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मंगलवार, 1 सितंबर 2026
अंबष्ठ कायस्थ का इतिहास
बुधवार, 19 अगस्त 2026
नमामि मातृभूमि हे !
नमामि मातृ भूमि हे! नमामि भारतीयता।
नमामि सैन्य शक्ति हे ! नमामि वीर वीरता।।
वसुंधरा निहाल है, हवा सुगंध दे रही।
अनाज की बहार है, नदी प्रबंध दे रही।
विभावरी खिली रही, शशांक भी रहा खिला।
स्वतंत्रता मना सकें, वही दिनांक है मिला।
नमामि मातृभूमि हे! नमामि भारतीयता।
नमामि सैन्य शक्ति हे ! नमामि वीर वीरता।।1
सुहासिनी सुभाषिणी, तुम्हें प्रणाम माँ सदा।
प्रसन्न स्वाभिमान में, करोड़ कंठ संपदा।
समस्त सृष्टि के लिए, अनेक शस्त्र धारती।
विराजमान हो सदा, भरो मिठास भारती।
नमामि मातृ भूमि हे! नमामि भारतीयता।
नमामि सैन्य शक्ति हे ! नमामि वीर वीरता।।2
प्रबुद्ध चेतना रहे, कदम कभी रुके नहीं।
विराट आसमान में, ध्वजा कभी झुके नहीं।
नवीन शब्द हो न हो, सृजन कभी न रिक्त हो।
प्रबल विचार हों सदा, शरीर प्राण सिक्त हो।
नमामि मातृ भूमि हे, नमामि भारतीयता।
नमामि सैन्य शक्ति हे, नमामि वीर वीरता।3
रविवार, 5 जुलाई 2026
सरस्वती वंदना
सरस्वती वंदना
विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा ।
सबके हृदय में प्रवेश करना
आखर की माला तुमने सजाई
पन्नों पर उसको लेकर उतरना
विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा
मिले ज्ञान-मोती सबको ही जग में
कदमों के नीचे हों फूल मग में
बुद्धि सरल और निश्छल हो वाणी
गुरुओं का आदर करें बन के ध्यानी
अन्तस् में ज्योति खुशियों की धरना
विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा।
शब्दों में गरिमा की है जरूरत
यही इस जगत को संज्ञान देना
व्यवहार प्रेमिल हो सारे जगत से
मुख पर सभी के मुस्कान देना
वीणा से अपनी मधुर गान गढ़ना
विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा।
ऋता शेखर
गुरुवार, 11 जून 2026
जिस धरती ने पाला पोसा
🌱पर्यावरण दिवस पर🌱
जिस धरती ने पाला पोसा
उसका हम सम्मान करें
फसलों की उर्वर माटी पर
खड़ा न कोई मकान करें।
जल से है पृथ्वी पर जीवन
हरदम इसका ध्यान धरें
डिटर्जेंट डाल डाल सरि को
कभी न लहूलुहान करें।
प्राणवायु देता है पीपल
बरगद से मिलती है छाया
मेट्रो के खम्भे ने छीना
उनसे उनकी विस्तृत काया
माटी नीर पादप पवन
हैं पूजा के शुद्ध हवन
वे जब होंगे जग में रक्षित
जीवन भी होगा संरक्षित।
ऋता शेखर
गुरुवार, 4 जून 2026
कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे

सोलह चंद्र-कला को धारे
कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।
भाद्र कृष्ण का था अँधियारा
किलकारी से गूँजा कारा।
वासुदेव तन्द्रा से जागे
पल में वह मथुरा को त्यागे।
चपल दामिनी चमक रही थी
यमुना की धारा तेज बही थी।
शेषनाग ने ताना छाता
वही बने थे बलभ्रद भ्राता।
कौतुक करते थे वह सारे
कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।
मात यशोदा के घर आये
वहाँ नंद के लाल कहाये।
मोरपंख से सजता कुंतल
कानों में झूला था कुंडल।
जब जब मुख पर दधि लपटाए
नटखट बन अँखियाँ मटकाए।
खूब चराते हो तुम गैया
किये सर्प पर ता ता थैया।
बाल रूप में लगते न्यारे
कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।
जिसने तुमपर आस लगाया
तुमने उनका दर्द मिटाया।
धर्म ध्वजा तुम जब फहराते
आहत अर्जुन भी सुख पाते।
जग का पालन करने वाले
दीनों के तुम हो रखवाले।
गहरा है यह भव का सागर
आओ अब हे नटवर नागर।
तुम्हीं लगाओ हमें किनारे
कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे
ऋता शेखर
बुधवार, 22 अप्रैल 2026
इच्छा मृत्यु
उधेड़बुन
"जब से न्यायालय का निर्णय आया है
मन पर उधेड़बुन का गहरा साया है
यह उधेड़बुन निर्णय पर नहीं,
नाम पर है क्योंकि नाम है 'इच्छा मृत्यु'"
"मगर नाम पर उधेड़बुन कैसा है? "
"मरने वाला अपनी इच्छा व्यक्त नहीं कर पाया।
उसकी इच्छा का कहीं जिक्र न आया।
अस्पताल में जीवन मिलता है
परिजनों का चेहरा खिलता है।
उसे मृत्यु देने के लिए
जीवनदायिनी यंत्र हटाये गए
भोजन पानी घटाए गए।
वह बेबस बोल नहीं पाया
उसकी तंत्रिकाओं पर था
शिथिलता का साया।
पर उसे महसूस तो होता होगा
मन ही मन वह भी रोता होगा।"
"यह निर्णय तो परिवार का है
उनके थके हुए संसार का है।"
" इसलिए सब कुछ सहज लिया गया।
वेद मंत्रों द्वारा उसको विदा किया गया।"
" मगर बंधु
आज भी मन में एक प्रश्न समाया है।
क्या वृद्धों के लिए भी
इच्छा मृत्यु का समय आया है?"
" यह उधेड़बुन बेमानी है।
जीवन की ये अवस्थाएँ
आनी हैं तो आनी हैं।"
" बंधु ! समझो मेरी बात
धूप छुपे तो आती रात।
वृद्ध बेबस मजबूर हुए
उनके सपोर्ट सिस्टम
उनके बच्चे
घर से कितनी दूर हुए।
रसोई वक्त बेवक्त जगती है
वह भी सगी न लगती है।
तन मन पर भारी असर हुआ है
लगता है जैसे कहर हुआ है।
बदले समय का निर्णय
क्या पारिवारिक विघटन है?
क्या इच्छा मृत्यु के लिए विवश
ये सामाजिक अकेलापन है ?"
प्रश्न तो समय के साथ-साथ
समाधान पा जायेंगे
मगर अभी तो हम
उधेड़बुन में ही जिये जायेंगे।
ऋता शेखर 'मधु'
मंगलवार, 21 अप्रैल 2026
मिट्टी की खुशबू
मिट्टी की खुशबू और हम
जिस मिट्टी की तिलक लगाने
हम नीचे झुक जाते हैं
वह चंदन कण बन माथे पर
भारत का मान बढ़ाते हैं
बारिश की वह प्रथम बूंद है
जो मिट्टी को महकाती है
सोंधी सोंधी खुशबू देकर
पकौडों को ललचाती है
मन मयूर बन जाता है
सतरंगी पँखो को खोले
विविध-भारती गाते हैं
मन सावन जब बने बसंती
दिख जाते हैं कृष्ण-राधिका
ब्रज-माटी पर बसी प्रीत से
दर्शन की प्यासी बनी साधिका
मिट्टी की खुशबू जब उड़ती
यमुना तट के कदम्ब पेड़
मुरली के राग सुनाते हैं।
मन ही मोहन, मन ही राधा
मन ही गोपियाँ मन अभिलाषा
मिट्टी की खुशबू मन जब मोहे
मीरा की बनती परिभाषा
मिट्टी से ही है जनजीवन
मिट्टी पर उगकर नवरातों में
अन्न खुशी बरसाते हैं।
माटी घट के शीतल जल में
खुशबू उसकी घुल जाती है
मन वृंदावन हो जाता है
तृषित को तृप्ति मिल जाती है
खुशबू से हो प्रेम अपरिमित
जब तक मिट्टी न बन जायें
फिर तो सागर इसे बहाकर
दूर देश ले जाते हैं।
ऋता शेखर 'मधु'
शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026
आया बसंत
बासंती हाइकु
1
खिले जलज
पवन मलयज
आया बसंत।
2
पीत पराग
ऋतुराज का पाग
है अनुराग।
3
मंद पवन
अनुरागी छुअन
बासन्ती मन।
4
विरही मन
कहाँ पाए बसंत
रंग बेरंग।
5
वाणी की वीणा
मंद मंद रागिनी
खोया है मन।
6
सरसों फूल
पीले परिधान में
सजती धरा।
7
खिले कुसुम
उमंग की बहार
राग बसंत।
8
खिली कलियाँ
निखरा है बसंत
गाये भ्रमर।
9
हिली टहनी
झरी है झर-झर
हीरक कनी।
10
बासंती घट
सृष्टि ने रंग लिया
मन का पट।
11
बाँटती हवा
हर तरफ इत्र
खिले हैं पुष्प।
12
हवा जो चली
नाच उठी क्यारियाँ
झूमा बसंत।
13
प्रीत का रंग
लगे जो एक बार
छूटे न संग।
14
आम्र वाटिका
कोयल की कूक में
बासंती गीत।
15
भीनी सुगंध
आमों के बौर कहे
जी लो बसंत।
ऋता शेखर
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026
भारत वंदना
माटी के कण-कण में देखो, हुआ सुवासित चंदन।
गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम, सुंदर सभी दिशाएँ।
अरुणोदय या हो अस्ताचल, दृश्य मनोहर लाएँ।।
जहाँ खड़ा है अटल हिमालय, गङ्गा बहती है पावन।
हर मौसम है यहाँ सुहावन, रहे शरद या सावन।।
सागर की लहरें भरती हैं, पग में शीतल स्पंदन।
गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।
वेद पुराण हमें सिखलाते, सरल मार्ग अपनाना।
रामायण से हमने अपने, आदर्शों को जाना।।
श्लोकों के हर बीज मंत्र में, ऊर्जा अमित समायी।
दया धर्म का पाठ पढ़ाकर, मानवता ले आयी।।
कहते कृष्ण सार जीवन का, मानो इसे न क्रंदन।
गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।
ओज भरी वीरों की धरती, सदियों से हम पाए।
सम्राटों के किस्से सुनकर, गौरव गाथा गाए।।
संस्कारित शिक्षित मानवता, जन जन के मन जागे।
सब मिलकर जब कदम बढ़ाएं, होगा भारत आगे।।
लहराए सब ओर तिरंगा, ऐसा हो अभिनंदन।
गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।
ऋता शेखर 'मधु'






