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गुरुवार, 12 जून 2025

परिधान

 परिधान

सभ्यता उन्नत हुई, तब आया परिधान।

पहनावा भी है  नियत, है इनका भी स्थान।।


लहँगा चुन्नी साड़ियाँ, दुल्हन का परिधान।

मंडप पर होता नहीं, जींस टॉप में दान।।


पूजाघर में सोच लो, बिकनी का क्या काम।

सूट साड़ी ओढ़नी, लेती उसको थाम।।


 स्वीमिंग पूल में कहाँ, साड़ी बाँधें आप।

सोचो ट्रैक सूट बिना, छोड़ें कैसे छाप।।


सेना वर्दी में रहें, तब होती पहचान।

स्कूल ड्रेस जब से बनी, बच्चे हुए एक समान।।


धोतियाँ शेरवानियाँ, लड़के पहनें सूट।

कश्मीरी जूता सहित, भाते उनको बूट।।


वस्त्रों से माहौल भी, पा जाता है भेद।

मातम में अक्सर मनुज, भाता रहा सफेद।।

ऋता शेखर


क्यों दिखलाते अंग को, कैसी है अब सोच।

गरिमा तन की भूलकर, दिखलाते हैं लोच।।


कितनी फूहड़ सी लगें, आधे वस्त्रों में नार।

उल्टे सीधे तर्क में, छोड़ें सद्व्यवहार।।

शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

डमरू घनाक्षरी


डमरू घनाक्षरी - शृंगार रस

वर्णिक छंद- 8, 8, 8, 8 की एक पंक्ति

हर अठकल अमात्रिक - त्रिकल त्रिकल द्विकल से

चार समतुकांत पंक्तियाँ


अनत जगत यह, सरल सहज वह,

करत नयन नत, मदन भजन रत।1

कमल नयन लख, चरण शरण रख,

असत गरल हत, नमन करत शत।2

तपन सहन कर, हवन भवन धर,

धरम करम गत, फलत रमन तत।3

बरस सघन घन, हरष रतन मन।

बढ़त फसल सत, मगन सदन बत। 4

-------------------------------  

द्वितीय छंद


चमक दमक कर, कनक कलश  भर,

चलत अचल हल, जनमत सिय थल।1

चहक चहक खग, नटत अयन मग,

चहल पहल ढल, मगन भवन तल।2

जनक नगर घर, लखन दरस कर,

हरष हँसत जल, नवल कँवल दल।3

सकल चयन कर, वरण रमण वर,

सरल सहज पल, झरत सरस फल।4

- ऋता शेखर

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

बेटियाँ वरदान हैं

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस













संसार के सुन्दर सृजन में, बेटियाँ वरदान हैं।

माता पिता की लाडली अब बन रही अभिमान हैं।।

बेटी पढ़े आगे बढ़े यह कह रही सरकार है।

उसकी खुशी सबसे जरूरी जो बनी आधार है||1


बगिया सुवासित देखकर के, गुनगुनाती बेटियाँ|

नभ में पतंगों को उड़ाकर, मुस्कुराती बेटियाँ||

अम्बर सितारे टिमटिमाए, जगमगाई बेटियाँ|

कलकल नदी की धार बनकर, खिलखिलाई बेटियाँ||2


जब बूँद बनकर बारिशों में, नाचता सावन कभी|

रुनझुन हुई है पायलों की, हँस दिए आँगन सभी||

शृंगार बालों का हुआ है, झूलती है चोटियाँ|

चकले थिरक जाते खुशी से, बेलती जब बेटियाँ||3


लगती कमलदल सी सुकोमल, धैर्य में है झील सी|

जगमगाती दीप बनकर, रोशनी कंदील सी||

प्राची हँसी पूरब दिशा में भोर की लाली बनी|

धरती सुहानी बेटियों सी खेत की बाली बनी||4


वह चाहते हैं बेटियों को, सरस्वती बसती जहाँ |

जो पूजते हैं बेटियों को, लक्ष्मी रहती वहाँ||

कुछ पर्व भारत में बने जो, बेटियों से हैं खिले|

होंगी नहीं जब बेटियाँ तब, राखियाँ कैसे मिले||5


कुछ शील्ड भारत को मिले हैं, बेटियों के काम पर।

वह हों बछेन्द्री पाल या फिर, कल्पना के नाम पर।।

वैमानिकी तकनीक हो या, हो पहाड़ी चोटियाँ।

बढ़ती गईं आगे हमेशा, हिन्द की ये बेटियाँ।।6


भारत बहादुर बेटियों से, पा रहा गौरव कई।

वह पाँच महिला हैं खिलाड़ी, जो भरें सौरभ कई।।

झूलन क्रिकेटी टीम में रह, जब बनी कप्तान थीं।

तब गेंदबाजी में रमी वह, देश में वरदान थीं।।7


जमुना मुक्केबाज ने तो, रच दिया इतिहास है।

चौवन किलो की वर्ग श्रेणी, वह उन्हीं से खास है।।

तसनीम सोलह वर्ष में ही, रैंक नम्बर वन बनी।

गुजरात की महिला खिलाड़ी, बैडमिंटन बन तनी।।8


जब खेल लंबी कूद अंजू, चैंपियन बनती रहीं|

अनगिन पदक वह नाम अपने, देश के करती रहीं||

आसाम में जनमी हिमा ने,रेस को करियर बनाया|

वह गोल्ड मेडल पाँच जीती, देश का गौरव बढ़ाया|९


माता पिता का साथ पाकर खिल उठी हैं बेटियाँ।

चाहे पढ़ाई नौकरी हो, चल पड़ी हैं बेटियाँ।।

जूडो कराटे भी सिखाएँ, आत्मविश्वासी बनाएँ।

अपनी सुरक्षा कर सकें वे, आत्मबल साहस बढायें।।10


सौन्दर्य का प्रतिमान बनकर वह बनी अभिकल्पना|

माधुर्य का अभिदान पाकर, सृष्टि की अनुरूपना||

जिसने सजाए भाव सारे, क्यों वही अनजान है?

दो-दो घरों से मान पाना, क्यों महाअभियान है??11


जो पूजते नौ देवियाँ पर, बेटियाँ भाती नहीं|

समझे पराया धन हमेशा, वंश की थाती नहीं||

बहुएँ सभी को चाहिए पर, बेटियाँ लाते नहीं|

जब हों मुखौटे इस तरह के, मान वे पाते नहीं||12

--- ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

फिल्म पर दोहे












लाइट ऐक्शन कैमरा, तीन शब्द है फ़िल्म।

संप्रेषण संवाद का, बहुत बड़ा है इल्म।।1


सुन्दर सज्जा नृत्य की, आकर्षक तस्वीर|

देशभक्ति या प्रेम की, सुन्दर सी तहरीर||2


तेरह सन उन्नीस में,प्रथम फिल्म थी मूक|

मिली साल इकतीस में, मौन रील को कूक||3


राजा हरिश्चंद्र रहा, मूक फ़िल्म के पास|

आलम आरा स्वर सहित, रचे फ़िल्म इतिहास||4


सोलह नौवें माह का, फ़िल्म दिवस श्रीमान|

सस्ती मिलती है टिकट, यही मान पहचान||5


फ़िल्म जगत के नाम कुछ, भारत में हैं ज्ञात।

टॉलीवुड तेलुगु-तमिल,बॉलीवुड विख्यात।।6


मिले सिनेमा में हमें, चलते फिरते दृश्य।

कुछ हैं बालक के लिए,रहते कुछ अस्पृश्य।।7


फाल्के जी के नाम पर, बने हैं पुरस्कार।

अभिनय निर्देशन बने, उत्कृष्ट फिल्मकार।।8


पार्श्व गायकी के लिए, लता रहीं उत्कृष्ट।

पुरुष वर्ग में थे रफी, रहे जो अति विशिष्ट।।9


शोमैन जो कहे गए, वह थे राज कपूर।

सुन्दर मधुबाला हुईं, दुनिया में मशहूर।।10


कवि प्रदीप ने रच दिया, देशभक्ति का सार।

मन वीणा के तार पर, मधुरिम है झंकार।।11


फिल्में मन पर डालती, अपना बहुत प्रभाव।

उनमें कुछ सन्देश हों, संग रहे कुछ चाव।।12

बुधवार, 24 अगस्त 2022

सार गीता का समझकर मन मदन गोपाल कर

2122 2122 2122 212

जो मिला वरदान में वह जन्म मालामाल कर|
मान रख ले तू समय का जिन्दगी संभाल कर ||१

ध्यान हो निज काम पर ही यह नियम रख ले सदा |
बात यह अच्छी नहीं तू बेवजह हड़ताल कर ||२

कर कहीं उपहास तो मनु जाँच ले अपना हृदय |
सामने उस ईश के तू क्यों खड़ा भ्रम पाल कर ||३

त्याग के ही भाव में संतोष का धन है छुपा |
सार गीता का समझकर मन मदन-गोपाल कर ||४

बाँध लेता प्राण को जब मोह का संसार यह |
शुद्ध पावन सद्-विचारी उच्च अपना भाल कर ||५

इस जगत में मान ले तू प्रेम है सबसे बड़ा |
हो न ममता साथ तो कब कौन होगा ढाल पर||६

काट कर वन, घर बसाया खग बिना घर के हुए |
पा गया तू क्या मनुज जब हैं न पंछी डाल पर ||७

@ ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 10 अगस्त 2022

दोहा में नटराज


विषय- नटराज
============
शिव  ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में
चित्र गूगल से साभार



















1

चोल वंश ने कांस्य से, सृजित किया नवरूप।
तांडव मुद्रा में ढले, शिवजी लगे अनूप।।

2

शिव नर्तक के रूप में, कहलाये नटराज।
बस एक बार प्रेम से, दें उनको आवाज।

3

नृत्य करें नटराज जब, स्पंदित हो आकाश।
महायोगी महेश वह, उनसे है कैलाश।।

4

नटराजन के नृत्य से, कण कण भरे प्रमोद।
जग सारा गतिशील है, डमरू करे विनोद ।।

5

घूम रहे ब्रह्मांड में, नीलकंठ नटराज।
अंतरिक्ष की ओम ध्वनि, खोल रही यह राज।।

6

शर्व: हरो मृडो शिवः, या कह लें नटराज।
एक नाम है तारकः, डमरू जिनका साज़।।

7

शिव वेदांगों शाश्वतः, उनकी कृपा अपार ।
करने जग-कल्याण वह, आते बारम्बार ।।

8

चार भुजाओं से सजे, कदम उठे ज्यों ताल |
हर मुद्रा को सीखकर, नर्तक हैं मालामाल||

9

प्रीत भरा संसार हो, सद्भावी हो ठाँव |
बौनारूपी द्वेष पर, थिरके शिव के पाँव ||

10

एक हाथ में दिख रहा, डमरू जैसा साज| 
दूजे से जग को अभय, देते हैं नटराज ||

11

अनल घेर में हैं घिरे, लेकर ऊर्जा स्रोत |
आभामंडित शिव धरे,नृत्य पक्ष प्रद्योत||( नृत्य की एक मुद्रा)

@ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 7 जून 2022

छंद विजात में परमपिता

छंद - विजात
************
मात्रा विधान - १२२२ १२२२ , १४ मात्रिक सम छंद
चरण-४, चरणारंभ-१ लघु
चरणान्त-२२२(तीन गुरु)
****************











जिसे संसार ने जाना | 
जिसे संसार ने माना ||
सभी में जो समाया है | 
न नश्वर है न काया है ||१


उसी से आस मिलती है | 
उसी से श्वास खिलती है ||
जहाँ कण -कण लुभाया है| 
समझ लो ईश आया है||२

जहाँ विश्वास मिलते हैं |
वहाँ पर फूल खिलते हैं ||
लगाकर आस का चंदन| 
करें हम ईश का वंदन ||३

नदी की धार में बहते | 
किनारे दूर ही रहते ||
मिले उनका सहारा जब | 
जहां में कौन हारा कब ||४

धरा की हर फसल कहती | 
कृपा उनकी बनी रहती ||
तभी पावस बरसते हैं | 
तभी तो पेट भरते हैं ||५

दिवस भर सूर्य चलता है| 
निशा में चाँद ढलता है ||
इशारों पर हिलीं पातें| 
कहें सब ईश की बातें ||६

अमन को ध्यान में धरती | 
खुदा से कामना करती ||
दिलों में हों मुहब्बत भी | 
रक़ीबों पर मुरव्वत भी ||७

रहें सब साथ मिलजुल कर | 
चमन में गुल हँसें खुलकर ||
पवन जब चले बहारों में| 
नयन रीझे नजारों में ||८

– ऋता शेखर ‘मधु’

शुक्रवार, 20 मई 2022

कुछ हो अनूठा कुछ नवल हो

हरिगीतिका छंद- 
मात्रा विधान- २२१ २२२ १२२(१६), २१ २२२ १२(१२) 
दो-दो पंक्तियाँ तुकांत 

 कविमन सृजन में तब लगे जब, शब्द का शृंगार हो। 
कुछ हो अनूठा कुछ नवल हो, भाव में कुछ सार हो।। 
आरम्भ हो सुन्दर सुरीला, रागिनी उर में बजे। 
भारत वतन के ही लिए तो, लेखनी में धुन सजे।।1 

 हर साधना में गीत सारे, प्रीत के सुर में ढलें | 
धागा रहें या मंजरी हों, संग ले सबको चलें || 
संसार की राहें कठिन हैं, है न मंजिल का पता | 
हे ईश ! तुझसे पूछते हैं, तू इसे हमको बता ||२ 

 पर्यावरण था शुद्ध पावन, जो विरासत में मिला | 
नुकसान सबने ही किया है, फिर करें किससे गिला || 
शुरुआत भी हम ही करेंगे, सृष्टि के शॄंगार का | 
जो खो गया वह लौट आये, गीत रच मनुहार का ||३ 
 
जब भोर से वसुधा मिले तब, यह नवल आगाज़ है | 
उल्लास से सुरभित गगन में, अनकही परवाज़ है || 
बगिया सुगंधित पुष्प से है, गूँजती किलकारियाँ | 
हर ओर जीने की ललक है, भर गईं पिचकारियाँ ||४ 

 दिन यूँ निकलता ही रहे अब, ख्वाहिशें ये हैं बड़ी | 
बन के अटल है पग बढ़ाना, जब कभी बाधा अड़ी || 
पतवार साहस की लिए हम, राह में आगे बढ़ें | 
संसार को हम जीत लेंगे, सोच को मन में मढ़ें ||५ 

==ऋता शेखर ‘मधु’

रविवार, 2 जनवरी 2022

प्यार दो---प्यार लो...नव वर्ष पोस्ट



ग्रुप आइकन का चित्रांकन-आराधना मिश्रा


हमारा व्हाट्सऐप पर तीन वर्षों से चल रहा एक समूह है...
नाम है "गाएँ गुनगुनाएँ शौक से"
संस्थापक हैं जानी पहचानी ब्लॉगर अर्चना चावजी
२०२१ के दिसम्बर महीने में मेरा मन हुआ कि सभी गुणवान सुरीली सखियों पर दोहे लिखूँ|
मैं हर दिन एक दोहा लिखती और सबको बूझना होता था कि किसके लिए दोहा लिखा गया| मजे की बात यह कि सारी सखियाँ हर दोहे में फिट बैठती थीं...फिर भी कुछ अलग खासियत सभी में होती...जो व्यक्ति विशेष को खास पहचान देती है| उसी एक गुण के आधार पर समझना होता था| हमने सबके लिए दोहे लिखे...और मुझे भी सबकी ओर से वह अभिव्यक्ति मिली जिसमें मैं सराबोर...सखियों के प्रेम में डूबी रही|

पहले पढ़ें...वह दोहे जो मैंने लिखे|

दोहा1. प्रिय शुचि मिश्रा के लिए
पावन उसका नाम है, है सुन्दर  संस्कार।
चंचल चंचल हैं नयन, जिसपर आये प्यार।।💐💐

दोहा 2. प्रिय रश्मि कुच्छल जी के लिए
मन रमता अध्यात्म में, मन में बसते श्याम।
भोर किरण सी छा गयी, पाकर के पैगाम।।

दोहा 3. प्रिय संध्या शर्मा जी के लिए
जिसके गानों से लगे, कोयल का आभास।
जिसके शब्दों में बँधे, अवनि संग आकाश।

दोहा 4.प्रिय शिखा वार्ष्णेय जी के लिए-
आँखों में सपने भरे, पंखों में विस्तार।
फिर भी है कुछ अनकहा, क्यों वह जाती हार।।

दोहा 5. प्रिय वंदना अवस्थी जी- साधना दी की जोड़ी के लिए-
दोनों एक दूसरे की जानम-जानेमन-
इक दूजे की जान हैं, ऐसा होता भान।
शब्द-सुरों के मेल से, टपके उनका ज्ञान।।

 दोहा 6. प्रिय शोभना चौरे दी-गिरिजा दी के लिए-
साथ साथ हम घूमते, जिनके सारा गाँव।
अनसुने हैं गीत नवल, झूमे सबके पाँव।

दोहा 8. प्रिय संगीता अष्ठाना जी के लिए-
वह सुरीली एक सखी, ब्लॉग समय से खास।।
समझा हमने दर्द को, समझा था अहसास।।

दोहा 7. प्रिय आराधना मिश्रा के लिए-
तन्मयता की सीख में, रहता सदा धमाल।
पाठ-पूजा चाय कड़क, करते मालामाल।।

दोहा 9. प्रिय अर्चना चावजी के लिए
जीवन झंझावात में, धीरज अटल प्रबुद्ध ।
ढल जाते हैं श्लोक में, जाने कितने बुद्ध।।
गढ़ते हैं सबके लिए, सदा नए आयाम।
दो पंक्ति में बँधे नहीं, उनके अनगिन काम ।।

दोहा 10 प्रिय निरुपमा चौहान जी के लिए-
गाएँ या गाएँ नहीं, टिप्पणी मजेदार।
प्यार के संग डांट का , गुण भी अपरम्पार।।

दोहा 11.प्रिय रचना बजाज जी के लिए-
गहरी सी आवाज पर, ठहरे मोहक गीत।
भजन श्लोक शालीनता,खूब निभाये रीत।।

दोहा 12. प्रिय अंजू गुप्ता जी के लिए
लेखन गहरे प्यार का, सदा खोलता पोल।
स्वयं प्यार से हैं भरी, बाँट रहीं दिल खोल।।

दोहा 13. प्रिय पूजा साधवानी जी के लिए-
बोली है या है शहद, हो कैसे पहचान।
संयोजन का गुण बड़ा, कुटुम्बकम  अरमान।।

दोहा 14- प्रिय वंदना अवस्थी दूबे जी के लिए-
फर-फर चलती लेखनी, गजलों की सिरमौर।
लीक पर वह चलें नहीं, हो कोई भी  दौर।।

दोहा 15. प्रिय घुघुती वासुती(शशि जी) जी के लिए-
उमड़ घुमड़ कर मिल रहा, उनका पंछी प्रेम ।
घर से बाहर तक दिखे, उनके सुन्दर नेम।।

दोहा 16. प्रिय प्रियंका गुप्ता जी के लिए-
जापानी गुड़िया लगे, बोली में बिंदास।
 हाइकु या हो लघुकथा, मन में उतरे खास।।

दोहा 17. प्रिय रश्मिप्रभा दी के लिए-
मीलों तक है फैलता, आँचल का विस्तार।
सोख रहा है अश्रु कण, सुनकर करुण पुकार।।
कृष्ण पार्थ की हर व्यथा, लेखन का आधार ।
भाव सरल सद्भाव के , शब्दों के नव हार।।

दोहा 18. प्रिय उषा किरण दी के लिए-
शतदल मुरझाए नहीं, रहता है यह ध्यान।
रूठे जब कोई कभी, लौटता ससम्मान ।।
उत्कृष्ट भाव से सजे, शब्द रहे या रेख।
सरल सहज मुस्कान में, वह सुन्दर आलेख।।

दोहा 19. प्रिय सुनिति बैस जी के लिए-
गुलशन में बादे सबा, गुल पर सुन्दर रंग।
गजलों में वह सज रहे, भाव वज्न के संग।|

दोहा 20. प्रिय मंजुला पाण्डेय जी के लिए-
माहिर उनकी हर विधा, संस्कृत उनकी खास।
काव्यपाठ है कर्णप्रिय, चमक नाम के पास।

दोहा 21. प्रिय इस्मत जी के लिए-
यहाँ दूज का चाँद हैं, गजलों से पहचान।
किस्मत से मिलता रहा, यदा कदा  ही गान ।।

दोहा 22. प्रिय सोनिया जी के लिए-
प्यारा प्यारा गान है, प्यारी सी मुस्कान।
सात समंदर पार से, कर देतीं हैरान।।

दोहा 23. प्रिय शोभना चौरे दी के लिए-
नीम आम सौगान से, है अमीर सा गाँव।
वहाँ वृहद विस्तार में, वह बरगद की छाँव।।
भजन पूजन पाक कला, या हो चंचल गान।
उनके आने से लगे, आया यहाँ विहान।।

दोहा 24. प्रिय गिरिजा कुलश्रेष्ठ दी के लिए- 
उनकी बाल कहानियाँ, जैसे परी उड़ान।
ऐसा खींचे चित्र वह, आ जाती मुस्कान।।
डिप्लोमेटिक वह नहीं, बोलें सच्ची बात।
खुशकिस्मत साहित्य है, पाकर के सौगात ।।

 दोहा 25. प्रिय साधना वैद दी के लिए-
यात्रा उनकी है बड़ी, वियतनाम के देश।
काव्यपाठ या छंद हो, है पूजा परिवेश।।
ऊर्जा की वह स्रोत हैं, हैं समूह की जान।
टास्क में हो गीत सदा, होते यह अरमान।।
=================================
वह स्नेह जो मुझे मिला

मधु सी मीठी वाणी और 
समग्र सुधा सी बरसें
जब जब रचें नव बैन
सिद्धहस्त, मृदुभाषी, 
मन विभोर कर देतीं
हंसते कंवल से नैन
== संगीता अष्ठाना जी
*****************
(1) वेद की ऋचाएं कहूँ तुम्हें या फिर कहूँ कोई राग
पूरित क्रियाकलापों में आपके,, बिखरा हो जैसे पराग

(2) "ऋता शेखर मधु"में समायें 
ऋता सी, शेखर में सम्भाले शिव का सम्पूर्ण
तो मधु में बिखेर मधुरस अपना 
डुबा ले जातीं सबको नशा सा करा साहित्य का
कि खड़े हैं मन्त्र मुग्ध से सभी
मद्य पान कर मधु से बने उन दोहों का
एक तरफ तो मधु से करा रहीं वो शहद का भान
वहीं दूसरी ओर लगता, जैसे किया हो कोई.... मद्यपान
== अंजू गुप्ता जी (तितली)...
********************
अब तक वो करती रही, सखियों का गुणगान!
अब सखियों की बारी है, उनका करें बखान! 
सबका मत बस एक ही है, 
ऋता ( जी) गुणों की खान !! 🥰
== रचना बजाज
*************************
हमारी सर्वगुण सम्पन्न हरफन मौला ऋता जी के प्रति मेरे उदगार । 

ऋता शारदा का तुम्हें, मिला खूब वरदान 
धन्य हुए पाकर तुम्हें ,अद्भुत गुण की खान । 

== साधना वैद 
***********************
रच रच दोहा छन्द नित, सबका किया बखान|
अजब गज़ब यह रूपसी, लगती नन्ही जान ||
नन्ही जान शरीर से मन की शक्ति अपार |
वाणी सा सुन्दर सृजन, नेह कुशल व्यवहार ||
== गिरिजा कुलश्रेष्ठ
*****************************
कविता की कल कल सरिता सी
नित नई लहर ले आती हैं दी 
सूक्ष्म शब्द ,अर्थ विस्तृत हैं लिए आनन्द अपार ,
ऋता लिखूं या ऋचा मैं उनको 
नेह भेंट करें स्वीकार 🙏💐🙂
मैंने दी को कोरोना काल में बराबर पढ़ा कि कितने नियमानुसार,अनुशासित रहकर उन्होंने धीरज से सब संभाला ।
पहले कुछ हायकू लिखे थे मैंने ,सिखाने के लिए ,स्नेहपूर्वक उनमें सुधार के लिए हमेशा उपस्थित रही दीदी ।
== रश्मि कुच्छल
*************************
हर विधा को साध ले, निभाये नियम सब साथ,
सुंदर निपुण निष्ठावान, ये कर्तव्यनिष्ठ अपार।
== शिखा वार्ष्णेय
***************************
धुन की पक्की
--अर्चना चावजी
***************************
अद्भुत हैं अनमोल हैं, गुण भी अपरम्पार ।
इनके हर-इक शब्द में, प्यार भरा उपहार।।
@Rita दी ये दोहा आपके लिए हमारी तरफ से सादर सप्रेम भेंट 😍😘🤗🙏
== संध्या शर्मा 
*************************
हमें दोहे लिखने नहीं आते पर प्रयास किया है ऋता जी के लिए प्यार सहित-
सहज सरल मनभावनी, सभी गुणों की खान।
देखन में छोटी लगें, करतीं बड़े कमाल ।।
== उषा किरण
==**==**==**==**==**==

रविवार, 12 दिसंबर 2021

दोहे



दोहे
1.
सुदामा संग कृष्ण ने, खींचा ऐसा चित्र |
बिना बोले समझ सके, वह है सच्चा मित्र ||
2.
एक ही खान में रहें, कोयला- कोहिनूर |
एक जलकर राख हुआ, एक न खोए नूर ||
3.
भवसागर में जब कभी, मिल जाए मझधार |
हर मा़ँझी को चाहिए, हिम्मत की पतवार ||
4.
प्राची में हो लालिमा , खग चहके चहुँ ओर |
वेद ऋचाओं से भरे, वह सिन्दूरी भोर ||
5.
आँखों में सपने भरे, पंखों में विस्तार |
सबके मन को जीतकर, जाती खुद को हार ||
6.
होता है हर बात में , समझ- समझ का फेर |
समझ सके न प्रीत लखन | राम चख लिये बेर ||
7.
मन पूरा ब्रह्मांड है, मन है विस्तृत व्योम |
बस थोड़ा सा ध्यान हो, गूँज उठेगा ओम ||
8.
मन मंदिर में जब बसे, रघुनंदन श्रीराम |
सारी चिंता त्याग कर, मन पाता विश्राम ||
9.
अंतर-आत्मा से सदा, निकले सच्ची बात |
मिलावट है दिमाग में, करे घात-प्रतिघात ||
10.
कड़े दन्त से जो भ्रमर, करे काष्ठ में छेद|
शतदल में कैदी बने, कैसा है यह भेद ||
--ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 13 मार्च 2021

मन सबका है एक सा- दोहा गीतिका


दोहा गीतिका

रंग बिरंगे पुष्प हैं, बगिया के आधार।

मिलजुल कर मानव रहें, सुन्दर हो संसार।।


तरह तरह की बोलियाँ, तरह तरह के लोग।

मन सबका है एक सा, सुखद यही है सार।।


मंदिर में हैं घण्टियाँ, पड़ता कहीं अजान।

धर्म मज़हब कभी कहाँ, बना यहाँ दीवार।।


दान पुण्य  से है धनी, अपना भारत देश।

वीर दे रहे जान भी, जब जब लगी पुकार।।


यहाँ कृष्ण का प्रेम है, यहीं राम का धैर्य।

जगपालक जगदीश हैं, शिव करते संहार।।


चैती से ही चैत्र है , होली से है फाग।

आल्हा ऊदल ने कभी, भरी यहाँ हुंकार।।


अतिथि यहाँ पर देव हैं, पितरन पाते मान।

कोविड औषध बाँटकर, बना वतन दिलदार।।

----ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

चाँद-चाँदनी

 चाँद- चाँदनी...


चंदा की तुम चाँदनी, झरती सारी रात।

गगन अनोखा दे रहा, धरती को सौगात।।1


देख अमा की रात को, नहीं मनाना शोक।

घट-बढ़ ही है जिन्दगी, सीखे तुमसे लोक।।2


रूप रुपहला है मिला, लगते वृत्ताकार।

सूरज से रौशन रहे, लेकर किरण उधार।।3


तुमसे मनता चौथ है, तुम करवा त्योहार।

जग को तुम आशीष दो, मिले सभी को प्यार।।4


व्यथित हुई है चाँदनी, जाओ उसके पास।

क्यों छुपे अमा की रात में, क्यों करते परिहास।।5


जिस सूरज की रश्मियाँ, रखते अपने पास।

ग्रहण बने कृतघ्न तुम , देते हो संत्रास।।6


चन्द्र सलोने कृष्ण के, शायर के महबूब।

माँ की लोरी तुम बने, भाते सबको खूब।।7


बुढ़िया काते सूत जब, कट जाती है रात।

तन्हाई को बाँटकर, करते हो तुम बात।8


कहीं स्वप्न के पृष्ठ हो, कहीं किसी के राज।

गुड़िया के मामा बने, प्यारा हर अंदाज।।9

....ऋता शेखर

स्वप्न

तुम जब तक दूर हो

आँखों का नूर हो

तुम्हारे पूरा होते ही

तुम हकीकत हो जाओगे

तब फिर से उगेगा एक स्वप्न

फिर से परियों को पँख मिलेंगे

फिर से एक सफर का आगाज होगा

तब हकीकत बन गए स्वप्न तुम

सम्भाल लेना वह कहानी

जिसमें बिता दी हमने ज़िन्दगानी।

कल्पना का घोड़ा 

सपनों के तांगे में बैठ

गया है चाँद के पास

नटखट चाँदनी

झूला झुलाती हुई

उसे बहला रही ।

तारे भी आ गए 

सब हो गए हैं मगन 

स्वप्नों के आसपास

सब के नए स्वप्न हैं

सबका है नया आकाश।

*****

चाँद रोता है

धरती भी भीगती है

कभी भोर होते ही

हरे घास की कालीन पर

चलकर तो देखना

कभी 

हरसिंगार की पंखुड़ियों को

सहलाकर देखना

@ ऋता शेखर मधु


गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

नवरात्रि विशेष-पुरस्कार प्राप्त गीत- अम्बिके जगदम्बिके- गीतकार-ऋता शेखर-स्वर- रचना बजाज #ऋत...


सभी मित्रों को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ| 
मेरे इस गीत को फेसबुक के एक बड़े उत्कृष्ट समूह में दूसरा स्थान प्राप्त हुआ है|

एकल काव्य पाठ मंच का दशकोत्सव समारोह सम्पन्न -
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एकल काव्य-पाठ -एक साहित्यिक मंच द्वारा दस दिवसीय #दशकोत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित प्रतियोगिताओं के आदरणीय त्रिलोको मोहन पुरोहित जी ने परिणाम घोषित किये। फेसबुक समूह का 10 वर्ष पुराना समूह। संभवतः पहला समूह जो रचनाकारों को प्रोत्साहित करने हेतु नगद पुरुस्कार देता रहा है।
प्रथम पुरस्कार-1100 रुपये।
द्वितीय पुरस्कार- 501 रुपये।
तृतीय पुरस्कार- 500 रुपये।
साथ ही प्रमाण/प्रशस्ति पत्र । -
1.#गीत/ग़ज़ल प्रतियोगिता के अंतिम परिणाम -
निर्णायक आदरणीय त्रिलोकी मोहन पुरोहित जी, आदरणीया आदर्शिनी श्रीवास्तव जी, और सुरेन्द्र नवल जी । -
1. लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला जी
2. ऋता शेखर मधु जी
3. रमा प्रवीर वर्मा जी






शनिवार, 19 सितंबर 2020

छन्न पकैया

छन्न पकैया

छन्न पकैया छन्न पकैया, बिटिया घर का गहना।
लगती है गुड़िया सी प्यारी, भाई का है कहना।।१

छन्न पकैया छन्न पकैया, खूब खिले गुलमोहर।
कान्हा जी के आ जाने से, गूँज उठा है सोहर।।२

छन्न पकैया छन्न पकैया, कोई नहीं भतीजा।
बुरे काम का सदा रहेगा,जग में बुरा नतीजा।।३

छन्न पकैया छन्न पकैया, जागी जनता सारी |
चंचल जिद्दी कोरोना पर, मास्क पड़ा है भारी ।।4

छन्न पकैया छन्न पकैया , सूई में है धागा |
देख पुलिस का मोटा डंडा, चोर निकल के भागा || ५

छन्न पकैया छन्न पकैया, देखी सारी दुनिया |
सब पर भारी पड़ती है, पढ़ती लिखती मुनिया ||६

छन्न पकैया छन्न पकैया, सच हरदम है जीता |
उसके घट मे भरा है अमृत, घड़ा झूठ का रीता ||७

छन्न पकैया छन्न पकैया, हाथी हो या पेंग्विन |
बोलो कैसे बच पाओगे, किया कभी हो जब 'सिन'||८

छन्न पकैया छन्न पकैया, कौन बजाए बाजा |
चूहों की नगरी इटली में, नीरो फिर से आजा|| ९

छन्न पकैया छन्न पकैया, सुन लो नई कहानी|
आई कंगना के वेश में, फिर झाँसी की रानी ||१०

छन्न पकैया छन्न पकैया, प्यारी लगती पोती|
दादी बचपन जी लेती जब, वह गोदी में सोती ||११
--ऋता शेखर

शुक्रवार, 19 जून 2020

ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है-गीत


Air Definition in Science

खुशबुओं की पालकी से शुभ्रता को पा रही है।
पुष्प का उपहार पाकर तू बहुत इतरा रही है।
ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है।।


चाहते जिसको सभी वह रूप तेरा है बसंती,
झूमती हर इक कली का है बना अनुबंध तुझसे।
डालियाँ घूमीं उधर जाने लगी तू जिस दिशा में,
मंद शीतल जब हुई तू है बना संबंध तुझसे ।


प्रेम से सुरभित बनी तू प्रेम ही दिखला रही है|
पुष्प का उपहार पाकर तू बहुत इतरा रही है।
ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है।।


गर्म दिनकर जब हुए तू क्यों अचानक बौखलाई ,
ताप की आँधी चली तो जंग सी छिड़ने लगी क्यों?
चाल पर से खो नियंत्रण नाचती बनके बवंडर ,
हर दिमागी सोच से फिर भावना भिड़ने लगी क्यों?

रेत पर तू बावरी बन किस पिया को पा रही है|
पुष्प का उपहार पाकर तू बहुत इतरा रही है।
ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है।।

जो धुआँ लेकर चली है नफ़रतों से है भरी वह,
छोड़कर हर कालिमा तू बादलों को ला धरा पर|
तू न होगी तो जगत सुनसान मरघट ही बनेगा,
बुझ चुकी जो लौ दिलों में फूँक कर उनको हरा कर||

शुभ हवन की अग्नियों से साधना महका रही है|
पुष्प का उपहार पाकर तू बहुत इतरा रही है।
ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है।।


पतझरों में ढेर लगती सरसराती पत्तियों की,
कर रही हैं शोर देखो दर्द से भीगी शिराएँ|
मित्र बनकर ऐ पवन बस थाम ले उनके बदन को,
बैठकर कुछ देर सुन ले ठूँठ से उनकी व्यथाएँ||

तू सहेली सी बनी है वेदना सहला रही है|
पुष्प का उपहार पाकर तू बहुत इतरा रही है।
ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है।।

@ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 18 जून 2020

हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो-गीत


Meri Maa Ambe Meri Jagdambe - Posts | Facebook
(हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।)


हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
आद्या जया दुर्गा स्वरूपा, शक्ति का आधार हो।
*
शिव की प्रिया नारायणी, हे!, ताप हर कात्यायिनी।
तम की घनेरी रैन बीते, मात बन वरदायिनी।।।
भव में भरे हैं आततायी, शूल तुम धारण करो।
हुंकार भर कर चण्डिके तुम, ओम उच्चारण करो।
*
त्रय वेद तेरी तीन आखें, भगवती अवतार हो।
हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
*
कल्याणकारी दिव्य देवी, तुम सुखों का मूल हो।
भुवनेश्वरी आनंद रूपा, पद्म का तुम फूल हो।
भवमोचनी भाव्या भवानी, देवमाता शाम्भवी।
ले लो शरण में मात ब्राह्मी, एककन्या वैष्णवी।।
*
काली क्षमा स्वाहा स्वधा तुम, देव तारणहार हो।
हे अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
*
गिरिराज पुत्री पार्वती जब, रूप नव धर आ रही।
थाली सजे हैं धूप चंदन, शंख ध्वनि नभ छा रही।|
देना हमें आशीष माता, काम सबके आ सकें।
तेरे चरण की वंदना में, हम परम सुख पा सकें।।
*
दे दो कृपा हे माँ जयंती, यह सुखी संसार हो|
हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।
*
मौलिक , स्वरचित
ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 14 जून 2020

गीतिका -वाचिक भुजंगी

 
Give and Take: a journey of self-awareness towards building better ...

छंद- शक्ति /वाचिक भुजंगी 122 122 122 12
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जिसे चाहिये जो दिया है सदा
मिला है हमें जो लिया है सदा

न रखते शिकायत न शिकवा कभी
सुधा संग विष भी पिया है सदा

लुभाते नहीं रूप दौलत कभी
हृदय से गुणों को जिया है सदा

समेकित हुआ नाद ओंकार में
भ्रमर योग हमने किया है सदा

दिखे पाँव चादर से बाहर कभी
बिना मन बुझाए सिया है सदा

ऋता शेखर 'मधु'




पदांत- है सदा
समांत- इया

शुक्रवार, 12 जून 2020

माँ शारदे ! घर में पधारो-गीत


आरती ॐ जय सरस्वती माता - Saraswati Mata Aarti | Hindupath

ऋतुराज की आहट हुई है, माघ का विस्तार है|
माँ शारदे ! घर में पधारो, पंचमी त्योहार है||१||
*
है राह भीषण ज़िन्दगी की, पग कहाँ पर हम धरें|
मझधार में नौका फँसी है, पार कैसे हम करें ||
तूफ़ान में पर्वत बनें हम, शक्ति इतनी दो हमें |
बन कर चरण-सेवी रहें हम, भक्ति भी दे दो हमें ||
*
देवी ! हमारी वंदना में, पुष्प का गलहार है |
माँ शारदे ! घर में पधारो, पंचमी त्योहार है||२||
*
जब राग सारे टूटते हों, या सघन अवरोध हो |
दे दो हमें वरदान जिससे, आत्मबल का बोध हो ||
हम हैं अधूरे बिन तुम्हारे, यह हमें अनुबोध है |
गंगा बहाओ ज्ञान की तुम, यह सरल अनुरोध है||
*
फैला तिमिर चहुँ ओर है माँ, दृष्टि की मनुहार है|
माँ शारदे ! घर में पधारो, पंचमी त्योहार है||३
*
माँ ! दूर कर दो भाव सारे, जो जगत को पीर दे|
 उस ज्ञान-रथ के सारथी हों, जो विकल को धीर दे|
इस आस में दर पर खड़े हम, कर रहे अनुराधना |
माता करो उपकार हमपर, पूर्ण कर दो साधना ||
*
सद्भाव ही तो इस जगत में, प्रेम का आधार है|
माँ शारदे ! घर में पधारो, पंचमी त्योहार है||४
*
संदेश अपना शांति का हो, दो हमें यह भावना |
भारत वतन में हर जगह हो, प्रीत की सद्भावना ||
साकार हों सपने सभी के, हो न तम से सामना |
आसक्त विद्या में रहें हम, बस यही है कामना ||
*
जब तुम करो हम पर कृपा तो, स्वप्न भी साकार है|
माँ शारदे ! घर में पधारो, पंचमी त्योहार है||५

शनिवार, 6 जून 2020

कोरोना पर कविता

गीतिका ...समसामयिक
Corona Viral Test Negative - राहत देने वाली खबर ...
मोह बढ़े जब-जब धन से तब, ईश्वर ही सिखलायेगा |
अपना घर अपना रिश्ता ही, काम हमेशा आयेगा ||१||

जन्मभूमि से अपनापन ही, गाँव सभी को ले आया |
‘कोविड के कारण लौटे थे’, इतिहास यही बतलायेगा||२||

अपनी छत अपनी होती है, चाहे होते छेद कई|
यही बात समझाने को तो, नभ में नीरद छायेगा ||३||

मजदूरों को भूख लगी तब, मालिक ने ठुकराया है | 
प्रेम भरा आँचल जननी का, आँगन यह समझायेगा ||४||

जो लौटें उनका स्वागत हो, रीत पुरानी यही रही |
नवयुग में क्या करना होगा, कोरोना कह जायेगा ||५||

सारा दिन सारी ही रातें, चल चल कर बेहाल हुआ |
क्वारंटीन बना घर में क्या, कटकर वह रह पायेगा |६||

छेड़छाड़ की अति होती जब, सृष्टि स्वयं रक्षित होती |
कभी बाढ़ भूकंप कभी ये, कोरोना कहलायेगा ||७|| 

सामाजिक दूरी का पालन, मुँह ढककर करना है|
जो चूके यह सब करने में, कोरोना फैलायेगा ||८||

@ऋता शेखर ‘मधु’


छंद विधान.....
आधार छंद- लावणी (मापनीमुक्त मात्रिक)
विधान- 30 मात्रा, 16,14 पर यति, अंत वाचिक गा
अपदान्त , समान्त – आयेगा

शुक्रवार, 5 जून 2020

रागिनी में राग की झंकार को देखो - गीतिका

दुनिया के 7 अनोखे फूल जो आपको हैरान ...
गीतिका
आधार छन्द - रजनी (मापनीयुक्त मात्रिक)
मापनी - गालगागा गालगागा गालगागा गा
2122   2122   2122 2
समान्त - आर, पदान्त - को देखो

लिख रहे जो गीतिका उस सार को देखो
लेखनी से उठ रहे उद्गार को देखो

हो रहे हैं शब्द हर्षित भाव बहने लगे
हर्ष में छुपते हुए अंगार को देखो

झूमते हैं फूल पत्ते ज्यों पवन झूमी
छंद का सौन्दर्य मात्रा भार को देखो

जब लिखे हों मापनी में गीत के मुखड़े
रागिनी में राग की झंकार को देखो

राम जी की हो कथा या हो महाभारत
सोरठे के वर्ण में संसार को देखो

@ऋता शेख ‘मधु’