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रविवार, 21 जुलाई 2019

सबकी अपनी राम कहानी - गीत

सबकी अपनी राम कहानी
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जितने जन उतनी ही बानी
सबकी अपनी राम कहानी

ऊपर ऊपर हँसी खिली है
अंदर में मायूस गली है
किसको बोले कैसे बोले
अँखियों में अपनापन तोले
पाकर के बोली प्रेम भरी
आँखों में भर जाता पानी

मन का मौसम बड़ा निराला
पतझर में रहता मतवाला
दिखे चाँदनी कड़ी धूप में
झेले शूलों को पुष्प रूप में
जीत हार से परे हृदय में
भावों की है सतत रवानी

यही कोशिश हो कुछ न टूटे
आस बीज से कोंपल फूटे
भाव सरल हो जब निज मन का
सफ़र सुहाना हो जीवन का
जो सहता है वह पाता है
अनुभव की वह अकथ निशानी

सागर-घट की कथा पुरानी
बाहर पानी भीतर पानी
ज्यों ही टूटा ये घट तन का
मिलन हुआ ईश्वर से मन का
राधा कह लो मीरा कह लो
प्रीत गीत की हुईं दीवानी

जितने जन उतनी ही बानी
सबकी अपनी राम कहानी
--ऋता शेखर 'मधु'
20/06/19
श्रावण कृष्ण पक्ष चतुर्थी
वि0 सं0 २०७४

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

पत्र...किसके नाम?


फेसबुक पर एक समूह में पत्र लेखन प्रतियोगिता थी|

62 प्रविष्टियों में...अच्छे पत्रों में हमारे पत्र को भी रखा गया इसके लिए खुश हूँ 😊अब आप सब भी पढ़िए।

पुणे
29/06/2019
प्रिय रौशन,
सदा प्रसन्न रहो।
अपनी रौशनी को रौशन के रूप में स्वीकार करने में थोड़ा समय लगेगा। बड़े नाजों से तुम्हें पाला है रौशनी। जब तुमने जो चाहा, दिया। तुम मेरी बड़ी बेटी हो। हमारे यहाँ दो पीढ़ियों से लड़की का जन्म नहीं हुआ था। तुम्हारे जन्म पर तुम्हारे दादा लक्ष्मी के रूप में तुम्हें पाकर अति प्रसन्न थे और उन्होंने पूरे गाँव में लड्डू बँटवाए थे। दादी तो रोज नए फ्राक सिलकर पहनाती तुम्हें। जब तुम सात वर्ष की थी तो तुम्हें लड़कों वाले खेल पसन्द आते थे। गिल्ली डंडा और कंचे खेलने में तुम्हारी रुचि बढ़ने लगी थी। अब दादी के फ्राक तुम्हें पसन्द नहीं आते थे। तुम हमेशा पैंट शर्ट की ज़िद करने लगी थी। बाल भी छोटे कटवाए थे जिद करके। यह सब बातें सामान्य समझ कर हम निश्चिंत रहे। समय के साथ तुम बड़ी होती गयी और उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहर चली गयी। पढ़ाई में अव्वल आती रही और कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। तुम जब भी छुट्टियों में घर आती, अपनी प्रिय सहेली रूबी की ढेर सारी बातें करती। उसकी पसंद नापसन्द तुम्हारे लिए बहुत मायने रखती थी। हम इसे भी सामान्य समझ कर दो सहेलियों का प्रेम समझते रहे। एक बार तुम उसे लेकर घर आई तो तुम दोनों के व्यवहार से कुछ तो खटका था मन में, पर इसे वहम समझकर दिमाग से झटक दिया था। जब विवाह योग्य हुई तो मैंने लड़कों की लिस्ट तुम्हारे सामने रख दी। तुमने विवाह के प्रति अपनी अनिच्छा जताई। बहुत पूछने पर तुमने जो कहा, वह सुनकर मेरे और तुम्हारी मम्मी के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
तुमने कहा था " मैं रूबी को जीवनसाथी बनाना चाहती हूँ, अब समलैंगिकों को साथ रहने का कानूनन अधिकार मिल गया है।" हम मूक रहकर सिर्फ तुम्हें देखते रहे। तुम बालिग और आत्मनिर्भर थी। अपना निर्णय लेने का अधिकार था तुम्हें, पर ये...। किसी भी चीज़ को किस्से कहानियों तक पढ़ना अलग बात होती है और खुद पर बीतना अलग।
लोग क्या कहेंगे...यह बात मन पर हावी होने लगी। दो दिनों के मानसिक उथलपुथल के बाद हमने इसे जैविक असमानता स्वीकार करते हुए समाज की परवाह छोड़ दी। तुम्हें डॉक्टर को दिखाया। अब फिर से भगवान ने एक अजूबे तथ्य से अवगत कराया। तुम्हारे शरीर में पुरुषों वाले अंग प्रत्यंग भी थे। कई जटिल प्रक्रियायों से गुजरते हुए आज तुम बेटा के रूप में सामने खड़ी हो। हम दामाद लाते, अब बहू लायेंगे।
रौशन, तुमने लड़की का जीवन भी जिया है।आशा है आगे उनके दर्द को भली भाँति समझ पाओगे।डॉक्टर ने कहा है कि ऐसे केस लाखों में एक होते हैं। समाज की परवाह न करना। हम तुम्हारे साथ हैं और रूबी को बहू के रूप में स्वीकार करते हैं । तुम दोनों की इज्जत पर कोई आँच नहीं आएगी।
हॉर्मोन्स की वजह से असामान्य लक्षण प्रकट होना ईश्वर प्रदत्त है बेटा, उनकी हँसी उड़ाने वालों को नासमझ समझ कर माफ़ कर देना।
बहुत प्यार
तुम्हारा पापा
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स्वरचित, अप्रकाशित, अप्रसारित
ऋता शेखर 'मधु'
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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

जिन काँधों पर चढ़कर झूले-ललित छंद


विधा- ललित छंद (सार छंद)...
16-12 पर यति अंत में वाचिक भार 22,
कुल चार चरण, दो-दो चरण में तुकांत अनिवार्य है.

नेह-सिक्त निर्मल धारा से , मिलती कंचन काया |
अम्बर जैसा प्यार पिता का, शीतल माँ का साया ||
जाने कितने दुख सुख सहकर, तिनका तिनका जोड़े|
ऊँची शिक्षा की खातिर ही, निज सपनों को तोड़े ||

जिन काँधों पर चढ़कर झूले, चौंसठ में झुकते हैं |
एक सहारा पाने को वे, पग पग पर रुकते हैं ||
सन्नाटों के मौन तिमिर में, दो निरीह जगते हैं |
टिक-टिक के संग श्वास-ध्वनि मिल, साथी सा लगते हैं ||2||

तन निःशक्त हुआ है जबसे, झेल रही लाचारी |
दूरभाष भी दूर पड़ा है, ले कैसे बेचारी ||
दवा मिली आहार नदारद, वह कैसे जीएगी |
डॉलर की अनकही कहानी, घूँट घूँट पीएगी ||3||


यूँ  देखो तो यह दुनिया बस, लगता है इक मेला |
पर जिनको तुम छोड़ गए हो, वह तो पड़ा अकेला ||
अनियंत्रित जीवन रेखा का, अनियंत्रण है जारी |
साहब बनकर घूम रहे हो, माँ बिस्तर पर हारी ||4||

आखें मूँद रही थी जब वह, तुम्हें कहाँ पाती थी |
चढ़कर दूजों के कंधों पर, मंजिल को जाती थी ||
मस्त रहो और स्वस्थ रहो तुम, आशिष देकर गाती|
यादों में जाकर जब लौटी, तर्पण अश्रु का लाती ||5||

तुम जग जीत चले थे लेकिन, जीते ना अपनो को |
गाँव द्वार को ठोकर मारे, लेकर निज सपनों को ||
छोड़ तिरंगा बने विदेशी, देश हुआ बेगाना |
अपने अपनो की खातिर तुम, लौट यहाँ फिर आना ||6||

----ऋता शेखर ‘मधु’

ग्रीष्म

ग्रीष्म ऋतु
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ग्रीष्म की दुपहरिया
कोयल की कूक से
टूट गयी काँच सी

छत पर के पँखे
सर्र सर्र नाच रहे
हाथों में प्रेमचंद
नैंनों से बाँच रहे

निर्मला की हिचकियाँ
दिल में हैं खाँच सी

कोलतार पर खड़े
झुंड हैं मजूरों के
द्वार पर नाच रहे
बानर जमूरों के

लू की बड़ी तपन
खस में है आँच सी

चंदन की खुश्बू सा
खत भी है पास में
आएगा जवाब एक
प्रेम भी है आस में

विचारों की आँधियाँ
परख रहीं जाँच सी

गपशप की इमरती
ठहाकों में छन रही
आम की फाँकों पर
मेथी मगन रही

जीभ की ग्रंथियाँ
चटपटी कुलाँच सी

-ऋता शेखर ‘मधु’