समझाते हुए कहा।

      "मैं यह नियम मानने से इनकार करती हूँ। विवाह कर मैं किसी को मानसिक प्रताड़ना नहीं दे सकती। कोई भी विरोध अपने घर से आरम्भ होना चाहिए।" मीना के स्वर में दृढ़ता झलक रही थी।

      "कैसी प्रताड़ना देने की बात कर रही हो मीना?"

      "वही, जो आज तक आप पापा को देती आई हो।"

      "मैंने क्या किया है?" बेटी के इस आरोप से सरला घबरा गई।

      "आप हमेशा पापा पर अहसान जताती रही हो, कि विवाह कर, अपने सबों को छोड़कर आप यहाँ आईं। पापा उस समय खुद को अपराधी समझने लगते हैं। आपको भी तो पता था कि यह समाज का नियम है। घरवालों को नहीं छोड़ना था तो अपने ही घर रहना चाहिए था। माना कि पहले के समय आर्थिक मजबूरी रहती थी। लड़की विरोध नहीं कर सकती थी। अब तो ऐसी बात नहीं है।"

      "ये तू क्या बोले जा रही है मीना?"

      "सही तो कह रही हूँ माँ, विवाह एक सामाजिक बंधन है। विवाह के बाद घर छोड़ने के त्याग को बार-बार कहकर किसी को अपराध बोध से ग्रसित रखना भला क्यों? मुझे कोई जबरदस्ती तो अपने घर नहीं ले जा सकता। विरोध मेरा ही है कि मुझे कहीं नहीं जाना।"

      मामूली नोक-झौंक का बेटी पर इतना गहरा असर देख सरला स्तब्ध रह गई। पिता ने पुत्री को निहारा और पीठ पर स्नेह का हाथ रख दिया।


2. सुपर मॉम

"भैया, मम्मी को पहले भी जब थकान लगी थी, तो उस वक्त आपने दिखाया क्यों नहीं?"

     "मम्मी तो सुपर मॉम हैं। सब कुछ सम्भाल लेती हैं। कभी उन्हें थकते नहीं देखा। काम करते हुए थोड़ी बहुत थकान तो हो ही जाती है, इसमें कौन-सी बड़ी बात है। लेकिन तुझे कैसे पता कि मॉम को थकान लग रही थी।" भैया ने सफाई देते हुए कहा।

     "मैं परसों भी आई थी। अपने लिए कभी कुछ न कहने वाली मॉम ने हताश स्वर में कहा था--"बहुत थकान लग रही है। चलते हुए लगता है कि अभी गिर पड़ूँगी।" 

      "मैंने कहा था कि डॉक्टर के यहाँ चलते हैं। उन्होंने कहा--"नहीं, डॉक्टर की जरूरत नहीं, वैसे ही ठीक हो जाउँगी। पहले भी कई दफा ऐसा हुआ है, फिर अपने आप ठीक भी हो गई थी।"

      बहन ने एक कागज़ थमाते हुए भाई से कहा--"मैंने उसी दिन उनका ब्लड टेस्ट करवाया था। भैया, ये आपकी सुपर मॉम की ब्लड रिपोर्ट आई है।"

      "ओह ! विटामिन 'डी' और हीमोग्लोबिन, दोनों इतना कम।" रिपोर्ट भैया के हाथों में फड़फड़ा रही थी।

       "तुम दोनों बेकार ही परेशान हो रहे हो। मैं तुम दोनों के लिए कुछ बनाकर लाती हूँ।" माँ ने बात टालने के लिए कहा।

       "आप सुपर मॉम हो। मेटल मॉम नहीं।" कहते हुए भैया ने माँ को कुर्सी पर बैठा दिया और खुद रसोई में चले गए।

       "माँ, यह आपकी भी भूल थी कि खुद को न थकने वाली मशीन समझा। अब दवाएँ समय पर लेते रहें और स्वयं को स्वस्थ रखें। पढ़े लिखे होने का यह फायदा दिखना चाहिए।" बेटी और बेटा एक साथ चिर्रा पड़े। 

       बच्चों की झिड़की सुन, माँ को अपनी माँ की याद हो आई। शरीर में हड्डियों का घनत्व कम होने के कारण ऑस्टियोपोरोसिस का शिकार होकर वह दस वर्षों तक बिस्तर से उठ ही नहीं पाई थी। काश उस समय यही बात मैंने भी, अपनी माँ को कही होती?


3. छाया दान

एक-एक कर सारे गमले ठेले पर चढ़ाए जा रहे थे। आदित्य बाबू हर गमले की पत्तियों पर हाथ फिराते, फिर जाने देते। बड़े नावनुमा गमले में बरगद का बोनसाई था। जिसमें तीस वर्षों से उनकी पत्नी वट सावित्री पूजा करती आई थी। एक बार पानी की टँकी बेकार हो गयी तो उसमें मिट्टी भरकर आम का वृक्ष लगाया गया था, ताकि सत्यनारायण की पूजा में आम के पल्लव मिल सकें। वैसे ही दान के लिए आँवले का पेड़ और शिव पूजन के लिए बेल का पेड़ भी लगा हुआ था। तीन तल्ला घर में ऊपरी छत पर पूरा एक बगीचा सुशोभित था।

      अब गुलाब के गमले ठेले पर जाने लगे। सफेद, लाल, गुलाबी, काले, पीले गुलाब; सबका अपना-अपना महत्व और सबकी अपनी-अपनी सुंदरता थी।

      इसी तरह बोगनविलिया, जिनिया, लिली, चमेली, बेली, कनेर, अपराजिता, अड़हुल, मीठा नीम के पौधे भी घर से निकलने लगे। हर पौधे के साथ आदित्य बाबू की आँखों मे नमी बढ़ती ही जा रही थी।

       तभी, पड़ोसी अरुण बाबू ने उनका हाथ थाम लिया और बोले--"पूरा बगीचा किधर भेज रहे भाई। क्यों हटा रहे हो यह सब?"

      आदित्य बाबू बोले--"रिटायरमेंट के बाद, यह शहर छोड़कर जा रहा हूँ भाई। अब बच्चे जिस शहर में रहेंगे, वहीं हम भी रहेंगे। पेड-पौधों को सूखने के लिए नहीं छोड़ सकता।" आवाज में दर्द साफ झलक रहा था।

      "तो इन्हें पड़ोसियों में बाँट देते भाई।"

      "बात तो सही है अरुण बाबू, लेकिन किसी पर अवांछित बोझ नहीं डाल सकता। इसे नर्सरी वालों के हवाले कर रहा हूँ। वही इसकी कीमत समझेंगे। कोई वहाँ से पैसे देकर खरीदेगा तो वह भी कीमत जानेगा।"

      "कितने पैसे दे रहा है नर्सरी वाला?"

      "दान में दी जा रही वस्तु की कीमत नहीं ली जाती।"

       तभी, पास खड़ी अरुण बाबू की माँ बोल पड़ीं--"यह छाया दान है बेटा, पर्यावरण रक्षा के लिए इस दान का बहुत पुण्य मिलेगा तुम्हें ! इन्हें हम अपने घर ले जाते हैं। इनके सहारे तुम्हारा स्नेह भी हमें याद आता रहेगा।"

       आदित्य बाबू ने झुककर माता जी के पाँव छू लिए।


4.परछाई

जीवन के उतार-चढ़ाव समझने की कोशिश में वह थोड़ा परेशान रहने लगा था। एक दिन, प्रोफ़ेसर ने उससे कहा--"वह सूरज उगने के साथ ही उठे और सूरज की ओर मुँह करके बैठ जाए। उसके बाद उसकी जो परछाई बनेगी, वह दिन के पहर बीतने के साथ-साथ कैसे-कैसे बदलती है, उसे लिखता जाए और मुझे दिखाया करे।"

      आज उसने यही करने का फैसला किया। सूरज उगा, वह भी उठा और एक खुली जगह पर आसन जमा लिया। सुबह, दोपहर, शाम और रात की परछाई का सर्वेक्षण था। निर्देशानुसार मुँह हमेशा पूरब की ओर ही रखना था। रात को वह प्रोफेसर के घर पहुँचा। प्रोफेसर ने उसे सर्वेक्षण पढ़ने को कहा। उसने पढ़ना शुरू किया--"सुबह में, लम्बी सी परछाई मेरे पीछे थी। दोपहर को वह मेरे आस-पास सिमट आई थी। शाम को परछाई फिर से लम्बी हुई। लेकिन शाम के समय वह मेरे आगे की तरफ थी। रात में तो बिल्कुल ही गायब हो गई थी। हाँ, एक बार दिन में परछाई धूमिल भी हुई थी। यह तब हुआ, जब आसमान में बादल आये थे।"

      प्रोफेसर ने उससे कहा--"तो समझ लो कि सूर्य जीवन है और परछाई है, यह जमाना। मनुष्य जब जन्म लेता है तो अपनी ऊर्जा, अपनी सफलता से पूरे जमाने को अपने पीछे चला सकता है। सफलता की ऊँचाई पर सारा जमाना उसके इर्द-गिर्द सिमटा रहता है। जीवन की संध्या में उसे जमाने के पीछे चलना होता है, और फिर मिट जाना होता है। मनुष्य मात्र एक बिम्ब है, जो सफलता की परछाइयाँ बनाता हुआ, एक दिन मिट जाता है। बादलों के कारण परछाई धूमिल हो सकती है, पर कुछ देर के लिए ही।"

      उसने अपनी उम्र देखी। और परछाइयों को अपने इर्द-गिर्द समेटने के लिए निकल पड़ा।


5. बेटी बड़ी हो गई

"आज हमारी बिटिया अट्ठारह साल की हो गई। अब तुम अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकोगी। मैं मतदाता सूची में तुम्हारा नाम दर्ज करवा देता हूँ।" पुत्री के अट्ठारहवें जन्मदिवस पर पिता ने बिटिया को बधाई देते हुए कहा।

     "लेकिन पापा, मैं तो चार वर्ष पहले ही बड़ी हो गई थी।"

     "अच्छा ! ये आपको किसने बताया?"

      "चार वर्ष पहले ही दादी ने कहा था कि अब मै बड़ी हो गई हूँ, और मुझे लड़कों से दूर रहना है।"

      मातृ-विहीन बिटिया को उसके पिता शारीरिक रूप से बड़े हो जाने और बौद्धिक रूप से उम्र का फर्क, चाहकर भी समझा नहीं सके थे।

*****

ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 8 दिसंबर 2024

मध्य में क्या

 जिंदगी की स्लेट पर

जन्म या मृत्यु लिखना

आरम्भ और अंत है।

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य वृहद उपन्यास है।


जन्म तो संयोग है

मृत्यु एक वियोग है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य मिलन का पर्याय है।


जन्म एक भोर है

मृत्यु निशा की ओर है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य चिलचिलाती धूप है।


जन्म उन्नयन है

मृत्यु अवनयन है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य उतार चढ़ाव है।


जन्म जो मुखड़ा है

मृत्यु भी तो टेक है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य अंतरे का विस्तार है।


जन्म गंगोत्री है

मृत्यु सागर समागम है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य ऊँची नीची धारा है।


जन्म जब बीज है

मृत्यु विशाल ठूंठ है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य फूल और काँटें हैं।


जन्म मतला है

अंत मकता है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य ग़जल है।


जन्म है अनुक्रम

मृत्यु है मतिभ्रम

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य  कथा है।


जन्म  प्रस्फुटन हो

मृत्यु भी विघटन है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य बसंत और पतझड़ है।


जन्म आशा है

मृत्यु में निराशा है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य खुशी या अवसाद है।


-ऋता शेखर

शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

डमरू घनाक्षरी


डमरू घनाक्षरी - शृंगार रस

वर्णिक छंद- 8, 8, 8, 8 की एक पंक्ति

हर अठकल अमात्रिक - त्रिकल त्रिकल द्विकल से

चार समतुकांत पंक्तियाँ


अनत जगत यह, सरल सहज वह,

करत नयन नत, मदन भजन रत।1

कमल नयन लख, चरण शरण रख,

असत गरल हत, नमन करत शत।2

तपन सहन कर, हवन भवन धर,

धरम करम गत, फलत रमन तत।3

बरस सघन घन, हरष रतन मन।

बढ़त फसल सत, मगन सदन बत। 4

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द्वितीय छंद


चमक दमक कर, कनक कलश  भर,

चलत अचल हल, जनमत सिय थल।1

चहक चहक खग, नटत अयन मग,

चहल पहल ढल, मगन भवन तल।2

जनक नगर घर, लखन दरस कर,

हरष हँसत जल, नवल कँवल दल।3

सकल चयन कर, वरण रमण वर,

सरल सहज पल, झरत सरस फल।4

- ऋता शेखर

गुरुवार, 29 फ़रवरी 2024

महिला दिवस विशेष १- भारतीय सिनेमा के निर्माण में महिलाओं की भूमिकाएँ

 भारतीय सिनेमा के निर्माण में महिलाओं की पार्श्व भूमिकाएँ – ऋता शेखर ‘मधु’

सिनेमा को सबसे लोकप्रिय कला माध्यम के रूप में देखा जाता है।

एक वक्त था जब भारतीय सिनेमा में महिलाओं को फिल्मों में काम करना या फिर पर्दे पर

महिलाओं का दिखना अच्छा नहीं समझा जाता था लेकिन आज महिलाएं न सिर्फ फिल्मों में किरदार

निभा रही हैं बल्कि फिल्मों में निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखन, गीतकार, संगीतकार का भी काम

कर रही हैं।

इस आलेख में सिनेमा के निर्माण में पर्दे के पीछे से सहयोग देने वाली महिलाओं की चर्चा करेंगे|

१.निर्माता,निर्देशक,पटकथा लेखन २.गीतकार एवं ३.संगीतकार

१. निर्माता, निर्देशक एवं पटकथा लेखक के रूप में महिला

१.फातिमा बेगम

फातिमा बेगम का जन्म 1892 में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था।

फातिमा बेगम पहली महिला फ़िल्म निर्देशक बनीं जिन्होंने रूढ़िवादी विचारों को तोड़कर इस दुनिया में

कदम रखा था और सिनेमा जगत को नया आयाम देने का काम किया। फातिमा बेगम न सिर्फ

भारत की पहली फिल्म निर्देशक हैं बल्कि अपने दौर की प्रसिद्ध अभिनेत्री भी रही हैं। उन्होंने पटकथा

लेखक के तौर पर भी काम किया है।

1926 में पहली बार फातिमा ने ‘बुलबुल-ए-परिस्तान’ नामक फिल्म का निर्देशन किया था और सिनेमा

में निर्देशन करने वाली पहली महिला बनने का भी खिताब जीता। 1926 में इस फ़िल्म का निर्देशन

करने के बाद फातिमा को काफी कुछ झेलना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और 1928 में

फिल्म रांझा, 1929 में फिल्म शकुंतला का निर्देशन किया।

२.जोया अख्तर

जोया अख्तर एक भारतीय फिल्म निर्देशक-लेखक हैं। जोया अख्तर बहुत ही कम समय में अपनी

कड़ी मेहनत से बॉलीवुड के सफल निर्देशकों में शुमार हो चुकीं हैं।

जोया का जन्म 14 अक्टूबर 1972 को मुंबई में जावेद अख्तर के घर में हुआ था। जावेद अख्तर

बॉलीवुड के मशहूर लेखक,कवि हैं। इनकी माँ का नाम हनी ईरानी है, जोकि एक बॉलीवुड अभिनेत्री

है।

जोया की पहली निर्देशित फिल्म ‘लक बाय चांस’ थी, जिसे दर्शकों और आलोचकों नें काफी सराहा था।

फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की| ज़ोया को पहचान फिल्म ‘जिंदगी ना मिलेगी दुबारा’

से मिली। ज़ोया को इस फिल्म के लिए फिल्म फेयर के बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड से भी सम्मानित

किया गया।

उनकी प्रसिद्ध फ़िल्में हैं- दिल धड़कने दो, ज़िंदगी मिलेगी ना दुबारा, लक बाय चांस, बॉम्बे टॉकीज,

तलाश।

३. रीमा कागती

रीमा कागती भारतीय फिल्म निर्देशक और स्क्रीनराइटर हैं। रीमा ने हिंदी सिनेमा में बतौर निर्देशक

फिल्म ‘हनीमून ट्रेवल्स प्राइवेट लिमिटेड’ से डेब्यू किया था।


रीमा कागती का जन्म गुवाहटी, असम में हुआ था। उन्होंने मुंबई स्थित सोफिया कॉलेज से इंग्लिश

लिट्रेचेर में स्नातक की डिग्री हासिल की है। साथ ही उन्होंने सोफिया कॉलेज से ही सोशल

कम्युनिकेशन में परा-स्नातक की डिग्री ली है।

रीमा कागती ने अपने करियर की शुरुआत बतौर सहायक निर्देशक की| इस दौरान उन्होंने हिंदी

सिनेमा के कई दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया, जिसमे फरहान अखतर(दिल चाहता है), आशुतोष

गोविरकर (लगान)हनी इरानी (अरमान), मीरा नायर (वैनिटी फेयर) शामिल हैं।

रीमा ने हिंदी सिनेमा में बतौर फिल्म निर्देशक अपने करियर की शुरुआत वर्ष 2006 में फिल्म

‘हनीमून ट्रेवल्स प्राइवेट लिमिटेड’ से की। इसके बाद रीमा ने फिल्म ‘तलाश’ निर्देशित की| फिल्म

बॉक्स-ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई थी। वर्ष 2016 में रीमा ने फिल्म ‘गोल्ड’ पर काम करना शुरू

किया। जोया अख्तर और रीमा कागती ने मशहूर कॉमिक बुक पर आधारित नई फिल्म 'द आर्चीज' को

भारतीय दर्शकों के हिसाब से बनाया है और पर्यावरण को भी इसमें शामिल किया है। इस फिल्म के

अलावा रीमा कागती ने जोया अख्तर के साथ मिलकर फिल्म रोड ट्रिप पर आधरित फिल्म ;जी ले

जरा; लिखी है।

४. मेघना गुलजार

आज के समय की एक और उल्लेखनीय नाम मेघना गुलजार का है जो फिल्म निर्माता, निर्देशक एवं

पटकथा लेखक हैं| मेघना गुलजार का जन्म 13 दिसम्बर 1973 को मुंबई में हुआ था। वह हिंदी सिनेमा

के मशहूर संगीतकार-गीतकार गुलजार और अभिनेत्री राखी गुलजार की बेटी हैं। उन्होंने हिंदी फिल्म

इंडस्ट्री में अपने करियर की शुरुआत 1999 में 'हू तू तू'  नाम की फिल्म से की थी। उन्होंने फिल्म के

लिए पटकथा लिखी। इसके बाद कई फिल्मों का निर्देशन किया| 2015 में ;तलवार; और 2018 में

;राज़ी; जैसी फिल्मों से सफलता मिली। ;राज़ी; ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता

और मेघना को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला। मेघना गुलज़ार अपनी फिल्मों के विषय चयन

और भावनात्मक पहलू के लिए जानी जाती हैं। उनकी 2002 की फिल्म ;फिलहाल; में सरोगेसी के बारे

में बात की गई थी जो उस समय काफी साहसिक विकल्प था। फिल्म ;तलवार; से आरुषि तलवार

हत्याकांड को संबोधित किया। ;छपाक; नामक फिल्म पर काम किया जो एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी

अग्रवाल के जीवन पर आधारित एक जीवनी फिल्म है।

पांच साल के लम्बे अंतराल के बाद उन्होंने फिल्म ‘जस्ट मैरिड’ और ‘दस कहानियाँ’ निर्देशित की। दोनों ही फिल्मों ने बॉक्स-ऑफिस पर ठीक-ठाक व्यापार किया था।

५. गौरी शिंदे

गौरी शिंदे आज के समय की एक और प्रमुख फिल्म निर्माता हैं, जो 'जीवन का हिस्सा' फिल्में बनाने

के लिए जानी जाती हैं, जो दर्शकों के दिल में एक संदेश, आंखों में आंसू और चेहरे पर मुस्कान छोड़

जाती हैं। उन्होंने 2012 में दिल छू लेने वाली फिल्म 'इंग्लिश विंग्लिश' से अपनी शुरुआत की, जिसने

व्यावहारिक रूप से सभी पुरस्कार जीते। यह एक महिला द्वारा अपनी असुरक्षाओं पर काबू पाने और

अपनी एक पहचान बनाने के बारे में थी जिसे उसने अपनी माँ को समर्पित किया था। शिंदे की यह

फिल्म आलोचकों दर्शकों सबको बेहद पसंद आई, साथ ही यह फिल्म टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में भी

दिखाई गयी। शिंदे को उनकी इस फिल्म के लिए झोली भर अवार्ड्स भी मिले। उन्हें इस फिल्म के

लिए फिल्मफेयर बेस्ट डेब्यू आवर्ड से भी सम्मानित किया गया| इसके बाद उन्होंने एक और अद्भुत

फिल्म ;डियर जिंदगी; बनाई| इस फिल्म ने करियर-उन्मुख, शहरी महिलाओं द्वारा सामना किए जाने

वाले मुद्दों को संबोधित किया। गौरी शिंदे ने नारीवाद और शहरीवाद के साथ मानसिक स्वास्थ्य और

भावनात्मक मुद्दों को संभाला और एक शानदार फिल्म बनाई जिसे व्यावसायिक और समीक्षकों

द्वारा खूब सराहा गया।

उनकी शार्ट फिल्म ‘ओह मैन’ (2001) को बर्लिन फिल्म फेस्टिवल के दौरान स्क्रीनिंग के लिए चुनी

गयी थी।

६. मीरा नायर

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने वाली मीरा भारतीय समाज में गहरे तक पैठी हुई खोखली

मान्यताओं पर फिल्म बनाने के लिए जानी जाती हैं. उनकी फिल्में द नेमसेक, मॉनसून वेडिंग और

सलाम बॉम्बे आज भी एक जरूरी फिल्म के तौर पर देखी जाती हैं. उनकी ये फिल्में 'बाफ्टा' और

'गोल्डन ग्लोब' जैसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड्स के लिए भी नामित हो चुकी हैं.

७. कोंकणा सेन शर्मा

पहले से ही एक शानदार अभिनेत्री और अपनी पसंद से कुछ न कुछ कहने वाली अदाकारा के रूप में

जानी जाने वाली कोंकणा सेन शर्मा ने निर्देशक की भूमिका भी निभा ली है। उन्होंने 2006 में एक

बंगाली फिल्म से निर्देशन की शुरुआत की और 2017 में हिंदी फिल्म ;ए डेथ इन द गुंज; बनाई। इस

फिल्म को कई अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में प्रदर्शित किया गया और सर्वश्रेष्ठ फिल्म के साथ-साथ

सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के रूप में कई पुरस्कार जीते।

आगे भी कई नाम हैं जिनमें दीपा मेहता, जद्दन बाई, किरण राव, सई परांजपे, अरुणा राजे, शोभना

समर्थ, माधुरी दीक्षित, दुर्गा खोटे, कल्पना लाजमी, श्रीदेवी, नंदिता दास, दुर्गा खोटे, ज्योति देशपांडे

आदि प्रमुख हैं|

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2] महिला गीतकार


बॉलीवुड की टॉप 10 महिला गीतकारों में 1. कौसर मुनीर 2. अनविता दत्त 3. रानी मल्लिक 4. माया

गोविन्द 5. प्रिया सरिया 6. रश्मी सिंह 7. गरिमा वहल 8. अभिरुचि चाँद 9. सीमा सैनी 10. प्रभा

ठाकुर हैं|

इनके अतिरिक्त अमृता प्रीतम, इंदु जैन, हेमा सरदेसाई, इला अरुण, हार्ड कौर, स्नेहा खानवलकर, पद्मा

सचदेव, श्रुति पाठक को भी बॉलीवुड की गीतकार महिलाओं में गिना जा सकता है। इन सबके के बीच

माया गोविंद का नाम उल्लेखनीय है|

माया गोविंद

बतौर गीतकार माया गोविंद का करियर 1972 में शुरू हुआ । उन्होंने फिल्म ‘आरोप’ के गाने लिखे।

इस फिल्म से उनका गाना ‘नैनों में दर्पण है’ बहुत चर्चित हुआ। यहां से माया का फिल्मों में गाने

लिखने का काम शुरू हुआ। उन्होंने अपने करियर में 350 फिल्मों के लिए 750 से ज़्यादा गाने लिखे।

इसमें ‘आंखों में बसे हो तुम’, ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ फिल्म का टाइटल ट्रैक, हम तुम्हारे हैं सनम

फिल्म का ‘गले में लाल टाई’, शीशा फिल्म का ‘यार को मैंने मुझे यार ने’ जैसे गाने शामिल हैं। जब

समय के साथ संगीत बदलने लगा तब भी माया ने पॉपुलर सिंगर फाल्गुनी के गाने ‘मैंने पायल है

छनकाई’ के बोल लिखे, जो कि बहुत बड़ा हिट गाना साबित हुआ। आरोप फ़िल्म का गीत, नैनों में

दर्पण है, को लोगों ने बहुत पसंद किया|

दूरदर्शन पर प्रसारित हुए धारावाहिक ‘महाभारत’ के लिए उन्होंने काफी गीत, दोहे और छंद लिखे।

इसके अलावा ‘विष्णु पुराण’, ‘किस्मत’, ‘द्रौपदी’, ‘आप बीती’ आदि उनके चर्चित धारावाहिक रहे।

सैटेलाइट चैनलों के दौर में भी माया गोविंद के लिखे शीर्षक गीतों की खूब धूम रही।

3] महिला संगीतकार

१. इशरत सुल्ताना

इशरत सुल्ताना का नाम बिब्बो के नाम से प्रसिद्द है। वह भारतीय फिल्म इतिहास में महिला

संगीतकारों की पहली खेप में थीं । उन्होंने भारत की स्वतंन्त्रता से पहले 1934 में फिल्म ;अदल ए

जहांगीर; फिल्म में संगीत दिया था, जोकि बॉलीवुड की प्रसिद्द अभिनेत्री नरगिस की माताजी

जद्दनबाई के भी संगीत देने के एक साल पहले की बात है। इशरत सुल्ताना ने इसके अलावा ;कागज

की लड़की; जोकि 1937 में आई थी। उसके गानों को भी संगीतबद्ध किया था।

२.जद्दनबाई

भारतीय फिल्मों में जद्दनबाई का नाम बहुत ऊँचा है। वह भारत के सिनेमा जगत तकनीकी रूप से

पहली संगीतकार थीं। उन्होंने 1935 में 'तलाशे हक' में संगीत दिया था। उन्होंने संगीत की शिक्षा

कोलकाता के श्रीमंत गणपत राव से ली थी। इसके बाद उन्होंने 1936 में आई फिल्म 'मैडम फैशन' में

न सिर्फ काम किया बल्कि उन्होंने फिल्म के लिए संगीत देने के साथ साथ उसका निर्देशन भी किया।

३. सरस्वती देवी

पारसी परिवार में जन्मी और उन दिनों बॉम्बे टॉकीज़ के कुछ संगीतकारों के साथ काम कर रहीं

सरस्वती बाई ने सबसे पहले अछूत कन्या के लिए ‘ मैं बन की चिड़िया ...’ गाना कम्पोज़ किया था।

४. उषा खन्ना

उषा खन्ना भारतीय फिल्म इंडस्टी की ऐसी महिला संगीकार हैं, जिनके काम को लोग कभी नहीं भूल

सकते। उनके लोकप्रिय गानों में ;छोड़ो कल की बातें;,शायद मेरी शादी का ख्याल;ज़िंदगी प्यार का

गीत है; और ;आप तो ऐसे न थे’ जैसे हिट शामिल हैं। उन्होंने 1940 में पहली बार फिल्म;दिल दे के

देखों; में संगीत दिया था, जिसमें आशा पारेख ने काम किया था और यह उनकी डेब्यू फिल्म थी और

इस फिल्म के कारण वह सुपरहिट हो गयी थी। उन्होंने करीब 40 वर्षों तक सक्रिय तौर पर गाने

बनाये। उषा खन्ना ने हवस, दिल देके देखों, साजन की सहेली और आप तो ऐसे न थे जैसी फिल्मों में

बेहतरीन संगीत दिया।

५. लता मंगेश्कर बनाम आनंद घन

लता जी ने सिर्फ गाने ही नहीं गाये बल्कि फिल्मों में और ख़ासकर मराठी फिल्मों में संगीत

दिया। उन्होंने संगीतकार के रूप में अपना असली नाम न देकर आनंद घन के नाम का

इस्तेमाल किया। लता मगेशकर ने पहली बार सन 1955 में मराठी फिल्म 'राम-राम पाऊंण'

में संगीत दिया था। जिसके बाद उन्होंने 1963 में 'मराठा टिटुका मेळावा', 1963 में 'मोत्यांची

मंजुला', 1965 में 'साधी माणसे' 1969 में उन्होंने 'ताम्बाडी माती' जैसी फिल्मों में भी संगीत

दिया है। उन्हें 1965 में आई फिल्म 'साधी माणसे' के लिए महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें बेस्ट

म्यूजिक डायरेक्टर का सम्मान दिया था। उनका संगीतबद्ध किया एक गाना ‘ऐरणीच्या देवा

तुला...’ बहुत लोकप्रिय भी हुआ है।

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रविवार, 5 फ़रवरी 2023

जब हम सीख लेते हैं

 निभ जाते हैं रिश्ते

जब हम सीख लेते हैं

दोषों को नजरअंदाज़ करना


जी लेते हैं तमाम उम्र

जब हम सीख लेते हैं

बेवज़ह ही मरना


मिलती है सफलता

जब हम सीख लेते हैं

समय पर काम करना


पा लेते हैं निदान

जब हम सीख लेते है

समस्याओं को पकड़ना


मिल जाते हैं रास्ते

जब हम सीख लेते हैं

निडरता से पग धरना


कुसुमित होती है बगिया

जब हम सीख लेते हैं

काँटों संग निखरना


निखर जाता है लेखन

जब हम सीख लेते हैं

भाव सुन्दर भरना


खिल जाते हैं चेहरे

जब हम सीख लेते हैं

मुसकानों से सँवरना


पास आती हैं खुशियाँ

जब हम सीख लेते हैं

प्रकृति के संग गुजरना


जिंदगी हो जाती खूबसूरत

जब हम सीख लेते हैं

प्रीत-डोर में ठहरना


जीत लेते हैं जमाना

जब हम सीख जाते हैं

हरसिंगार सा झरना

-- ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

बेटियाँ वरदान हैं

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस













संसार के सुन्दर सृजन में, बेटियाँ वरदान हैं।

माता पिता की लाडली अब बन रही अभिमान हैं।।

बेटी पढ़े आगे बढ़े यह कह रही सरकार है।

उसकी खुशी सबसे जरूरी जो बनी आधार है||1


बगिया सुवासित देखकर के, गुनगुनाती बेटियाँ|

नभ में पतंगों को उड़ाकर, मुस्कुराती बेटियाँ||

अम्बर सितारे टिमटिमाए, जगमगाई बेटियाँ|

कलकल नदी की धार बनकर, खिलखिलाई बेटियाँ||2


जब बूँद बनकर बारिशों में, नाचता सावन कभी|

रुनझुन हुई है पायलों की, हँस दिए आँगन सभी||

शृंगार बालों का हुआ है, झूलती है चोटियाँ|

चकले थिरक जाते खुशी से, बेलती जब बेटियाँ||3


लगती कमलदल सी सुकोमल, धैर्य में है झील सी|

जगमगाती दीप बनकर, रोशनी कंदील सी||

प्राची हँसी पूरब दिशा में भोर की लाली बनी|

धरती सुहानी बेटियों सी खेत की बाली बनी||4


वह चाहते हैं बेटियों को, सरस्वती बसती जहाँ |

जो पूजते हैं बेटियों को, लक्ष्मी रहती वहाँ||

कुछ पर्व भारत में बने जो, बेटियों से हैं खिले|

होंगी नहीं जब बेटियाँ तब, राखियाँ कैसे मिले||5


कुछ शील्ड भारत को मिले हैं, बेटियों के काम पर।

वह हों बछेन्द्री पाल या फिर, कल्पना के नाम पर।।

वैमानिकी तकनीक हो या, हो पहाड़ी चोटियाँ।

बढ़ती गईं आगे हमेशा, हिन्द की ये बेटियाँ।।6


भारत बहादुर बेटियों से, पा रहा गौरव कई।

वह पाँच महिला हैं खिलाड़ी, जो भरें सौरभ कई।।

झूलन क्रिकेटी टीम में रह, जब बनी कप्तान थीं।

तब गेंदबाजी में रमी वह, देश में वरदान थीं।।7


जमुना मुक्केबाज ने तो, रच दिया इतिहास है।

चौवन किलो की वर्ग श्रेणी, वह उन्हीं से खास है।।

तसनीम सोलह वर्ष में ही, रैंक नम्बर वन बनी।

गुजरात की महिला खिलाड़ी, बैडमिंटन बन तनी।।8


जब खेल लंबी कूद अंजू, चैंपियन बनती रहीं|

अनगिन पदक वह नाम अपने, देश के करती रहीं||

आसाम में जनमी हिमा ने,रेस को करियर बनाया|

वह गोल्ड मेडल पाँच जीती, देश का गौरव बढ़ाया|९


माता पिता का साथ पाकर खिल उठी हैं बेटियाँ।

चाहे पढ़ाई नौकरी हो, चल पड़ी हैं बेटियाँ।।

जूडो कराटे भी सिखाएँ, आत्मविश्वासी बनाएँ।

अपनी सुरक्षा कर सकें वे, आत्मबल साहस बढायें।।10


सौन्दर्य का प्रतिमान बनकर वह बनी अभिकल्पना|

माधुर्य का अभिदान पाकर, सृष्टि की अनुरूपना||

जिसने सजाए भाव सारे, क्यों वही अनजान है?

दो-दो घरों से मान पाना, क्यों महाअभियान है??11


जो पूजते नौ देवियाँ पर, बेटियाँ भाती नहीं|

समझे पराया धन हमेशा, वंश की थाती नहीं||

बहुएँ सभी को चाहिए पर, बेटियाँ लाते नहीं|

जब हों मुखौटे इस तरह के, मान वे पाते नहीं||12

--- ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

फिल्म पर दोहे












लाइट ऐक्शन कैमरा, तीन शब्द है फ़िल्म।

संप्रेषण संवाद का, बहुत बड़ा है इल्म।।1


सुन्दर सज्जा नृत्य की, आकर्षक तस्वीर|

देशभक्ति या प्रेम की, सुन्दर सी तहरीर||2


तेरह सन उन्नीस में,प्रथम फिल्म थी मूक|

मिली साल इकतीस में, मौन रील को कूक||3


राजा हरिश्चंद्र रहा, मूक फ़िल्म के पास|

आलम आरा स्वर सहित, रचे फ़िल्म इतिहास||4


सोलह नौवें माह का, फ़िल्म दिवस श्रीमान|

सस्ती मिलती है टिकट, यही मान पहचान||5


फ़िल्म जगत के नाम कुछ, भारत में हैं ज्ञात।

टॉलीवुड तेलुगु-तमिल,बॉलीवुड विख्यात।।6


मिले सिनेमा में हमें, चलते फिरते दृश्य।

कुछ हैं बालक के लिए,रहते कुछ अस्पृश्य।।7


फाल्के जी के नाम पर, बने हैं पुरस्कार।

अभिनय निर्देशन बने, उत्कृष्ट फिल्मकार।।8


पार्श्व गायकी के लिए, लता रहीं उत्कृष्ट।

पुरुष वर्ग में थे रफी, रहे जो अति विशिष्ट।।9


शोमैन जो कहे गए, वह थे राज कपूर।

सुन्दर मधुबाला हुईं, दुनिया में मशहूर।।10


कवि प्रदीप ने रच दिया, देशभक्ति का सार।

मन वीणा के तार पर, मधुरिम है झंकार।।11


फिल्में मन पर डालती, अपना बहुत प्रभाव।

उनमें कुछ सन्देश हों, संग रहे कुछ चाव।।12

रविवार, 25 दिसंबर 2022

यात्रा

यात्रा-

यात्रा के हैं अनगिन रूप
कभी छाँव मिले कभी धूप
प्रथम यात्रा परलोक से
इहलोक की
नौ महीने की विकट यात्रा
बन्द कूप में सिमटी हुई यात्रा
जग से जुड़ता जब नाता
भोर से सायं तक
पृथ्वी की यात्रा
गंगोत्री से खाड़ी तक
गंगा की यात्रा
बचपन से बुढ़ापा तक
देह की यात्रा
कभी पैदल यात्रा
कभी पटरी पर चलती
रेल की यात्रा
नभ में बादलों के बीच
यान की यात्रा
सागर में
डूबती उतराती यात्रा
कभी दैनिक यात्रा
या फिर साप्ताहिक
मासिक या वार्षिक
समय की पाबंदी पर
बस यात्रा ही यात्रा
क्योंकि करनी है
मुख से पेट तक
भोजन को यात्रा
हर यात्रा में करनी होती तैयारी
बस चूक हो जाती है
अंतिम यात्रा की तैयारी में
जाने कितना कुछ
छोड़ जाते हैं ऐसा
जिसे स्वयं ठिकाने लगाना था
पर अपनी देह को ठिकाने
कोई न लगा सकता
हर आत्मनिर्भर होकर भी
बेबस है
परावलम्बन होना ही है
फिर घमंड किस बात का
इस यात्रा का टिकट तो है
बस तिथि का नहीं पता।
कैसे किस विधि जाना है
रीति का पता नहीं
– ऋता शेखर मधु

सोमवार, 5 सितंबर 2022

लघुकथा- भविष्यतकाल

 

भविष्यतकाल


'वाह ममा, आज तो आपने कमाल की पेंटिंग बनाई है,' अपनी चित्रकार माँ की प्रशंसा करते हुए तुलिका बोल पड़ी|
'अच्छा बेटा, इसमे कमाल की बात क्या लगी तुम्हें यह भी तो बताओ,' 

ममा ने बिटिया की आँखों में देखते हुए पूछा|
'देखिए ममा, ये जो प्यारी सी लड़की बनाई है न आपने, वह तो मैं ही हूँ| उसके सामने इतनी सारी सीढ़ियाँ जो हैं वे हमारे सपने हैं जो हम दोनों को मिलकर तय करने हैं, ठीक कहा न ममा' तुलिका ने मुस्कुराते हुए कहा|
'बिल्कुल ठीक कहा बेटे, अब इन सीढ़ियों की अंतिम पायदान को देख पा रही हो क्या'ममा ने पूछा|
'नहीं ममा, क्या है वहाँ?'
'वहाँ पर तुम्हारे सपनों का राजकुमार है जो तभी नजर आएगा जब तुम पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जाओगी' ममा ने हल्के अ़दाज़ में कह दिया|
' ममा, जब मैं घोड़े पर चली जाऊँगी तब भी तुम ये सीढ़ियाँ मत हटाना,' एकाएक थोड़े उदास स्वर में तुलिका कह उठी|
'ऐसा क्यों कह रही बेटा,' ममा भी थोड़ी मायूस हो गई|
' यदि मैं खुद गिर गई, या उस राजकुमार ने धक्का देकर गिरा दिया तो मैं इन्हीं सीढ़ियों से वापस लौट सकूँगी, इन्हें हटाओगी तो नहीं न ममा', तुलिका सुबक उठी|
'नहीं बेटा, नहीं हटाऊँगी,' ममा ने तुलिका को गले लगाते हुए कहा|
ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 24 अगस्त 2022

सार गीता का समझकर मन मदन गोपाल कर

2122 2122 2122 212

जो मिला वरदान में वह जन्म मालामाल कर|
मान रख ले तू समय का जिन्दगी संभाल कर ||१

ध्यान हो निज काम पर ही यह नियम रख ले सदा |
बात यह अच्छी नहीं तू बेवजह हड़ताल कर ||२

कर कहीं उपहास तो मनु जाँच ले अपना हृदय |
सामने उस ईश के तू क्यों खड़ा भ्रम पाल कर ||३

त्याग के ही भाव में संतोष का धन है छुपा |
सार गीता का समझकर मन मदन-गोपाल कर ||४

बाँध लेता प्राण को जब मोह का संसार यह |
शुद्ध पावन सद्-विचारी उच्च अपना भाल कर ||५

इस जगत में मान ले तू प्रेम है सबसे बड़ा |
हो न ममता साथ तो कब कौन होगा ढाल पर||६

काट कर वन, घर बसाया खग बिना घर के हुए |
पा गया तू क्या मनुज जब हैं न पंछी डाल पर ||७

@ ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 10 अगस्त 2022

डेढ़ इंच मुस्कान - क्षणिका संग्रह-समीक्षा

 



डेढ़ इंच मुस्कान- क्षणिका संग्रह
क्षणिकाकारः श्रीराम साहू

समीक्षक ; ऋता शेखर ‘मधु’

क्षणिकाओं की शान- डेढ़ इंच मुस्कान

मुझे मेरी सद्य प्रकाशित पुस्तक , मृणाल का बदला, के साथ श्वेतांशु प्रकाशन की ओर से उपहारस्वरूप डेढ़ इंच मुस्कान मिली है। अब आप सोच रहे होंगे यह मुस्कान कैसे मिली। मैं बात कर रही हूं श्री राम साहू जी की क्षणिका संग्रह 'डेढ़ इंच मुस्कान' की। आज जबकि मुस्कान भी मिलीमीटर में मिलती है तो डेढ़ इंच तो बहुत बड़ी बात है। पुस्तक का शीर्षक बहुत ही अच्छा है।आवरण पृष्ठ पर मुस्कुराती हुई स्माइली का प्रयोग आकर्षक है|

क्षणिका एक मारक विधा है जो चिंतन की ओर अग्रसर करती है। किसी विशेष क्षण में हुए अनुभव को चंद पंक्तियों में उतार देना क्षणिकाकार की खासियत होती है। क्षणिकाएं लघु कविता नहीं होती। क्षणिका के क्षेत्र में लिख रहे रचनाकारों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए तब वे लघु कविता एवं क्षणिका के अंतर को समझ सकेंगे।। लेखक श्री राम साहू जी अपनी बात क्षणिका के माध्यम से रखते हुए कहते हैं कि जिंदगी/ हादसों व विडंबनाओं का/ शिकार है…शेष कुशल मंगल है/ बाकी तो आप सभी पाठक /अधिक समझदार हैं… यहीं से लेखनी ने कमाल दिखाना आरम्भ कर दिया है ।।

भूमिका प्रसिद्ध व्यंग्यकार गिरीश पंकज जी ने लिखी है।पंकज जी का कहना है कि लेखन के क्षेत्र में नन्हीं विधाए, जैसे हाइकु, तांका, लघुकथा, क्षणिकाएँ आदि फास्ट फुड की तरह हैं| जिस तरह लोग अधिक देर तक भोजन करना पसंद नहीं करते, उसी तरह समयाभाव के कारण लम्बी रचनाएँ भी पढ़ना पसंद नहीं करते|

नन्हीं रचनाओं का सृजन चुनौतीपूर्ण होता है| बहुत कुछ कहने के लिए चंद शब्द मिलते है| यह लेखक की काबिलियत होती है कि गागर में कितना सागर भर पाए| विषय चयन भी सोच समझकर करना होता है| उस हिसाब से लेखक ने समयानुसार विधा का चयन करके अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है| सामाजिक सरोकार से लेकर राजनीति, पर्यावरण को विषय बनाते हुए उन्होंने गंभीर सृजन किया है|

कथ्य एवम शिल्प आकर्षित करते हैं।राजनीति और सत्ता को विषय बनाया जाए तो सर्वप्रथम रामराज्य को ही सबसे आदर्श राज्य माना जाता है। किन्तु आदर्श होने के बावजूद आलोचना से कोई भी राज्य अछूता नहीं रह पाता। राज्य को स्वार्थी होने के दृष्टिकोण से मन्त्रणा देने वाले मंथरा सरीखे लोग हैं, तो राजा के हर कृत्य पर अँगुली उठाने वाले धोबी सरीखे भी हैं। जब- जब रामराज्य की चर्चा होगी, ये दोनों स्वयमेव शामिल माने जाएँगे।

* हम /रामराज्य/ स्थापित/ करने में/ सफल हुए हैं /धोबी-मंथरा/ गली-गली/ पल रहे हैं।

चंद शब्दों वाली इस विधा में तुकांत का भी निर्वहन किया जाए तो क्षणिकाओं का स्वरूप अलग ही दिखता है। आदी और अवसरवादी का प्रयोग नितांत खूबसूरत बन पड़ा है। राजनीति पर निशाना साधने वाली यह रचना विपक्ष की भूमिका पर व्यंग्य करता हुआ थोड़ा स्मित भी दे जाता है। जब से सत्ता है तब से महंगाई एक मुद्दा है। चीजों के दाम हर किसी के राज्य में बढ़ते रहे हैं और सत्तापक्ष को निशाना बनाने का हथियार भी बनते रहे हैं। यह विरोध जोरशोर से इसलिए होता है कि विपक्ष का पक्ष मजबूत हो। लोकतंत्र जब भ्रष्टाचार का पर्याय बन जाये तो इस तरह की क्षणिकाएँ जन्म लेती हैं। बेईमानी में ईमानदारी, विरोधाभास का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत कर रहा। विरोधाभास लिए कई क्षणिकाएँ ध्यानाकर्षण करती हैं|

*महंगाई के खिलाफ/उनका/ विरोध अभियान/ युद्धस्तर पर/ जारी है। 'उल्लू' सीधा करने की /पूरी तैयारी है।।

आंदोलन करवाकर तहलका मचाना और स्वयं बच निकलने वाले नेताओं पर मारक सृजन है। बेचारी जनता उन नेताओं के प्रभाव में आकर अपना समय, जोश और समर्पण दाँव पर लगाने के लिए तैयार रहती है| जेल तक चली जाती है और आंदोलन का सृजनकर्ता चैन की वंशी बचाता सुख की नींद सोता है|

* उनके/ आंदोलन से/ तहलके मच गए। सब ने जेल की/ राह ली, वे अकेले बच गए।।

सत्ताधारी नेताओं के बदलते व्यवहार को चंद शब्दों में दर्शाना बड़ी कला है| उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ अपने पद और गरिमा को ईमानदारी से निभाने के लिए लेना होता है|किन्तु शपथ ग्रहण के बाद वे कुर्सी बचाने के चक्कर में ईमानदारी कहीं खो जाती है|

विरोधाभास से रची गयी क्षणिका अच्छी बनी है| मनुष्य का नैतिक पतन उसके उत्थान में सहायक है, इससे और कितना अधिक गिरेगा आदमी|

* सचमुच/ आज आदमी/ काफी तरक्की/ कर चुका है। नीचे गिरने की/ हद तक, ऊपर/ उठ चुका है।।

श्रीराम साहू जी ने क्षणिकाओं में बहुत बारीकी से हर उस कथ्य को उभारा है जो आम मनुष्य सोचता है|एक तरफ प्रगति के नाम पर पारिवारिक विखंडन पर रचना है तो दूसरी तरफ कार्य प्रणाली में कागजी घोड़े दौड़ा कर कार्य की संपूर्णता दिखाने की बात कही गई है| जिनके बड़े बड़े बोल होते हैं उनके काम कम होते हैं| हर समस्या पर सिर्फ वार्ता होती है|

*उन्होंने/ प्रगति के/ नए आयाम/ गढ़ लिए हैं/ पहले चारदीवारी में/ रहते थे/ अब केवल दीवार/ खड़ी कर लिए हैं||

* उन्हें/ काम से कम/ बात से अधिक/ वास्ता है| उनकी मान्यता है/ हर समस्या का हल/ केवल वार्ता है ||

क्षणिकाओं में कभी तुकांत का प्रयोग मनभावन है तो कभी अतुकांत में सधी लेखनी चली है| रचनाओं को पढ़ते समय मुस्कान भी सहज रूप से आती है| आपने सत्ता और सत्ताधारियों पर चुटीले तंज किए हैं जो हर आदमी मुस्कुराते हुए स्वीकार कर ले| कथ्य और शिल्प का निर्वहन है और भाव भी भरपूर है|

कहीं- कहीं रचना सपाट बयानी भी लगी , किंतु कथ्य प्रभावशाली होने के कारण प्रभाव छोड़ने में सफल रही|

प्रायः पुस्तक का समर्पण लिखते समय उसी विधा का चयन किया जाता है जिस विधा में पुस्तक बननी है| क्षणिका की पुस्तक का समर्पण पृष्ठ हाइकु में होने के कारण आरम्भ में थोड़े भ्रम की स्थिती बन रही| ऐसा प्रतीत होता है जैसे हाइकु संग्रह हो|

लेखक श्रीराम साहू जी 1984 से लेखन में सक्रिय हैं। उनकी रचनाओं का पत्रिकाओं में प्रकाशन 1987 से जारी है। आप फेसबुक में विभिन्न संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान प्राप्त कर चुके हैं।

श्रीराम साहू जी की लेखनी सतत क्रियाशील रहे, इसके लिए हार्दिक शुभकामनाएँ।

पुस्तक की साजसज्जा, पन्नों की स्तरीयता एवं छपाई…सभी सुन्दर हैं।

पुस्तक परिचय

पुस्तकः डेढ़ इंच मुस्कान

लेखकः श्रीराम साहू

पृष्ठः ११२

मूल्यः २५०/-

प्रकाशकः श्वेतांशु प्रकाशन, नई दिल्ली

प्रकाशन का मोबाइल नम्बरः 8178326758, 9971193488

दोहा में नटराज


विषय- नटराज
============
शिव  ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में
चित्र गूगल से साभार



















1

चोल वंश ने कांस्य से, सृजित किया नवरूप।
तांडव मुद्रा में ढले, शिवजी लगे अनूप।।

2

शिव नर्तक के रूप में, कहलाये नटराज।
बस एक बार प्रेम से, दें उनको आवाज।

3

नृत्य करें नटराज जब, स्पंदित हो आकाश।
महायोगी महेश वह, उनसे है कैलाश।।

4

नटराजन के नृत्य से, कण कण भरे प्रमोद।
जग सारा गतिशील है, डमरू करे विनोद ।।

5

घूम रहे ब्रह्मांड में, नीलकंठ नटराज।
अंतरिक्ष की ओम ध्वनि, खोल रही यह राज।।

6

शर्व: हरो मृडो शिवः, या कह लें नटराज।
एक नाम है तारकः, डमरू जिनका साज़।।

7

शिव वेदांगों शाश्वतः, उनकी कृपा अपार ।
करने जग-कल्याण वह, आते बारम्बार ।।

8

चार भुजाओं से सजे, कदम उठे ज्यों ताल |
हर मुद्रा को सीखकर, नर्तक हैं मालामाल||

9

प्रीत भरा संसार हो, सद्भावी हो ठाँव |
बौनारूपी द्वेष पर, थिरके शिव के पाँव ||

10

एक हाथ में दिख रहा, डमरू जैसा साज| 
दूजे से जग को अभय, देते हैं नटराज ||

11

अनल घेर में हैं घिरे, लेकर ऊर्जा स्रोत |
आभामंडित शिव धरे,नृत्य पक्ष प्रद्योत||( नृत्य की एक मुद्रा)

@ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 13 जून 2022

पाठकीय में कमल कपूर जी की पुस्तक

पाठकीय प्रतिक्रिया-ऋता शेखर ‘मधु’

रंग भरे दिन-रैन- दोहा संग्रह
लेखिका- कमल कपूर
प्रकाशन- अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- 260/-
पृष्ठ- १०५













छंद विधान के अनुसार लेखन का अपना सौन्दर्य होता है| मात्र ४८ मात्राओं में कोई धारदार बात कह देना दोहा छंद की विशेषता है| इसी ध्र को महसूस करते हुए हम यह पुस्तक पढ़ेगे|

पुस्तक लेखन की दुनिया के सहृदय लेखक रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी को समर्पित की गई है| उसके आगे लेखिला का गुरु के प्रति समर्पित दोहै है जो गुरु के प्रति लेखिका का सम्मान प्रदर्शित करता है|

पहले गुरु की वंदना करूं हाथ में जोड़। जिसने चमकाया सदा जीवन का हर मोड़।।

कमल जी ने कुछ दोहे कलम को समर्पित किए हैं। लिखते कथा कहानियां मीठे मोहक गीत। लिखे खत मनुहार के कलम मनाती मित्र।

अनुक्रम में चार विषयों के अंतर्गत उप विषय रखे गए हैं|

लेखिका ने अपनी बात में लिखा है की उनके 480 दोहे पूजा के वे दीप हैं जो उन्होंने कृतज्ञ भाव से देवी प्रकृति की उपासना करते हुए प्रज्वलित किए हैं।

अनुक्रम में चार विषयों के अंतर्गत उप विषय भी रखे गए हैं। प्रथम विषय रंग भरे दिन रैन के अंतर्गत पहला उप विषय रंग भरे दिन रैन ही है।

बरसों से मौसम सभी, देख रहे भर नैन।
रूप बदलते हर घड़ी, रंग भरे दिन- रैन।।

यहाँ पर दोहाकार ने मौसम की आवाजाही और उस के बदलते स्वरूप को अपने अनुभव से जोड़कर लिखा है। यह मौसम कभी खुशियों के भाव भरते हैं और कभी उदास कर जाते हैं। सभी भाव के अपने रंग होते हैं जिसमें जीते हुए मनुष्य अपने दिन और समय को व्यतीत करता जाता है। प्रकृति के सानिध्य में दिन का सबसे उर्जात्मक समय सुबह का समय होता है। जिसने भोर को देखा और आनंद उठाया वही सुबह के खुशनुमा रंग को आत्मसात कर सकता है।

माखन से उजली सुबह ,पाखी दल के गीत।
हँसी खुशी है घूमती, बनके जुड़वा मीत।।

सुबह के लिए माखन का बिंब लेना आकर्षित करता है।

एक और दोहा देखिए…

रजनीगंधा रेन थे,दिन थे शोख़ गुलाब।
दिन में हाथ किताब तो, रातों को थे ख्वाब।।

एक दोहा देखिए जिसमें कवयित्री का हल्का सा चुहल नजर आता है।

जाड़े में रविराज जी, करते नखरे खूब।
बादल से नाराज हो, गए नदी में डूब।।

मौसम में जेठ सबसे गर्म महीना माना जाता है। यह गर्मी जहाँ पशु पक्षी समुदाय को त्रस्त करती है, परेशान करती है वहीं यह गुलमोहर में नई रंगत पैदा करती है।

धूप जेठ की सींचती, गुलमोहर में जान।
सूरज से ले लालिमा, बढ़ती अद्भुत शान।।

जब दिवस का अवसान होता है तो भोर में जितने स्वर्ण रश्मियाँ बिखरी थीं उन्हें समेटने का काम भी शुरू होता है। और यह काम सांझ के जिम्मे आता है।

किरण-गठरिया लाद के, चली केसरी शाम।
पहुँचेगी यह रात तक, अँधियारे के गाम।

अंधियारे के गाँव में क्या होता है इसका दर्शन करते हैं।

नीरवता में गूंजता, मलयानिल संगीत।
चाँद फलक पर आ गया, हुई रात की जीत।।

एक अन्य सुंदर दोहा देखिए…

कुमुद कुमुदिनी से सजे, नदी सरोवर ताल।
लहरों पर तेरा करें, उजले बाल-मराल।।

ऋतुओं में सबसे मनमोहक ऋतु बसंत का होता है। यह बहारों का मौसम है| ये बहार फूलों और तितलियों से आती है| चारो ओर उनका साम्राज्य दिखता है| यह बात दोहा के माधयम से कवयित्री ने इस प्रकार लिखी है|

बासंती ऋतु ने किया, अजब अनोखा काम।
सारा गुलशन लिख दिया, अलि-तितली के नाम।।

चारों ओर बढ़ते प्रदूषण और अरशद हवा की कमी की ओर कवित्री ने बहुत ही सरल और सरस भाव से इशारा किया है। जहां वह मंदाकिनी हो कदंब की छांव। खोजें चलकर आज ही ऐसा कोई गांव।।

ऋतुओं का उल्लेख करते हुए महाकवि निराला के अवतरण दिवस को लेखिका ने मनभावन तरीके से लिखा है।

मधुरिम तिथि थी पंचमी, ऋतु बसंत अभिराम।
जब भारत के पटल ने, लिखा ‘निराला’ नाम।।

लेखक जब कभी कलम उठाता है तो उसकी कोशिश रहती है की वह मानव मन को भी परिभाषित करें और प्रेरणा की पतवार पकड़कर मनुष्य को निराशा के दलदल से पार कराने का प्रयास करें| लेखिका ने भी मानव मन पर और रिश्तो पर अच्छे दोहे सृजित किए हैं| मन को धैर्य बंधाने का प्रयास देखिए…

झड़ गई सारी पत्तियां, पर ना पेड़ उदास|
सांस सांस में पल रहे, नव जीवन की आस।।

कवयित्री ने सबके लिए मंगल कामना करते हुए लिखा है-

दीपक रोज जलाइये, एक सुबह इक शाम|
महारोग से जूझते, सब लोगों के नाम।।

लेखिका ने खिड़की को विषय बनाते हुए लिखा है…

खिड़की के आगे कभी, ना चिनना दीवार।
सिसक रही बाहर खड़ी, ताजा मधुर बयार।।

इस दोहे में मकानों के बीच में दूरी ना होने का जिक्र हुआ है। शहरों में सटे-सटे मकान बनते हैं जिनसे खिड़की का फायदा खत्म हो जाता है। जिस खिड़की को हवा और धूप के लिए बनाया जाता है सामने दीवार उठ जाने से, वह घर वंचित रह जाता है।

कमल जी की लेखनी माँ के लिए बहुत भावपूर्ण चली है और खूब चली है।

माँ की महिमा का करें, कवि कोई गुणगान।
भरनी होगी और भी, उसे कलम में जान।।

सचमुच माँ को शब्दों में बाँध पाना बहुत कठिन है। इसी संदर्भ में दूसरा दोहा भी बहुत सुंदर है।

माँ बनकर ही जानती, बिटिया मां का मोल।
कानों में तब गूँजते, माँ के मीठे बोल।।

जब रिश्तो की बात चले तो भाई बहन का जिक्र ना हो, ऐसा नहीं हो सकता।

डोर कलाई बाँध के, तिलक लगाकर भाल।
भाई का सुख माँगती, बहना हुई निहाल।।

शेष अशेष के अंतर्गत एक दोहा जो आकर्षित कर रहा…

दीवारें कब तक सहे, तस्वीरों का भार|
मन में उन्हें सजाइए, चले गए जो पार।|

अक्सर घर में उनके फोटो रखे जाते हैं जो दुनिया छोड़ कर चले जाते हैं। कवयित्री का कहना है कि दीवारों पर सजाने के बजाय उन्हें मन में स्थान देना चाहिए ताकि वह हर जगह साथ रहे| उनकी तस्वीरें मन के दीवार पर होनी चाहिए , घर की दीवारों पर नहीं।

एक दोहा और है जो सीधे मन तक पहुंच रहा…

राहें तो सीधी सभी, टेढ़े मन के मोड़।
कभी हमें जो तोड़ दें, और कभी दे जोड़।|

कमल जी ने बहुत सार्थक तरीके से या बात समझाई है कि रास्ते हमेशा सीधे ही रहते हैं| यह मनुष्य का मन होता है जो राहों को सरल या कठिन बनाता है|

कवयित्री कमल कपूर जी की लेखनी सतत चलती रहे, इसके लिए दिल से शुभकामनाएँ !!