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शुक्रवार, 21 जून 2013

बारिश का मौसम सुहाना है


बारिश का मौसम सुहाना है
पावस ने छेड़ा तराना है

काँधे सजते झूलते काँवर
भजनों में शिव-गुण को गाना है

सुंदर पत्ते बेल के लाओ
शिवशंकर जी पर चढ़ाना है

सावन में चुनरी हरी लहरी
हाथों में लाली रचाना है

बच्चे पन्ने फाड़ते झटपट
धारा में किश्ती चलाना है

चूड़ी धानी सी खरीदे वे
परिणीता को जो लुभाना है

पानी है तालों तडागों में
मेढक को हलचल मचाना है

मंथर मंथर चल रही गंगा
तट पे शायद कारखाना है

पनपीं बेलें जात मज़हब की
सद्भावों के बीज पाना है


..........ऋता

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

रे मन, बरस जा...




ओ धरती
तुम बरसी
वह तपिश थी ग्रीष्म की
जिसे तुम सहती रही
सूरज दहका
दहकी तुम
नदी ताल पोखर सागर
सब साक्षी थे
कि तुम तपती रही
भाप बन उड़ती रही
अम्बर तेरा मन
विकलता की बूँद-बूँद
जाकर वहाँ थमती रही
उमड़- घुमड़
मचलती रही
बूँद थे अनगिन
भार असह्य होना ही था
आखिर तुम
बरस ही पड़ी
मन आकाश में बदरा
कब तलक टिक पाते
कभी फुहार
कभी मुसलाधार
सबने कहा
यह है
सावन-भादो की झड़ी

रे मन
उमड़ घुमड़ कर
कुछ न पाएगा
बरस जाने दे
नयनों के रास्ते
सावन...भादो
फिर जो ठंढक मिलेगी
उस राहत
उस सुकून का
कहना ही क्या...!!!

ऋता शेखर मधु

मंगलवार, 26 जून 2012

चपल दामिनी हँस पड़ी, बादल करता शोर...दोहा छंद



बूँद-बूँद तरसी धरा, ताक रही आकाश|
मेघ, अब आओ जरा, मिलने की है आस|१|

मतवाले बादल चले, घोड़े-सी है चाल|
हौले मस्त हवा चली, झूमे तरु के डाल|२|

घटा घनघोर छा रही, नाच रहा है मोर|
चपल दामिनी हँस पड़ी, बादल करता शोर|३|

घन-घन करके गरजता, इन्द्रदेव का दूत|
माँ के आँचल जा छुपा, उसका डरा सपूत|४|

प्रचण्ड-वेग हवा बहे, झुकते ताड़-खजूर|
धूल-भरी हैं आँधियाँ, उड़े फूस-छत दूर|५|

बादलों से गगन ढका, है बारिश की थाप|
भोर निशा-सी लग रही, सूरज है चुपचाप|६|

टिप-टिप बरसा नीर जब, खुशबू सोंधी उड़ी|
तन-मन ज्यूँ पुलकित हुए, लगी नाचने कुड़ी|७|
[खुशबू सोंधी उड़ रही, टप टप बरसा नीर
तन मन पुलकित हो गए, चलो ताल के तीर|] 

बारिश की धारा बही, छप-छप करते पाँव|
कतारों में हैं सजते, कागज के सब नाव|८|

मुसलाधार बारिश में, सजा राग मल्हार|
पकौड़ियाँ छनने लगीं, छाई हँसी-बहार|९|

नदी- ताल- पोखर भरे, बारिशों का कमाल|
टर-टर से गूँजा शहर, मेढकों का धमाल|१०|

बूदें नभ में टँग गईं, करतीं परावर्तन|
सातों रंग छिटक पड़े, इन्द्रधनु दे दर्शन|११|

मेंहदी लगी हाथ में , मुखड़ा होता लाल|
मंद- मधुर मुस्कान से, सखियाँ करें सवाल|१२|

ऋता शेखर मधु