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गुरुवार, 4 जून 2026

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे




सोलह चंद्र-कला को धारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


भाद्र कृष्ण का था अँधियारा

किलकारी से गूँजा  कारा।

वासुदेव तन्द्रा से जागे

पल में वह मथुरा को त्यागे।

चपल दामिनी चमक रही थी

यमुना की धारा तेज बही थी।

शेषनाग ने ताना छाता

वही बने थे बलभ्रद भ्राता।


कौतुक करते थे वह सारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


मात यशोदा के घर आये

वहाँ नंद के लाल कहाये।

मोरपंख से सजता कुंतल

कानों में झूला था कुंडल।

जब जब मुख पर दधि लपटाए

नटखट बन अँखियाँ मटकाए।

खूब चराते हो तुम गैया

किये सर्प पर ता ता थैया।


बाल रूप में लगते न्यारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


जिसने तुमपर आस लगाया

तुमने उनका दर्द मिटाया।

धर्म ध्वजा तुम जब फहराते

आहत अर्जुन भी सुख पाते।

जग का पालन करने वाले

दीनों के तुम हो रखवाले।

गहरा है यह भव का सागर

आओ अब हे नटवर नागर।


तुम्हीं लगाओ हमें किनारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे


ऋता शेखर


13 टिप्‍पणियां:

  1.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 07 जून, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  2. कान्हा के लिए कितनी सुंदर भावपूर्ण रचना लिखी है आपने ऋता जी!

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  3. वाह!!
    बहुत ही भावपूर्ण सृजन
    धर्म ध्वजा फहरने आ जाओ मोहन...

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह!!
    बहुत ही भावपूर्ण सृजन
    धर्म ध्वजा फहरने आ जाओ मोहन...

    जवाब देंहटाएं

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