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गुरुवार, 31 मार्च 2016

रूह मरती नहीं

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रूह से देह तक
देह से रूह तक
अनजान सफर में
कितने ही रहे होंगे
अनुभूतियों के आकाश

अनन्त यात्रा रूह की
देह पाने के लिए
दुर्गम यात्रा देह की
रूह से बिछड़ जाने के लिए
सुना है परमात्मा के चारो ओर
बिखरा है उज्जवल दिप प्रकाश
वहाँ आनन्द की अद्भुत अनुभूति है
रूह पृथक हो जाती है
उसी दिव्य को पाने के लिए
फिर क्यों छटपटाती
पुनः देह में बँध जाने के लिए

सुना है रूह मरती नहीं
बदल देती है देह
देह के पिंजर में
क्यों कैद होती है रूह
बार-बार बारम्बार

रूह की अनन्त प्यास
जज्बातों को समझे जाने की
छल और देह से परे 
सिर्फ और सिर्फ
प्रेम सम्मान पाने की
अमिट प्यास की खातिर
वह आती रहेगी बार-बार बारम्बार

*ऋता शेखर ‘मधु’*

बुधवार, 30 मार्च 2016

आता है याद हमको गुजरा हुआ जमाना

221 2122 221 2122
गजल....

हर राह पर गुलों की कालीन तुम बिछाना
आए हजार बाधा धीरज से लाँघ जाना

ये आसमाँ सजाता सूरज औ' चाँद तारे
तुम रौशनी में इनकी अपने कदम बढ़ाना

जब जिंदगी में दुख सुख का सिलसिला मिले तो
इतनी विशालता हो, थक कर न बैठ जाना

रहतीं झुकी निगाहें माँ बाप के अदब में
आता है याद हमको गुजरा हुआ जमाना

झुकती हुई कमर में लाचारगी बहुत है
तुम प्रेम से सदा ही उनको गले लगाना

नाजुक बड़े ये रिश्तों के हैं महीन धागे
रखना बड़ी नफ़ासत जब भी इन्हें निभाना

*ऋता शखर 'मधु'*

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

तेरी झलक...कहाँ तलक

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जी लेने की ललक
जीत लेने की ललक

पा लेने को फलक
छा जाने को फलक

भीग जाता है हलक
सूख जाता है हलक

नैन जाते हैं छलक
बात जाती है छलक

मूँद जाती है पलक
ठहर जाती है पलक

प्रीत आती है ढलक
आस जाती है ढलक

ऐ जिंदगी तेरी झलक
ले जायेगी कहाँ तलक

विश्व कविता दिवस पर--ऋता

गुरुवार, 24 मार्च 2016

रंग

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वो...जो अनदेखा है ...अनाम है...पर सबके साथ है...

2122 2122 2122 212

आज अपने साथ लाया ढेर सारे रंग वो
द्वेष को है छोड़ आया होलिका के संग वो

हर तरफ सद्भाव से निखरी पड़ी है ये फिजा
फाग की इन मस्तियों में साधता मिरदंग वो

मौसमी बदलाव का कोई असर है ना कहीं
ठंडई में है घोंटता किलकारियों का भंग वो

हरित पीले बैंगनी की धार मतवाली हुई
मुख पुते हैं लाल से जो लग रहा बजरंग वो

शोर गलियों में सुनें तो भागते डरपोक हैं
सामने आया खुशी से बन रहा शिवगंग वो

सरहदों पर जो मिटे अपने घरों के दीप थे
दस्तकें होली में देकर लौटता बेरंग वो

शब्द जो कागजों पर श्वेत श्यामल है 'ऋता'
मन उमंगित कर चला तो बन रहा बहिरंग वो
*ऋता शेखर 'मधु'*

शनिवार, 19 मार्च 2016

शहीद दिवस के लिए



ले आजादी की मशाल
वे झूमते गाते चले
कफ़न बाँधकर अपने सर
शान से मुस्काते चले

बाजुओं में जोश था
रक्त में थी रवानगी
भारत माँ के वंदन की
भरी हुई थी दीवानगी
केसरिया से तन मन रँग
विजय ध्वज लहराते चले

माँ की गोदी त्याग दिए
फाँसी का फँद हार बना
इन सपूतों की शहादत
जन जन पर आभार बना
अँग्रेजी लाठी टूटी
वे हुँकार गुँजाते चले

मिला हमें आजाद गगन
सुवासित हुई जहाँ पवन
रग रग में हो देशप्रेम
मिटा सके ना जिसे थकन
हम सब भारतवासी बन
भेद-भाव भुलाते चलें
*ऋता शेखर 'मधु'*