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बुधवार, 15 अगस्त 2018

बाबला- कहानी

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बाबला       
(कहानी पर आपकी राय बहुमूल्य है...इस विधा पर काम करना ठीक है या नहीं? कमियाँ/खूबियाँ बताएँ, धन्यवाद )

बेला की खुशियाँ थामे नहीं थम रही थी| चारो ओर से बधाइयों का ताँता लगा था| मम्मी पापा की इकलौती लाडली का मैट्रिक बोर्ड का परिणाम आ चुका था| अपने स्कूल में तो बेला ने टॉप किया ही था साथ ही जिले में भी दूसरे स्थान पर आई थी| बेला थोडी गम्भीर प्रकृति की थी पर इतनी भी नहीं कि खुशियाँ मनाने के समय नाच गा न सके| पिता की राजकुमारी बिटिया ने उनका नाम रौशन किया था| सबसे कहते फिर रहे थे,”कौन कहता है कि बेटियों से पिता का सर गर्व से ऊँचा नहीं होता| आज तो मैं सातवें आसमान पर हूँ|”

बेला के पिता उस जमाने के थे जब घर की बहुओं का नौकरी करना अच्छा नहीं माना जाता था| किन्तु वह औरतों की आजादी के समर्थक थे| उन्होंने अपनी इंटर पास पत्नी को स्नातक की डिग्री दिलवाई और शिक्षण प्रशिक्षण कोर्स करवाया| उसके बाद नौकरी के लिए राजी हुए और बेला की माँ विद्यालय में शिक्षिका बन गयी|

तब तक बेला का जन्म हो चुका था| बेला के कोख में आने से लेकर जन्म तक और उसके लालन पालन में बेला की माँ को पति और संयुक्त परिवार का भरपूर सहयोग मिला| विचारों के अग्रणी पिता ने दूसरी संतान को लाना उचित नहीं समझा| पिता की लाडली पढने में काफी होशियार थी| विद्यालय के हर कार्यकलाप में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती और पुरस्कार जीतती| विद्यालय में सबकी चहेती बन गई थी वह|

समय पंख लगाकर तेजी से उड़ चला था| बिटिया की पढाई के लिए हर संभव सहयोग के लिए तत्पर रहते| बेला के रिजल्ट ने साबित कर दिया था कि इस तरह के परिणाम के पीछे घर का वातावरण भी बहुत सहयोगी होता है|

घर में आयोजित हल्के फुल्के समारोह में कुछ रिश्तेदार और पड़ोसी शामिल थे|

‘हलो बेला, बहत बहुत मुबारक हो| और मिस्टर वर्मा, आपको भी बहुत बधाई हो| बिटिया के रिजल्ट से हम सभी बहुत गर्व का अनुभव कर रहे हैं|’ पड़ोस में नए आए अंकल को बेला नहीं पहचानती थी| वह ‘धन्यवाद’ कहकर आगे बढ़ गई|कुछ देर बाद वह अंकल फिर नेहा के सामने थे,’ देखो बेटा, यह है मेरा बेटा बाबला|’

‘अच्छा! हाय”, कहकर बेला ने नमस्ते की मुद्रा में हाथ जोड़ा| उसके बाद बेला ने महसूस किया कि वह जिधर भी जा रही है , उस बाबला की नजरें निरंतर उसका पीछा कर रही हैं| कुछ देर उसने अनदेखी की| बाद में वह असहज महसूस करने लगी| उस वक्त वह यह बात किसी से कह भी नहीं सकती थी| पार्टी खत्म होने से कुछ देर पहले ही बेला अपने कमरे में आकर बैठ गई|

‘’ अरे यार बेला, चल न डांस करते हैं’,सहेली सुवर्णा चहकते हुए कमरे में आ गई|

‘’नहीं सुवर्णा, मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही, तू पार्टी एंजॉय कर| मैं थोड़ी देर में आती हूँ|’ बेला को विश्वास था कि तबतक वो लड़का बाबला चला जाएगा|

थोड़ी देर बाद वह कमरे से बाहर आई और सच में उसे न पाकर बहे खुश हुई|

‘बेटा, अब कहाँ एडमिशन लेने का इरादा है’, एक आंटी ने पूछा|

‘महिला कॉलेज या फिर साइंस कॉलेज में’

‘ठीक है बेटा, मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं,’कहकर आंटी ने प्यार से उसे देखा|

दूसरे दिन बेला ने दोनो महाविद्यालयों में फॉर्म भर दिया| प्रथम सूची में ही उसका नाम आ गया, जैसा कि होना ही था| बेला की इच्छा थी कि वह विज्ञान महाविद्यालय में नाम लिखवाए किन्तु पहली बार उसने महसूस किया कि बंधन क्या होता है| दादाजी ने साफ शब्दों में मना कर दिया कि सहशिक्षा वाले कॉलेज में नहीं पढ़ेगी| घर में कोई विरोध न कर पाया या शायद पिताजी भी न चाहते होंगे| तभी तो यह कहकर टाल दिया कि दादा की मर्जी के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते| माँ ने भी चुप्पी साध ली| थोड़े बेमन से उसका नाम लिखवा दिया गया|

जब से क्लास शुरू होना था, उसके एक रात पहले का सारा समय रोमांच में बीत रहा था| बेला को खुशी थी कि अब वह स्कूल ड्रेस के बंधन से आजाद हो रही| समय पर प्रार्थना भी नहीं करना होगा| पूरे दिन भी नही रहना होगा जैसे स्कूल में बाँध कर रखा जाता है|अब वह अपनी मर्जी की मालकिन हो जाएगी| तरह तरह के ड्रेस के बारे में सोचती हुई वह सो गई| सुबह उठी तो जल्दी जल्दी उसने सारा काम किया क्योंकि समय पर कॉलेज बस पकड़ना था| समय पर बस स्टॉप पर पहुँच गई| वहाँ पर सीनियर लड़कियाँ भी थीं|

‘वाह बेला, चुड़ीदार में तो बहुत जँच रही’, एक सीनियर दीदी ने कहा तो बेला मुस्कुरा उठी|

‘अच्छा बेला, तुम्हें यह फिल्मी गीत याद है...रेशमी सलवार कुर्ता जाली का’

‘रूप सहा नहीं जाए नखरे वाली का’, आगे की पंक्ति गाते हुए बेला हँस पड़ी| हँसते हुए उसकी नजर थोड़ी दूर खड़े लड़कों पर पड़ गयी| वे सब भी बस के इंतेजार में खड़े थे| वह बाबला भी वहाँ खड़ा था और उसे एक टक देखे जा रहा था| बेला मुँह फेरकर खड़ी हो गई और सोचने लगी ”तो अब ये भी यहीं पर रहेगा, पर यह मुझे घूरता क्यों है’’| तब तक एक के बाद एक दो बसें आ गईं| एक बस लड़कियों की थी और दूसरी लड़कों की|

बस के अन्दर बेला ने राहत की साँस ली| दोनों बसें आपस में रेस लगाती चल रही थीं| कभी लड़कों की बस आगे होती तो लड़के चिल्लाते हुए अपनी खुशी जाहिर करतीं| जब लड़कियों की बस आगे जाती तो लड़कियाँ भी कहाँ पीछे रहतीम| उस समय बस शोर में डूब जाता| करीब पैंतालीस मिनट का समय लगा महिला महाविद्यालय आने में| सारी लड़कियाँ उतरने लगीं| बेला ने देखा कि लड़कों की बस आगे जा चुकी थी|

रंग बिरंगे कपड़ों में नई लड़कियों का हुजूम कॉलेज के अन्दर दाख़िल होने लगा|

‘ओए लालपरी, इधर अइयो जरा,एक आवाज आई|

बेला ने इधर उधर देखा|

‘अरे, इधर उधर क्या देख रही हो| इधर आओ मेरी लालपरी’,और उसके बाद लड़कियों का एक झुंड खिलखिला उठा|

बेला सकुचाती हुई वहाँ गई|

‘बोलिए दीदी’

“दीदी किसको बोल रही’

‘जी आपको,आप हमसे सीनियर हो न’

‘ये कैसे जाना कि हम सीनियर हैं’

बेला चुप रही| उसे अचानक याद आया कि सुवर्णा बता रही थी कि पहले दिन रैगिंग भी होता है| तब ज्यादा जवाब नहीं देना चाहिए|

‘ अब ये बताओ, ये ड्रेस कितने में ली,’ नया सवाल आया|

‘जी, माँ ने खरीदी है’’

‘ओए, यह तो दूध पीती बच्ची है| अभी तक माँ इसके कपड़े खरीदती है’, इतना कहकर वह ठठाकर हँस पड़ी और साथ ही हँस पड़ीं उसकी साथी लड़कियाँ| बेला रुआँसी हो गई| उसने इधर उधर देखा| सामने से वही दीदी आ रही थी जो बस स्टॉप पर मिली थी|

‘क्यों तंग कर रही बेचारी को, अच्छा बेला, एक गाना सुना दो हम सबको’

‘पर हमें तो गाना नहीं आता’,

‘वही सुना दो जो स्टॉपेज पर गा रही थी|

‘अच्छा, रेशमी सलवार कुर्ता जाली का....’बेला ने रुकते हुए किसी तरह से गाया|

‘रूप सहा नहीं जाए नखरे वाली का...’इस बोल को पूरा करते हुए दीदी ने कहा, अब जाओ|

‘क्यों जाने दिया, अभी और रैगिंग लेनी थी न,’ बेला ने जाते जाते सुना|

‘नहीं जी, सीधी है बेचारी, देखा नहीं कैसी रोनी सूरत बना ली थी उसने|’

आज तो दीदी ने बचा लिया, यह सोचती हुई वह आगे बढ़ी| तबतक उन शैतान लड़कियों ने दूसरा शिकार ढूँढ लिया और उसके पीछे पड़ गईं|

वह पहला दिन गुजर गया| नियत समय पर बस भी आ गई| स्टॉप पर वह उतरी और घर जाने लगी| कुछ दूर आगे बढ़ने पर उसने महसूस किया कि कोई उसे देख रहा है| वह झट पीछे मुड़ी तो देखा कि सड़क के पहले मकान की गेट पर वह खड़ा था| तेज गति से बढ़ती हुई आगे जाकर मुड़ी तब उसकी सांस आई|

दूसरे दिन, तीसरे दिन वैसा ही हुआ|

‘’माँ, जब मैं आती हूँ तो आप भी स्टॉपेज पर रहा करो,’बेला माँ से बोली|

‘’क्यों बेटा, क्या बात है’’

‘’वो वो...’इसके आगे वह कह नहीं पाई|

दूसरे दिन जब वह स्टॉप पर पहुँची तो माँ खड़ी थी| वह निश्चिंत होकर चलने लगी| किन्तु वह नजर नहीं आया| शायद माँ के कारण वहाँ पर नहीं था| माँ ने भी कुछ नहीं पूछा|

कॉलेज जाना आना बेला के लिए डरावना होता जा रहा था| लगता है माँ यह सब समझ पा रही थी पर बात क्या है यह जानने में असमर्थ थी| बेला की माँ ने अब दूर से ही नजर रखनी शुरू की| दो तीन दिनों में ही सारा माजरा समझ गयी|

‘बेला, कहो तो मैं उसके घर जाकर उसकी माँ से बात करूँ’|

‘पर क्या बोलोगी माँ, वह कुछ अभद्रता तो नहीं करता न| पर उसका मुझे लगातार देखते रहना अच्छा नहीं लगता| मान लो वो बदमाश हुआ तो कहीं तेजाब...या’

‘न न बेटा, ऐसा नहीं कहते| मैं बात करती हूँ न उससे’|’

‘पर क्या’, इसका जवाब माँ के पास भी नहीं था| कहीं उससे कुछ कहूँ तो बेला के बारे में कुछ उल्टा सीधा कहकर बदनाम न करे या सरेआम दुपट्टा न खींच ले| उस वक्त लड़कों की यह शैतानी प्रायः चलती थी| आज का जमाना नहीं था उस समय, अब तो दुपट्टे भी गुमनामी में जी रहे|

एक दिन बेला कॉलेज से घर पहुँची तो माँ पापा किसी लड़के के बारे में बात कर थे| बेला ने सुना कि लड़का अच्छी नौकरी करता है| घर भी संभ्रांत है| बेला अचकचा कर पूछ बैठी, ‘ये किस लड़के की बात कर रहे आपलोग’

‘तेरे रिश्ते की’

‘क्या, अभी तो मुझे बहुत पढ़ना है’

‘पढ़ लेना बेटा, पढ़ने से कौन रोकता है| शादी के बाद भी पढ़ा जा सकता है| इज्जत से बेटी विदा हो जाए इससे बढ़कर क्या हो सकता है,’ शायद उस लड़के का भय माँ को भी सताने लगा था|

जिस दिन बेला की बारात दरवाजे पर खड़ी हुई उस दिन बेला की फाइनल परीक्षा थी जो वह दे न सकी| दिल में अपार दुःख लिए उस बाबला को कोसती हुई ससुराल के लिए रवाना हो गई|

करीब दो वर्षों के बाद बेला मायके आयी|उसने फिर से इंटर की परीक्षा के लिए फॉर्म भरा था| छूट गई पढ़ाई को वह पुनः थामना चाहती थी जबकि यह आसान नहीं था| पूरे दो महीने की इजाजत मिली थी मायके में रहने की|

जिस दिन वह आयी, शाम को माँ कहीं जाने की तैयारी में थीं |

‘कहाँ जा रही माँ’

‘उस बाबला की बेटी की छठी है , उसकी माँ ने बुलाया है|’

बाबला का नाम सुनते ही बेला के चेहरे पर कड़वाहट फैल गयी|

‘मैं भी चलूँ माँ’, खुद को संयत करते हुए उसने पूछा|

‘चलो’

जब वह वहाँ पहुँची, बाबला की नजर फिर उसे एकटक देखने लगी|

अब बेला को डर नहीं लग रहा था|

‘’क्या कर लेगा, वह खुद बेटी का पिता बन गया है| अब उसे पता चलेगा कि बेटी वालों पर क्या बीतती है,’’ यही सब सोचती हुई रस्म वाले कमरे में गयी|

उसने बिटिया को बेला की गोद में देते हुए कहा,’’इसे आशीर्वाद दो बेला’’|

‘तुझे जीवन में कोई बाबला न मिले जिससे तेरी पढ़ाई छूट जाए’ फुसफुसाते हुए बेला ने कहा|

बाबला को उसके अस्फुट शब्द सुनाई न पड़े|

उसने कहना जारी रखा,’’ बेला, हम सिर्फ पाँच भाई हैं| इसकी कोई बुआ नहीं| काजल का रस्म तुम ही पूरा कर दो न| मुझे शुरु से ही तुम में बहन जैसा फ़ील आता था किन्तु कभी कह न सका| यह संयोग है कि आज तुम आ गई| और यह है राखी जो मैं खरीद कर रखा करता था किन्तु इसे मेरी कलाई पर बाँधने वाली कोई बहन नहीं थी|’’

बेला जड़वत् बैठी रही| उसकी नजरों से उमड़ते स्नेह को वह झेल न सकी और खुद भी आँसू बहाने लगी|

--ऋता शेखर ‘मधु’

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन- भक्ति गीत

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जिसने मोर मुकुट किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

अपने मुख से दधि लपटाए
बाल रूप में कान्हा भाए
मात जसोदा लेती बलैंयाँ
नंद मंद मंद मुस्काए

जिसने बैजंती किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

गौर वर्ण की राधा प्यारी
कृष्ण की सूरत श्यामल न्यारी
सदा प्रीत की रीत निभाए
ग्वाल बाल सब हुए बलिहारी

जिसने बंसी धुन किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

कोपित इंद्र जब झुक नहीं पाए
बूँद झमाझम वह बरसाए
अँगुली पर पर्वत को थामे
सबको बा़के बिहारी बचाए

जिसने गोवर्धन किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

बाल सखा को देखके रोए
फटे पाँव वह प्रेम से धोए
पूछें आलिंगन में भर भर
मित्र अभी तक कहाँ थे खोए

जिसने दिल में दया किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

चक्र लिए विष्णु जी आए
कृष्ण रूप में खूब समाए
कुरुक्षेत्र में रण के रथ पर
विकल पार्थ को वह समझाए

जिसने सारथि रूप किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन
जिसने मोर मुकुट किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन
--ऋता शेखर मधु