मंगलवार, 1 सितंबर 2026

अंबष्ठ कायस्थ का इतिहास

अंबष्ठ कायस्थ का इतिहास
जय श्री चित्रगुप्त जी महाराज 🙏



प्राचीन हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कायस्थों की उत्पत्ति चित्रगुप्त जी से हुई है। अंबष्ठ कायस्थों की एक उप-जाति है, जो मुख्य रूप से भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रों में पाई जाती है।

अंबष्ठ कायस्थ देश के विभिन्न हिस्सों में पाए गए थे, और वे स्थानीय लोगों के साथ घुल-मिल गए। भारत में अंबष्ठ समुदाय विभिन्न राज्यों में बिखरा हुआ है, और उनकी सबसे आसान पहचान उनके अंतिम नाम (उपनाम) से होती है। समय के साथ कई नए नाम विकसित हुए हैं। 

अंबष्ठ द्वारा उपयोग किए जाने वाले कुछ सामान्य उपनाम हैं - अंबष्ट, अंबष्ठ, अंबष्था, अंबुस्त, प्रसाद, सहाय, सिन्हा, वर्मा।

अंबष्ठ कायस्थ मुख्य रूप से बहिर्विवाह (अपने गोत्र से बाहर शादी) के लिए "खास घर" की प्रणाली का पालन करते हैं।* 'घर' का उपयोग उपनाम के रूप में भी किया जाता है। ये "खास घर" अनिवार्य रूप से उन गांवों के पहचानकर्ता हैं जहाँ अंबष्ठ मौर्य काल में तक्षशिला से विस्थापित होने के बाद मगध क्षेत्र में बस गए थे। इनमें से कुछ 'घर' हैं - बड़ियार, बरियार, बर्तियार, भरथुआर, बिलवर, बिरनावे, चरगावे, दराद, डेरहगावे, ढुढुआनी, दुमरवे, एठघर, गहिलवार, गयावर, हरघवे, जमुआर, करपटने, कोचगावे, माहथा जयपुरियार, मेजोरवार रुखाइयार, मालदहियार, मंडिलवार, नंदकुलियार, निमाइयार, पंचबारे, पनपटने,कतरियार, परवतियार, राजगृहार, सकलदिहार, सांडवर और कई अन्य।

प्राचीन काल में अंबस्ट नाम का एक राज्य था जो चंद्रभागा (वर्तमान चिनाब नदी) और ऐरावत (वर्तमान रावी नदी) के बीच स्थित था। अंबस्ट राज्य की चर्चा ब्रह्म पुराण में भी मिलती है। इस राज्य के निवासियों को अंबस्टा कहा जाता था। पाणिनी ने भी कश्मीर के दक्षिण-पूर्व क्षेत्र के निवासियों को अंबस्टा कहा है। श्री चित्रगुप्त के पुत्र हिमवान ने वहाँ मंत्री का पद संभाला था और उनकी पीढ़ियाँ भी वहीं बस गईं। वहाँ के लोग बहुत बहादुर थे और महाभारत में कौरवों के साथ लड़े थे।


 *अम्बष्ठ कायस्थ का विस्तार*




भारतीय इतिहास और ग्रंथों में अम्बष्ठ (या अम्बष्ट/अम्बष्ठ कायस्थ) शब्द का प्रयोग एक प्राचीन समुदाय, राजवंश और भौगोलिक क्षेत्र के लिए किया जाता रहा है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, अम्बष्ठों को भगवान चित्रगुप्त के पुत्र हिमवान (सारंगधर) का वंशज माना जाता है। चिकित्सा (आयुर्वेद), सैन्य और प्रशासनिक क्षेत्रों में इनका विशेष योगदान रहा है।

पौराणिक काल से लेकर आधुनिक इतिहास तक, अम्बष्ठ समुदाय से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सूची नीचे दी गई है:
*पौराणिक एवं प्राचीन कालीन महत्वपूर्ण व्यक्ति*

*भगवान धन्वन्तरि:* हिंदू मान्यताओं के अनुसार इन्हें आयुर्वेद का जनक माना जाता है। धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भों (जैसे 'कायस्थ: एन एन्साइक्लोपीडिया ऑफ अनटोल्ड स्टोरीज') में इन्हें अम्बष्ठ परंपरा और चिकित्सा ज्ञान से जोड़कर देखा जाता है।

*राजा अम्बष्ठ (महाभारत कालीन)*: महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ने वाले एक महान योद्धा और राजा थे। इन्होंने युद्धभूमि में अर्जुन और अन्य योद्धाओं का वीरता से सामना किया था।
*राजा आम्बष्ठ्य*: ऐतरेय ब्राह्मण और प्राचीन ग्रंथों में वर्णित एक प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट, जिन्होंने प्राचीन काल में अश्वमेध यज्ञ संपन्न कराया था।

*राजा आदि शूर (बंगाल)*: इतिहास में बंगाल के सेन और अन्य कायस्थ राजवंशों को अम्बष्ठ परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। राजा आदि शूर ने ही कन्नौज से विद्वान ब्राह्मणों और कायस्थों को बंगाल में लाकर बसाया था।

*आधुनिक एवं समकालीन प्रसिद्ध व्यक्ति (अम्बष्ठ कायस्थ समाज*

वर्तमान समय में अम्बष्ठ मुख्य रूप से उत्तर भारत (विशेषकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश) के चित्रगुप्तवंशी कायस्थ समुदाय की एक प्रमुख उपजाति है। इस समाज से आने वाली कुछ प्रमुख हस्तियां निम्नलिखित हैं:

*महामाया प्रसाद सिन्हा*: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, जो राजनीति में अपने जन-सरोकारों के लिए जाने जाते थे।

*कृष्ण बल्लभ सहाय (के. बी. सहाय):* बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने बिहार में जमींदारी उन्मूलन में बड़ी भूमिका निभाई थी।

*शेखर सुमन* - कायस्थ (अंबस्थ)
जन्म: 14 जून 1960, पटना, बिहार
पेशा: अभिनेता, होस्ट और गायक

*उदय सहाय*: प्रसिद्ध लेखक और पूर्व आईपीएस (IPS) अधिकारी, जिन्होंने कायस्थ समाज के इतिहास पर गहन शोध परक पुस्तकें लिखी हैं।

अम्बष्ठ समाज के लोग पारंपरिक रूप से अपनी बुद्धिमत्ता, प्रशासनिक नेतृत्व, लेखन और कला के क्षेत्रों में अग्रणी माने जाते हैं。

साभार
गूगल, कायस्थ इनसाइक्लोपीडिया

बुधवार, 19 अगस्त 2026

नमामि मातृभूमि हे !




 नमामि मातृ भूमि हे! नमामि भारतीयता।

नमामि सैन्य शक्ति हे ! नमामि वीर वीरता।।


वसुंधरा निहाल है, हवा सुगंध दे रही।

अनाज की बहार है, नदी प्रबंध दे रही।

विभावरी खिली रही, शशांक भी रहा खिला।

स्वतंत्रता मना सकें, वही दिनांक है मिला।

नमामि मातृभूमि हे! नमामि भारतीयता।

नमामि सैन्य शक्ति हे ! नमामि वीर वीरता।।1


सुहासिनी सुभाषिणी, तुम्हें प्रणाम माँ सदा।

प्रसन्न स्वाभिमान में, करोड़ कंठ संपदा।

समस्त सृष्टि के लिए, अनेक शस्त्र धारती।

विराजमान हो सदा, भरो मिठास भारती।

नमामि मातृ भूमि हे! नमामि भारतीयता।

नमामि सैन्य शक्ति हे ! नमामि वीर वीरता।।2


प्रबुद्ध चेतना रहे, कदम कभी रुके नहीं।

विराट आसमान में, ध्वजा कभी झुके नहीं।

नवीन शब्द हो न हो, सृजन कभी न रिक्त हो।

प्रबल विचार हों सदा, शरीर प्राण सिक्त हो।

नमामि मातृ भूमि हे, नमामि भारतीयता।

नमामि सैन्य शक्ति हे, नमामि वीर वीरता।3

रविवार, 5 जुलाई 2026

सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना



विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा ।

सबके हृदय में प्रवेश करना

आखर की माला तुमने सजाई

पन्नों पर उसको लेकर उतरना

विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा


मिले ज्ञान-मोती सबको ही जग में

कदमों के नीचे हों फूल मग में

बुद्धि सरल और निश्छल हो वाणी

गुरुओं का आदर करें बन के ध्यानी 

अन्तस् में ज्योति खुशियों की धरना

विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा।


शब्दों में गरिमा की है जरूरत

यही इस जगत को संज्ञान देना

व्यवहार प्रेमिल हो सारे जगत से

मुख पर सभी के मुस्कान देना

वीणा से अपनी मधुर गान गढ़ना

विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा।

  ऋता शेखर


गुरुवार, 11 जून 2026

जिस धरती ने पाला पोसा

 🌱पर्यावरण दिवस पर🌱


जिस धरती ने पाला पोसा

उसका हम सम्मान करें

फसलों की उर्वर माटी पर

खड़ा न कोई मकान करें।


जल से है पृथ्वी पर जीवन

हरदम इसका ध्यान धरें

डिटर्जेंट डाल डाल सरि को

कभी न लहूलुहान करें।


प्राणवायु देता है पीपल

बरगद से मिलती है छाया 

मेट्रो के खम्भे ने छीना

उनसे उनकी विस्तृत काया


माटी नीर पादप पवन

हैं पूजा के शुद्ध हवन

वे जब होंगे जग में रक्षित

जीवन भी होगा संरक्षित।


ऋता शेखर


गुरुवार, 4 जून 2026

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे




सोलह चंद्र-कला को धारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


भाद्र कृष्ण का था अँधियारा

किलकारी से गूँजा  कारा।

वासुदेव तन्द्रा से जागे

पल में वह मथुरा को त्यागे।

चपल दामिनी चमक रही थी

यमुना की धारा तेज बही थी।

शेषनाग ने ताना छाता

वही बने थे बलभ्रद भ्राता।


कौतुक करते थे वह सारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


मात यशोदा के घर आये

वहाँ नंद के लाल कहाये।

मोरपंख से सजता कुंतल

कानों में झूला था कुंडल।

जब जब मुख पर दधि लपटाए

नटखट बन अँखियाँ मटकाए।

खूब चराते हो तुम गैया

किये सर्प पर ता ता थैया।


बाल रूप में लगते न्यारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे।


जिसने तुमपर आस लगाया

तुमने उनका दर्द मिटाया।

धर्म ध्वजा तुम जब फहराते

आहत अर्जुन भी सुख पाते।

जग का पालन करने वाले

दीनों के तुम हो रखवाले।

गहरा है यह भव का सागर

आओ अब हे नटवर नागर।


तुम्हीं लगाओ हमें किनारे

कृष्ण कन्हैया माधव प्यारे


ऋता शेखर


बुधवार, 22 अप्रैल 2026

इच्छा मृत्यु

 



उधेड़बुन

"जब से न्यायालय का निर्णय आया है

मन पर उधेड़बुन का गहरा साया है

यह उधेड़बुन निर्णय पर नहीं,

नाम पर है क्योंकि नाम है 'इच्छा मृत्यु'"


"मगर नाम पर  उधेड़बुन कैसा है? "


"मरने वाला अपनी इच्छा व्यक्त नहीं कर पाया।

उसकी इच्छा का कहीं जिक्र न आया।

अस्पताल में जीवन मिलता है

परिजनों का चेहरा खिलता है।

उसे  मृत्यु देने के लिए

जीवनदायिनी यंत्र हटाये गए

भोजन पानी घटाए गए।

वह बेबस बोल नहीं पाया

उसकी तंत्रिकाओं पर था

शिथिलता का साया।

पर उसे महसूस तो होता होगा

मन ही मन वह भी रोता होगा।"


"यह निर्णय तो परिवार का है

उनके थके हुए संसार का है।"


" इसलिए सब कुछ सहज लिया गया।

वेद मंत्रों द्वारा उसको विदा किया गया।"


" मगर बंधु

आज भी मन में एक प्रश्न समाया है।

क्या वृद्धों के लिए भी

इच्छा मृत्यु का समय आया है?"


" यह उधेड़बुन बेमानी है। 

जीवन की ये अवस्थाएँ

आनी हैं तो आनी हैं।"


" बंधु ! समझो मेरी बात

धूप छुपे तो आती रात।

वृद्ध बेबस मजबूर हुए

उनके सपोर्ट सिस्टम 

उनके बच्चे

 घर से कितनी दूर हुए।

रसोई वक्त बेवक्त जगती है

वह भी सगी न लगती है।

तन मन पर भारी असर हुआ है

लगता है जैसे कहर हुआ है।

बदले समय का निर्णय

क्या पारिवारिक विघटन है?

क्या इच्छा मृत्यु के लिए विवश

ये सामाजिक अकेलापन है ?"


प्रश्न तो समय के साथ-साथ

समाधान पा जायेंगे

मगर अभी तो हम

उधेड़बुन में ही जिये जायेंगे।


ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

मिट्टी की खुशबू

 मिट्टी की खुशबू और हम


जिस मिट्टी की तिलक लगाने

हम नीचे झुक जाते हैं

वह चंदन कण बन माथे पर

भारत  का मान बढ़ाते हैं


बारिश की वह प्रथम बूंद है

जो मिट्टी को महकाती है

सोंधी सोंधी खुशबू देकर

पकौडों को ललचाती है

मन मयूर बन जाता है

सतरंगी पँखो को खोले

विविध-भारती गाते हैं


मन सावन जब बने बसंती

दिख जाते हैं कृष्ण-राधिका 

ब्रज-माटी पर बसी प्रीत से

दर्शन की प्यासी बनी साधिका

मिट्टी की खुशबू जब उड़ती 

यमुना तट के कदम्ब पेड़ 

मुरली के राग सुनाते हैं।


मन ही मोहन, मन ही राधा

मन ही गोपियाँ मन अभिलाषा

मिट्टी की खुशबू मन जब मोहे

मीरा की बनती परिभाषा

मिट्टी से ही है जनजीवन 

मिट्टी पर उगकर नवरातों में

अन्न खुशी बरसाते हैं।


माटी घट के शीतल जल में

खुशबू उसकी घुल जाती है

मन वृंदावन हो जाता है

तृषित को तृप्ति मिल जाती है

खुशबू से हो प्रेम अपरिमित

जब तक मिट्टी न बन जायें

 फिर तो सागर इसे बहाकर 

दूर देश ले जाते हैं।


ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

आया बसंत

 



बासंती हाइकु

1

खिले जलज

पवन मलयज

आया बसंत।

2

पीत पराग

ऋतुराज का पाग

है अनुराग।

3

मंद पवन

अनुरागी छुअन

बासन्ती मन।

4

विरही मन

कहाँ पाए बसंत

रंग बेरंग।

5

वाणी की वीणा

मंद मंद रागिनी

खोया है मन।

6

सरसों फूल

पीले परिधान में

सजती धरा।

7

खिले कुसुम

उमंग की बहार

राग बसंत।

8

खिली कलियाँ

निखरा है बसंत

गाये भ्रमर।

9

हिली टहनी

झरी है झर-झर

हीरक कनी।

10

बासंती घट

सृष्टि ने रंग लिया

मन का पट।

11

बाँटती हवा

हर तरफ इत्र

खिले हैं पुष्प।

12

हवा जो चली

नाच उठी क्यारियाँ

झूमा बसंत।

13

प्रीत का रंग

लगे जो एक बार

छूटे न संग।

14

आम्र वाटिका

कोयल की कूक में

बासंती गीत।

15

भीनी सुगंध

आमों के बौर कहे

जी लो बसंत।


ऋता शेखर

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

भारत वंदना

 माटी के कण-कण में देखो, हुआ सुवासित चंदन।

गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।


उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम, सुंदर सभी दिशाएँ।

अरुणोदय या हो अस्ताचल, दृश्य मनोहर लाएँ।।

जहाँ खड़ा है अटल हिमालय, गङ्गा बहती है पावन।

हर मौसम है यहाँ सुहावन, रहे शरद या सावन।।

सागर की लहरें भरती हैं, पग में शीतल स्पंदन।

गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।


वेद पुराण हमें सिखलाते, सरल मार्ग अपनाना।

रामायण से हमने अपने, आदर्शों को जाना।।

श्लोकों के हर बीज मंत्र में, ऊर्जा अमित समायी।

दया धर्म का पाठ पढ़ाकर, मानवता ले आयी।।

कहते कृष्ण सार जीवन का, मानो इसे न क्रंदन।

गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।


ओज भरी वीरों की धरती, सदियों से हम पाए।

सम्राटों के किस्से सुनकर, गौरव गाथा गाए।।

संस्कारित शिक्षित मानवता, जन जन के मन जागे।

सब मिलकर जब कदम बढ़ाएं, होगा भारत आगे।।

लहराए सब ओर तिरंगा, ऐसा हो अभिनंदन।

गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।

ऋता शेखर 'मधु'