''माँ'' - रोला छंद में
माँ, जब छूटी आस, सामने तुझको पाया
आँचल सर पे डाल,मुझे दी शीतल छाया
आई घनेरी रात, बनी तू सम्बल मेरा
थाम लिया जब सूर्य, हँसा था खूब सवेरा|
सुमधुर तेरा हास, सरल थीं तेरी बातें
सोती तेरी गोद, चैन से कटती रातें
पाकर तुझसे धीर, हिमालय मैं बन जाती
काश कि तुझसे सीख,हलाहल मैं पी पाती|
माँ, आती तू याद, जाग मैं लोरी गाती
छूए मंद बयार, लगे तू ही सहलाती
पाया जो संस्कार, वही डाला झोली में
बस इतनी सी चाह,टपके प्यार बोली में|
ऋता शेखर 'मधु'
''माँ'' - हाइकु में
माँ, तेरी सीख,
मेरी मुट्ठी में बंद,
खोने न देती|
तपती धूप,
हाथ थे पाँव तले,
आँचल- छाया|
सुख-दुख में,
जब जी घबराया,
तुम्हें ही पाया|
ऋता शेखर 'मधु'
''माँ'' - हाइकु में
माँ, तेरी सीख,
मेरी मुट्ठी में बंद,
खोने न देती|
तपती धूप,
हाथ थे पाँव तले,
आँचल- छाया|
सुख-दुख में,
जब जी घबराया,
तुम्हें ही पाया|
ऋता शेखर 'मधु'