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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

चाँदनी की बात




चाँदनी की बात

कल रात चाँदनी से
मुलाकात हो गई
कुछ उसने कहा
कुछ मैंने कहा
ढेरों बात हो गई|
कुछ उसने सुना
कुछ मैंने सुना
बातें साफ़ हो गईं|
वह भी तो छुप जाती
अमावस की रात में
फिर खिलखिलाती
पूनम के साथ में

ज़िन्दगी को चाँद समझो
खुद को समझो चाँदनी
तुम्हे भी छुपना होगा
गमों की काली रात में
फिर खिलखिलाना भी होगा
मिल बसंत के साथ में

यही चाँद की नियति है
यही जीवन का धूप-छाँव
फिर इससे क्या घबड़ाना
बस,समय के साथ चलते जाना|

ऋता शेखर मधु

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

कवि बनोगे कैसे!.




कवि बनोगे कैसे!.

प्यार होगा नहीं
रस बरसेंगे कैसे!
पैर फिसलेंगे नहीं
सँभलना सीखोगे कैसे!
दिल दुखेगा नहीं
सावन टपकेंगे कैसे!
खुशियाँ मिलेंगी नहीं
बसंत हसेंगे कैसे!
माँ बनोगी नहीं
धरा कहलाओगी कैसे!
पिता बनोगे नहीं
आकाश समझोगे कैसे!
जुदाई होगी नहीं
दिल तड़पेंगे कैसे!
मिलन होगा नहीं
एहसास जगेंगे कैसे!
ताने मिलेंगे नहीं
आह निकलेगी कैसे|
सौन्दर्य दिखेगा नहीं
वाह बोलोगे कैसे!
अभाव मिलेंगे नहीं
चाह आएगी कैसे!
मदद मिलेगी नहीं
एहसान जतेंगे कैसे!
मदद करोगे नहीं
कृतज्ञता पाओगे कैसे!
भव-सागर में तैरोगे नहीं
किनारा मिलेगा कैसे!
सपने देखोगे नहीं
शिखर पाओगे कैसे!

ये बातें हों नहीं
भावना जगेगी कैसे!
भावना जगे नहीं
लेखनी चलेगी कैसे!
बोलो, कवि बनोगे कैसे!!!

ऋता शेखर मधु

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

नटराज अवतार (काव्य कथा)-महाशिवरात्रि




नटराज अवतार (काव्य कथा)

मनोहारी कथा है यह उस जगत का
जहाँ डेरा है शिव और गौरी का
गौरवर्ण हुलसा मुखड़ा लगती थी न्यारी
महादेव शिव को गौरी थी प्यारी
शिव गौरी का प्रेम ब्रह्मांड में था अमर
सदियाँ काल बीते वह बना और प्रखर
शिव थे दीनों के नाथ याचकों के सहारा
शिव का हर रूप लगे गौरी को प्यारा|

हेमंत ऋतु का हो चला था गमन
हो रहा था ऋतु बसंत का आगमन
फाल्गुन मास ने लिए थे पंख पसार
धीमे धीमे बह रही थी बसंती बयार
पीले कुसुमों से भरी थी बागों की शोभा
पुष्प पारिजात बिखेर रहे थे स्वर्णिम आभा
खिली कलियाँ कह रही थीं सुन-सुन
भँवरों का शुरु हो गया था गुन-गुन
समाँ सुन्दर था सजीला था मधुमास
मुदित हृदय से चल रहे थे हास-परिहास|

संध्या की मधुर वेला आती थी नित्य
पर उस संध्या की बातें थीं अनित्य
गौरी प्यारी ने किए थे अद्भुत श्रृंगार
केशों में जड़ा था पुष्प हरसिंगार
किया शिवप्रिया ने सविनय एक निवेदन
‘’ स्वामी आपकी हर लीला है न्यारी
देखना चाहती हूँ आपका नृत्य मनोहारी’’
हर्षित हृदय से गणों ने भी किया अनुमोदन|

निवेदन प्रिया का सुन शिव हुए हैरान
कुछ सोच मुख पर छाई मंद-मंद मुस्कान
गौरी की चाहत को शिव ने किया स्वीकार
नर्तक बनने के लिए हो गए तैयार
शिव का नर्तन था बड़ा ही सुखकारी
गौरी उनके इस रूप पर हो गईं वारी
गूँज रहे थे चहुँ ओर मधुर मध्यम सुर साज
नर्तक के रूप में शिव कहलाए नटराज|

मधुमास में था पवन भी सुगंधित
शिव के नृत्य से स्वर्ग था आनंदित
तभी माता काली का वहाँ हुआ पदार्पण
शिव ने किया माता को अपना नमन अर्पण
देखा काली ने शिव का नटराज अवतार
मुग्ध नयनों से माता निहारें बार-बार
यह अलौकिक नृत्य माता के मन को भाया
साथ ही मन में इच्छा एक जगाई
नटराज के मोहक नृत्य की छटा
रह न जाए स्वर्गलोक में ही सिमटा
जो दृश्य अभी तक है स्वर्गिक
धरती पर आकर बन जाए वह लौकिक|

पहुँचीं माँ काली शिव के पास
नटराज न टालेंगे उनकी बात
थी मन में ऐसी ही आस
शिव ने भी मानी माता की बात|
लगाया शर्त एक अति सुंदर
संग नाचें माता नृत्य होगा मनोहर
धरती पर जम जाएगा रंग
माता नाचेंगी जब नटराज के संग|

काली का हृदय हो गया पुलकित
शिव और शिवा दोनों हो गए हर्षित
शिव ने धर लिया राधा का रूप
काली ने धरा कृष्ण स्वरूप
शुरू हो गई मुरली की तान
सुन के धरावासी हो गए हैरान
चतुर्दिशा में मच गया शोर
दौड़े सब उपवन की ओर|

राधा कृष्ण का हुआ रास
मधुबन भी नाचा साथ-साथ
हवा में गूँजे मृदंग और शंख
मयूर भी नाचे फैलाकर पंख
था यह नृत्य बड़ा बेजोड़
दर्शन करने की लग गई होड़
डालियाँ कदंब की लगीं झूमने लहराने
स्वर्ग से देवता गण लगे फूल बरसाने
अनुपम नृत्य की अद्भुत थी यह प्रस्तुति
कर जोड़े मानवगण करने लगे स्तुति|

शिव काली ने धरा था वेश विचित्र
फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी बना पावन पवित्र
अद्वितीय अति सुंदर थी वो रात्रि
भक्तों के लिए बन गई महाशिवरात्रि||

ऋता शेखर मधु



शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

वाणी और कलम


वाणी और कलम


वाणी मुखर है
पर खामोश है
कलम बोलती नहीं
पर वाचाल है
कई कई बातें ऐसी
कह नहीं पाते
कलम भावों की स्याही से
बयान करती है
दर्द बह जाते हैं आँखों से
वाणी कह नहीं पाती
उन बूँदों को समाकर
कलम दरिया बहाती है
विरोध मन में हो
स्वर फूट नहीं पाते
उस तपिश को सहकर
कलम अगन रेखा बनाती है
आँधियाँ आ जाएँ
वाणी टिक नहीं पाती
थरथराती लौ को
कलम स्थिर बनाती है
भावों का अतिरेक हो
हिचकियाँ आ जाती हैं
कलम ग्लास बन जाती
पानी पिलाती है
एकांत होता है मरणासन्न
कलम औषधि बन जाती
जीवन- संचार करती है
सपनों के पंख होते हैं
वाणी पकड़ नहीं पाती
उन पंखो को लेकर
कलम नर्तन कराती है
मुहब्बत व्यक्त न हो पाए
कलम की रस-फुहारें
धड़कन बढ़ाती हैं
वाणी एक कम्पन है
हवा में तिरोहित हो जाती
कलम उस स्पंदन को
शाश्वत साकार बनाती है|

ऋता शेखर मधु

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

क्षितिज पे धरा ही है, फ़लक को झुका रही-अनुष्टुप छंद



किसी की बेबसी का तो,  मजाक न उड़ाइए|
न आप भी विधाता के,  निशाना बन जाइए|१|

सोच समझ के ही तो, उंगलियाँ उठाइए|
आपकी ओर भी हैं ये, इसे न भूल जाइए|२|

है उपदेश आसान,  सबने हँस के  दिए|
जो बात खुद पे आई, समंदर बहा दिए|३|

ज्ञान की ही पिपासा थी, कहनी कुछ बात थी|
'इटरनेट' देखा तो,   साहित्य का दरिया था|४|

लदे वृक्ष फलों से जो,   सदा ही वे झुके रहे||
क्षितिज पे धरा ही है, फ़लक को झुका रही|५|

ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

उड़ो नभ में खग की तरह


गूगल से साभार










वैलेन्टाइन्स डे है मनता 
प्रेम दिवस की तरह
पश्चिम बोले, 
उड़ो नभ में तुम खग की तरह
लव भाषा है यूथ की,
एक्सप्रेस करो 
रोमियो और जुलियट की तरह
इक-दूजे को चाहते, 
हंसों के जोड़ों की तरह
फिर क्यों अड़े खड़े हो 
नदी के दो किनारों की तरह
बागों में खिल जाओ 
सुगन्ध और सुमन की तरह
प्रकाश में मिल जाओ 
प्रभा और प्रभाकर की तरह
टकटकी नजरों में खो जाओ 
चकोर और चन्द्र की तरह
हँस के खो जाओ 
कानन में कुसुम की तरह|
भारत देश है संस्कार प्रधान
निभाओ प्रेम उदाहरण की तरह
मीत से प्रीत दिखाओ
राधा और कान्हा की तरह
प्यार खूबसूरत एहसास है
जी जाओ अमृता और इमरोज की तरह
प्रेम भक्ति का भाव है
जगा लो मीरा की लगन की तरह
प्यार त्याग का नाम है
कर लो उर्मिला और लक्ष्मण की तरह
जमाने का जुल्म सह जाओ
हीर और राँझे की तरह
प्यार जुदाई का भी नाम है
अश्क बहाओ लैला और मजनूं की तरह
प्यार की मर्यादा भी है
मत लांघो इन्द्र की तरह|

इकरार करो इजहार करो
इक-दूजे पर जाँ निसार करो
नापसन्द हो तो इन्कार करो
इक-दूजे पर मत वार करो|

ऋता शेखर मधु

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

रोटी








 रोटी (ताँका)

फूली थी रोटी
सहसा फट पड़ी
भाप का ताप
अग्नि ताप से ज्यादा
विद्रोह या आक्रोश?

यह कविता की जापानी विधा है|
इसमें वर्णों का क्रम 5+7+5+7+7=31 है|

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

संज्ञा या विशेषण





संज्ञा या विशेषण

दुनिया में
दो तरह के लोग होते हैं
कुछ वाकई दुखी होते हैं
पर झलकने नहीं देते,
कुछ दुखी होने का
दिखावा करते हैं
इस दिखावे पर उन्हें मिलता है
बेचारा या बेचारीका उपनाम|

कुछ वाकई सोए रहते हैं
और जग जाते हैं
हल्की दस्तक से,
जो दिखावा करते हैं
वे ढोल पीटने पर भी
नहीं जग सकते|

कुछ प्रभु में
दिल से अन्तरात्मा से
आस्था रखते हैं,
कुछ जोर जोर से भजन गाते
घंटियाँ बजाते
पुजारी का खिताब
जीत लेते हैं|

कुछ वाकई काम करते हैं
साफ सुथरे सलीकेदार,
कुछ दिखावा करके
कामकाजू शब्द से
विभूषित हो जाते हैं|

प्रकृति भी इससे अछूती नहीं
सूर्य बेचारा
सबको ऊर्जा देता
तपिश झेलता है
रौशनी देने के लिए
जलता रहता है,
किन्तु सुन्दर और शीतल
ये विशेषण होते हैं
चन्द्रमा के साथ
जो न सुन्दर है
न ही शीतल है
ये गुण उसे
मिलते तो सूरज से ही हैं न!

अब सोचना ये है
संज्ञा बना जाए
या विशेषण???

ऋता शेखर मधु

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

सहनशीलता




सहनशीलता
होती है उसकी भी सीमा
मौन सहनशीलता नहीं
घातक बनती
तन मन दोनों के लिए

सहनशक्ति का पर्याय है धरती
पर क्या
अनवरत धूप से
दरारें नहीं फटतीं
निर्बाध बारिश से
उत्प्लावित नहीं होती
अंतस की अग्नि
ज्वालामुखी नहीं बनाती

बोलना
अपनी बातें समझाना
सहनशीलता की सीमा का
अतिक्रमण नहीं
अनर्गल बोलना
उद्दंडता से बोलना
हर बात में बोलना
परिधि पार करती हैं|

सही बात में चुप रह जाना
सर झुका तोहमतों को सह लेना
सहनशीलता नहीं
कायरता भी नहीं कह सकते
शायद संस्कार है
पर वैसे संस्कार का भी क्या
जो बना देती है
बेवकूफ और बेचारा
कभी कभी मानसिक अपाहिज भी|

ऋता शेखर मधु

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

कैसे उतरूँ पार- कुंडलिया छंद

गूगल से साभार










कैसे उतरूँ पार


भवसागर में हूँ फँसी,  आओ तारणहार|
मुझे राह सूझे नहीं,  कैसे  उतरूँ  पार|
कैसे उतरूँ पार,  बहुत ही गहरा सागर|
पाना चाहूँ थाह, भर दो भक्ति से गागर|
बस तुम में ही आस, सुनो हे नटवर नागर|
खेना मेरी नाव, पार हो यह भवसागर||


ऋता शेखर 'मधु'


पहली बार ये छंद लिख रही हूँ|त्रुटियों के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ|
विद्वतजनों का मार्गदर्शन मिले तो आभार होगा और मैं इनमें सुधार कर पाऊँगी|

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

क्यारी-क्यारी लहराई, डाली-डाली मुसकाई-घनाक्षरी छंद




क्यारी-क्यारी लहराई, डाली-डाली मुसकाई,
ऋतुराज के आने से, छटा बसंती छाई|

सुमन-सितारे टँके, प्रकृति-परिधान में,
किसलय कोंपलों ने, ले ली है अँगड़ाई|

चहचह से चहकी, उषा मधुरहासिनी,
मंद-मंद बयार से, कलियाँ लहराईं|

पुष्पराग उड़ चला, चँदोबा बन के टँगा,
गेहूँ के गोरे गालों पे, तितली मँडराई|१|



मतवाले भौंरे डोलें, कुसुमों के अधरों पे,
पुखराज-सी बगिया, झूम के इठलाई|

पीले गुलाल के संग, निखरे गेंदा के रंग,
वागीशा की वीणा गूँजी, रस-रागिनी गाई|

जनक-वाटिका सोहे, राम जानकी से मिले,
इस मधु-मौसम में, सीता थी हरषाई|

ऋतूनां कुसुमाकरः,गीता-वाणी श्रीकृष्ण की
प्रभु ने पार्थ को अपनी महता बताई|२|

ऋता शेखर मधु
ऋतूनां कुसुमाकरः(ऋतुओं में मैं बसंत हूँ|)