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रविवार, 25 दिसंबर 2022

यात्रा

यात्रा-

यात्रा के हैं अनगिन रूप
कभी छाँव मिले कभी धूप
प्रथम यात्रा परलोक से
इहलोक की
नौ महीने की विकट यात्रा
बन्द कूप में सिमटी हुई यात्रा
जग से जुड़ता जब नाता
भोर से सायं तक
पृथ्वी की यात्रा
गंगोत्री से खाड़ी तक
गंगा की यात्रा
बचपन से बुढ़ापा तक
देह की यात्रा
कभी पैदल यात्रा
कभी पटरी पर चलती
रेल की यात्रा
नभ में बादलों के बीच
यान की यात्रा
सागर में
डूबती उतराती यात्रा
कभी दैनिक यात्रा
या फिर साप्ताहिक
मासिक या वार्षिक
समय की पाबंदी पर
बस यात्रा ही यात्रा
क्योंकि करनी है
मुख से पेट तक
भोजन को यात्रा
हर यात्रा में करनी होती तैयारी
बस चूक हो जाती है
अंतिम यात्रा की तैयारी में
जाने कितना कुछ
छोड़ जाते हैं ऐसा
जिसे स्वयं ठिकाने लगाना था
पर अपनी देह को ठिकाने
कोई न लगा सकता
हर आत्मनिर्भर होकर भी
बेबस है
परावलम्बन होना ही है
फिर घमंड किस बात का
इस यात्रा का टिकट तो है
बस तिथि का नहीं पता।
कैसे किस विधि जाना है
रीति का पता नहीं
– ऋता शेखर मधु

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

माँ की माँ

 एक  माँ

जो बन चुकी होती है

माँ की भी माँ

मतलब

माँ बन चुकी बहू बेटी की माँ

जी लेती है 

अपने बच्चों का बचपन

अक्सर मिलाती है 

उस समय को इस समय से

जब आज की माएँ

कड़ी आवाज में भी

बच्चों को कुछ नहीं कहतीं

उसे याद आता है

अपना उठा हुआ हाथ

जो उठते थे देर तक सोने के लिए

समय पर पढ़ाई के लिए नहीं बैठने पर

जब वह देखती है 

नाती पोतों के नखरे 

उसे याद आती है

दूध रोटी

या लौकी पालक

जिसे खिलाकर ही छोड़ती थी

जब वह देखती है

बस एक डिमांड पर

नई कॉपी 

नए जिओमेट्री बॉक्स आते

उसे याद आता है

एक ही किताब को सम्भालना

जो काम आते थे छोटे को

दो या चार बार पहने गए

बच्चों के नए कपड़े

जब किनारे धर देती हैं बेटियाँ

तब माँ की माँ याद करती है

होली के कपड़े

दशहरे तक चलते हुए

पैसे तब भी थे

किन्तु साथ ही होते थे 

संयुक्त परिवार

नए बनाने हों तो

सभी के बनेंगे

यह अवधारणा जोड़ती थी

रिश्तों को, परिवार को

वह माँ की माँ

आंखों पर हाथ धरे आज भी

जाने क्या क्या ढूँढती है

उसके अनुभव

या तो हँसकर टाल दिए जाते

या शिकार हो जाते उपेक्षा के

वह माँ की माँ

आज भी समझौते कर लेती है

नए जमाने की माँ से

लेती नहीं है पंगा

उसकी हाँ में हाँ मिलाती

चुपके से देती है अपने सुझाव

बाद में जब मिलती है शाबासी

वह देती है एक सहज मुस्कान

मन ही मन बोलती हुई

ओल्ड इज गोल्ड बेटा 😊

ऋता.....

रविवार, 1 अप्रैल 2018

धुंध

4
धुंध
नींद खुली
नव रश्मियाँ
भोर का सौंदर्य
कलरव
प्रकृति का माधुर्य
खिड़कियाँ
आज भी खोलीं
बाहर झांकते हुए
स्पष्ट नहीं था कुछ
धुंध छायी थी।
उज्ज्वल रास्तों के लिए
करना होगा वक्त का इंतेज़ार
धूप गहराएगी
तभी दिखेंगे
दूब और फूल
कि सब कुछ
हमारे वश में नहीं होता
करना ही होता है
समय का इंतेज़ार
मन में छाए धुंध को
छंट जाने का।
-ऋता
5
समानता
*
समान चेहरा फिर भी अलग
समान दिनचर्या होते अलग
समान समस्याएं निदान अलग
समान सोच अभिव्यक्ति अलग
समान जीवन क्रम उम्र अलग
सूर्य वही दिवस विस्तार अलग
चाँद वही रूप अलग

समानता में अलगाव
फिर क्यों हम चाहते
सामने वाले का निदान
वही हो
जैसा हमने किया
वह वैसे ही जीये
जैसे हमने जीया
समझो कभी उनके मन को
जिंदगी और मौत समान
जीने की कला अलग अलग
मरने के रास्ते अलग अलग।
-ऋता

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

कोमल पत्ते

2
जिजीविषा
मन की धरती
जब होने लगे पठार
संवेदनाएँ तोड़ने लगें दम
उत्साह डूबने लगे
निराशा के समंदर में
आसपास के सूखे पत्ते
मन में शोर करने लगें
मधुर वाणी भी
कानों को बेधने लगें
तब जाना उस पठार पर
जहाँ दरारों से झाँकती है
दो नन्हीं कोमल पत्तियाँ
तब लगता है
कहीं तो दबी है जड़
उसके अहसासों की
नमी को सहेजे हुए।
-ऋता
3
मौज
उम्मीदों की खूँटी पर
ना उम्मीदों के वस्त्र टांगकर
मौज करना चाहती हूँ
मैं हर सोच से परे जाना चाहती हूँ।
रुई के फाहों जैसे उड़ते
नादान स्वप्न की तितली
धूप में खड़े गुलमोहर पर
बैठती फिर उड़ जाती
एक मुट्ठी छाँव की तलाश में
आकाश को
बादलों से ढक देना चाहती हूँ।
हाँ, मैं मौज से जीना चाहती हूँ।
कलकल नदियाँ
शोर नहीं करतीं
बहती जाती निश्चित रिदम में
मन मे बहती नदियों को
बांध कर रिदम देना चाहती हूँ।
बस, मौज से जीना चाहती हूँ।
जिंदगी नाम है
संघर्ष त्याग और प्रेम का
यह पाठ लिखा किसने
किसके लिए लिखा
अब बदल देती हूँ परिभाषा
तुम सब कुछ रख लो
अपनी मौज मुझे दे दो।
सही समझे
मैं भी मौज से जीना चाहती हूँ।
मौसम के अपने जलवे
अपने राग होते हैं
जो इन्हें हू ब हू जी ले
बड़े भाग्य होते हैं
मैं हवा बन जाना चाहती हूँ
फूलों से खुशबू लेकर
कायनात में बिखरना चाहती हूँ।
हाँजी हाँ,
मैँ मौज से जीना चाहती हूँ।
-ऋता

बुधवार, 28 मार्च 2018

हैप्पी जर्नी

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हैप्पी जर्नी
--------------
जब भी कोई जाता है
सुदूर यात्रा पर
गाड़ी रेलगाड़ी
या हवाई जहाज से
दही खिलाकर बोलते
हैप्पी जर्नी

यह एक दुआ है
जो कवच बनने की
रखती है ताकत
एक विश्वास है
हादसों से परे
सुरक्षा का
यह संदेश है
उस परमपिता को
कि वापस भेजना होगा
परिजनों को सहेजना होगा।

जब उतर जाती है
पटरी से रेल
या लैंडिंग में
बिगड़ जाता है संतुलन
तब महसूस होता है
ईश्वर के अस्तित्व का
कुछ को मिलता जीवनदान
कुछ निकल जाते
अंतिम सफर को
और
हम कह नहीं पाते
हैप्पी जर्नी|

जिन्हें मिल जाता
जीवनदान
उनकी आस्था
पक्की हो जाती
तकदीर पर।

आखिर आदमी के पास
यदि कोई है चमत्कार
तो वह है शुभकामनाओं का।
दिल से मिले
दिल से हो स्वीकार
परमात्मा सोचेंगे
हर हादसे के पहले
सौ बार
सौ सौ बार !
-ऋता

रविवार, 14 जनवरी 2018

बिसात जीवन की














देखो बंधु बाँधवों,
जिंदगी ने बिछायी है
बिसात शतरंज की
बिखरायी है उसने
मोहरें भाव-पुंज की
श्वेत-श्याम खानों के संग
दिख जाते सुख-दुःख के रंग
प्यादे बनते सोच हमारी
सीधी राह पर चलते हुए
सरल मना को किश्ती प्यारी
तीव्र चतुर दलबदलू ही
करते हैं घोड़ों की सवारी
व्यंग्य वाण में माहिर की
तिरछी चाल विशप कटारी
समयानुकूल वजीर बने जो
चाणक्य नीति के वो पिटारी
सबकी चालें सहता हुआ
बादशाह है हृदय बेचारा
नाप रहा उल्फ़त से पग
कैसे  विजय मिले दोबारा
विषयासक्त अनुरागी को
यह टकराव बना रहेगा
कुछ भी कर लो जेहनवालों
अज्ञानी से ठना रहेगा
पूर्वाग्रह के पिंजरे में बैठे
अजनबी  क्षितिज पर दिखते
हल्की सी भी ठेस लगे तो
यातना के नज़्म लिखते
ऐ जिंदगी,
छलिया बन तूने
हम सबको है नाच नचाया
बाँध के धागे भाव पगे
तूने सबसे रास रचाया
पर समझ लेना यह बात
मात हमें न दे पाएगी
मनु के अंतर्मन की शक्ति
तेरा हर घात सह जाएगी|
चालें चाहे हों जितनी शतरंजी
बस एक निवेदन करती हूँ
उनकी खुशियाँ खोने न देना
जिन रिश्तों पर मरती हूँ|
-ऋता शेखर ‘मधु’

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

स्वप्नलोक


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स्वप्नलोक....


बचपन का वह स्वप्नलोक अब विस्मृत होता जाता है
जलपरियाँ जादुई समंदर सन्नाटे में खोता जाता है

सीप वहाँ थे रंग बिरंगे मीन का नटखट खेल था
सजा सजीला राज भवन जहाँ तिलस्म का मेल था

सजा सजीला एक कुँवर बेमिसाल इक राजकुमारी
प्रीत कँवल खिलते चुपके से छाती दोनो पर खुमारी

हस्तक दे दे हँसते थे वो इक दूजे की करें प्रतिष्ठा
प्रेम भरी आँखों में, दिखती रहती सच्ची निष्ठा

दूर कहीं से देखा करता सींगों वाला दैत्य भयानक
अशांति का दूत बड़ा वह बन जाता था खलनायक

एक दिवस ऐसा भी आया विपत्ति बन वह मँडराया
शहजादा बनकर आया और परी कुमारी को भरमाया

पल भर बीते तभी वहाँ पर राजकुमार की आई सवारी
विस्मित रह गई भोली परियाँ, थी अवाक वह राजकुमारी
*
ओह, जुदा होकर कैसे जीएँगे, नींद में वह धीरे से बोली
कौन जुदा होता है मुनिया, पूछी रही सखियों की टोली

झट उठ बैठी बिस्तर पर, अपनी बोझिल पलकें खोली
रब ऐसे सपने न देना जिसमें कोई, किसी की तोड़े डोली

इस प्रलाप से जन्म ले रही थी, कहीं पर एक कहानी
जब पुरातन वह हो जाएगी, इसे कहेगी बनकर नानी

ऋता शेखर ‘मधु’

सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

छंदमुक्त- मैं गुलाब


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छंदमुक्त...
शाख से टूटा हूँ तो क्या
मेरा हुनर मेरे पास है
मेरे खुश्बुओं की तिजोरी
सूख कर भी महकती रहेगी
मैं काँटों से न घबराया कभी
न धूप में कुम्हलाया कभी
गुलदस्तों में सजता रहा
अर्थियों पर गिरता रहा
प्रेमियों की अभिव्यक्ति बना
जीवन दर्शन की युक्ति बना
मैं आभारी हूँ सृष्टि का
समग्रता के मिसाल में
खुश हूँ हर हाल में
यूँ तोड़कर मुझे
इतना न इतराओ
ओ पवन सुहानी!
तुम लेकर मेरी खुश्बू
वहाँ बिखरा देना
जहाँ होगा कोई बालक
रूठा रूठा सा
जहाँ होगी ममता
सिसकी सिसकी सी
तो जनाब, मैं हूँ गुलाब
शाख से टूटा हूँ तो क्या
मेरा हुनर मेरे पास है|
-ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 18 जून 2017

प्रतिबिम्ब--कुछ भाव कुछ क्षणिकाएँ

बँधे हाथ

अपने वतन के वास्ते
गुलमोहर सा प्यार तुम्हारा
अनुशासन के कदम ताल पर
केसरिया श्रृंगार तुम्हारा
 

पत्थर बाजों की बस्ती में
जीना है दुश्वार तुम्हारा
चोट सहो तुम सीने पर
पर कचनारी हो वार तुम्हारा

हा! कैसा है सन्देश देश का
चुप रहकर शोले पी लेना
उन आतंकी की खातिर तुम
अपमानित होकर जी लेना।

अच्छी नहीं सहिष्णुता इतनी भी
रामलला को याद करो
कोमल मन की बगिया में
कंटक वन आबाद करो
-ऋता
============================

बुद्धत्व

मंजिल पर शून्य है
रे मन, सफ़र में ही रहा कर

संसार में
रोग क्यों है
शोक क्यों है
बुढ़ापा क्यों है
मृत्यु क्यों है
इस शाश्वत सत्य की खोज में
सिद्धार्थ को बुद्धत्व प्राप्त हुआ।
क्यों है...इसका उत्तर सहज नहीं
और यदि ये सब है ही
तो सहज स्वीकार्यता ही
संसार में बुद्धत्व पाने का सरल मार्ग है
ये मार्ग सरल होते हुए भी सहज नहीं
जीवन में हर मनुष्य इनकी खोज में है
मन का बूद्ध हो जाना भी
शाश्वत सत्य है।
-ऋता

 ===================
प्रतिबिम्ब
 
सागर भी है
तलैया भी
गगन का प्रतिबिम्ब
दोनों में समाया
अशांत लहरो में
गगन भी अशांत सा
तलैये के मौन में
महफूज़ चाँद सितारे
-ऋता
====================

एक सवाल

मनु,
तू कौन है, क्या है?
एक आकार
एक आत्मा
एक भाव
एक सोच
एक मन
एक यात्री
एक रास्ता
एक मंजिल
एक नागरिक
एक धर्म
एक मानवता
एक मोह
एक त्याग
एक अभिलाषा
एक लिप्सा
एक क्रोध
एक भाषा
एक जनक
एक सार
एक तत्व
एक प्रेम
एक विरह
एक भोग
एक विलास
एक क्रिया
एक प्रक्रिया
एक प्रशंसा
एक आलोचना
एक सत्यवादी
एक चापलूस
एक वक्ता
एक श्रोता
एक अभिव्यक्ति
एक पीर
एक हास्य
एक गंभीर

मनु: सुन ले
तू एक व्यक्तित्व हूँ
उपरोक्त सारे गुणों से लबरेज
प्रभु की अनुपम कृति है।

=========================

उम्मीदें

उम्मीदें तो बीज हैं
उनकी अवस्था
सुसुप्त नहीं होती
बार बार अंकुरण
बार बार आघात
फिर भी कोंपल
झाँकने को आतुर
मुरझाने का सिलसिला
जाने कब तक चले
अंकुरण की प्रक्रिया
जारी रहती है
अनवरत
===========================


 ये जरूरी नहीं कि हमारे शुभचिंतक सिर्फ हमारे अपने रिश्तेदार या मित्र ही हों...कई शुभचिंतक वो भी होते है जो राह चलते मिल जाते है...
जैसे जब आप ट्रेन में हो और गंतव्य के पास से गाडी धीरे धीरे गुजर रही हो तब उतरने की चेष्टा करते हुए किसी का टोक देना...
जब फ्लाइट में थोड़े हेवी सामन के साथ आप अकेले हों तब किसी का हाथ बढाकर आपका बैग उतार देना...
जब आप बेध्यानी में पटरी क्रॉस करके प्लेटफॉर्म पर आते हुए उधर से आ रही ट्रेन न देख पाएं हो तो पब्लिक का एक साथ चिल्ला देना...
जब आधे किलोमीटर की दूरी तय करवाकर ऑटो वाले का पैसा न लेना...
और भी बहुत कुछ जो याद रह जाता है और उन अजनबियों को मन बार बार धन्यवाद के साथ दुआएँ भी देता है। यदि आप किसी की मदद के लिए हाथ बढ़ाते है तो बदले में बहुत कुछ अर्जित कर लेते है।

आज उन सभी को धन्यवाद।

 


बुधवार, 26 अप्रैल 2017

छंदमुक्त



1.पाने को किनारा

फैसला था
मझधार में जाने का
डुबकियाँ लगती रहीं
सीप की मोतियाँ मिलीं
अब किनारे की चाह
चाह न रही
ज्ञान की तली ने
ठहराव जो दिया
मिटने लगी थीं
अपेक्षाएँ
जगने लगी पिपासा
परमात्मा में लीन होने की

2. दुःख के पके पत्ते

दुःख के पके पत्ते गिरे
मन की संधियों से झाँकने लगीं
कोंपलें सुख की
वह तूफ़ान
जो ले गया दूर
जीवन के विक्षत पन्ने
उसी से बने दलदल में
एक सुबह फूले आशाओं के कँवल
चाँद भी लौटा अमा से जीतकर
मन के आकाश में
कुछ ही पल के तो रहे जीवन के सूर्य ग्रहण
मुश्किल वक़्त ने ही मुझे दिए
करुणा के स्वर
और कर्म निश्छल
दुःख की कुदाल से ही हटे
जीवन की जमीन के जिद्दी अधिग्रहण.

3.दरीचे

बीती बातों के खंडहर में
जाने अनजाने क्यों घूमना
भविष्य के दरीचे से
जरा झाँक कर देख लो
सुवासित उपवन है

4.जादू की छड़ी
आने दो
मन के बसंत पर
व्यथा का पतझर
तभी मिलेंगे
खुशियों के किसलय
अँखियों में
घनघोर बदरिया
छाने दो
पल की परी
जादूई बड़ी
एक बार क्षण भर को
मुस्कानों वाली
छड़ी परी से
पाने दो

5.गुलमोहर
गुलमोहर सी जिंदगी
वीरता के नारंगी साफे में
जीत लेती है
अग्नि मिसाइल छोड़ते हुए
शत्रु धूप को
ख्वाब के पुष्प से
सज जाता आसमान
गुलमोहर
सिर्फ कवि की कविता नहीं
डायरी है साहस की
जिसने पंखुरियों के पन्ने पर
उकेरे हैं
मानव जीवन
6.बदलाव

बचपन की चटाई पर
बिखरे बिखरे खेल
गुड़ियों का घर
रसोई में पकते
झूठमूठ के चावल
और झूठमूठ से
चटखारे ले ले कर
खाती हुई माँ
कि
सच में अब
प्रोत्साहित करने को
माँ नहीं होती
कि
लैपटॉप में रमी
गुड़िया खेलने वाली
बेटियाँ नहीं होतीं

7.सतोलिया

चटपटी चाट सी चटपटी यादें
मन के मैदान पर
सतोलिया सजाती हुई
उस अल्हड़ किशोरी की बाट देखती
जो खिलखिलाकर
गिरा देती
सारी गोटियाँ
और पुनः सजाने की धुन में
निरीह हो जाता
वह विश्वास
जो उसकी सम्पदा थी।

8.मेरी बात

मैं अच्छी हूँ
तुमने कहा
समाज ने माना

मैं बुरी हूँ
तुमने कहा
समाज ने माना

मैं अच्छी ही हूँ
यह मैं कहती हूँ
समाज को मानना होगा
और तुम्हे भी

समाज में मेरा अस्तित्व
मेरी इज्जत
सिर्फ मेरे कर्मों से है
तुम्हारे वचन ने नहीं


9.बँधे हाथ

अपने वतन के वास्ते
गुलमोहर सा प्यार तुम्हारा
अनुशासन के कदम ताल पर
केसरिया श्रृंगार तुम्हारा


पत्थर बाजों की बस्ती में
जीना है दुश्वार तुम्हारा
चोट सहो तुम सीने पर
पर कचनारी हो वार तुम्हारा

हा! कैसा है सन्देश देश का
चुप रहकर शोले पी लेना
उन आतंकी की खातिर तुम
अपमानित होकर जी लेना।

अच्छी नहीं सहिष्णुता इतनी भी
रामलला को याद करो
कोमल मन की बगिया में
कंटक वन आबाद करो
-ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 31 मार्च 2016

रूह मरती नहीं

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रूह से देह तक
देह से रूह तक
अनजान सफर में
कितने ही रहे होंगे
अनुभूतियों के आकाश

अनन्त यात्रा रूह की
देह पाने के लिए
दुर्गम यात्रा देह की
रूह से बिछड़ जाने के लिए
सुना है परमात्मा के चारो ओर
बिखरा है उज्जवल दिप प्रकाश
वहाँ आनन्द की अद्भुत अनुभूति है
रूह पृथक हो जाती है
उसी दिव्य को पाने के लिए
फिर क्यों छटपटाती
पुनः देह में बँध जाने के लिए

सुना है रूह मरती नहीं
बदल देती है देह
देह के पिंजर में
क्यों कैद होती है रूह
बार-बार बारम्बार

रूह की अनन्त प्यास
जज्बातों को समझे जाने की
छल और देह से परे 
सिर्फ और सिर्फ
प्रेम सम्मान पाने की
अमिट प्यास की खातिर
वह आती रहेगी बार-बार बारम्बार

*ऋता शेखर ‘मधु’*

मंगलवार, 23 जून 2015

कलम...

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वह नन्हा सा बालक
उन्मुक्त आकाश में 
उड़ान का स्वप्न लिए
चुनता था दूध की पन्नियाँ
बीनता था टूटी काँच
जमा करता बिसलरी की बोतलें
जब बोरे भर जाते
शान से कंधे पे उठा 
इस तरह से चलता
जैसे कोई खजाना हाथ लगा हो
बेच देता बीस रुपए किलो के भाव से
अपनी जमा की हुई दौलत
और सौंप देता माँ को ले जाकर

बहुत दिनों से देख रही थी
विद्यालय की खिड़की से परख रही थी
बीच बीच में कनखियों से
वह भी देख लेता मुझे
एक दिन इशारे से बुलाया
बेटे, तुम विद्यालय आया करो
मेरी माँ बीमार रहती है
पैसे नहीं ले जाऊँगा तो खाऊँगा क्या
समझाया उसे-
सरकारी विद्यालय में पैसे नहीं लगते
स्कूल के बाद अपना काम भी करना
चमक उठी उसकी आँखें
मुस्कुरा उठे उसके होंठ
मैंने थमा दिया उसे एक कलम
और वह मासूम उसे यूँ निहार रहा था
जैसे शिक्षा के हिंडोले पर सवार हो
जाएगा वह बादलों के पार 
भर लाएगा तारों से भरी थैली
जब उसकी माँ देखेगी
तब सफल हो जाएगी
उसकी शैक्षिक उड़ान
वह भी तो बन जाएगा
समाज की पहचान
*ऋता शेखर मधु*

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

तुम सृष्टि...


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तुम सृष्टि...

नम्रता से झुकती हुई
प्यार का सहारा लिए

मौली सी पावन
धरा से धैर्य लेकर
सतत बढ़ने का संदेश
अक्षर में मौलिमणि
ऊँ का तत्व लिए
वक्त की बंजारन
सौन्दर्य का दुलार लेकर
गुलमोहर जैसी जिजीविषा में
धरती पर
'मै' और 'आप' से परे
दुआओं के मनुहार में
तन्हा सागर की
आह और गम के साथ
अपार संवेदना और
मनुष्यता का
संतोष लिए
मानवता से जिओ|
खुशी के अवगुंठन में
विरह भी चमकेगा
और एक दिन तुम
जरूर कंचन बन
निखर उठोगे

ठूँठ का भ्रम
मन का स्वच्छंद गुंजन
आशा का मंतव्य समझ
रुहानी धड़कन में
लावणय से भरी
शरारत का स्पर्श
सच की ख्वाहिश से
मंजिल की ओर बढ़ती
हिमालय सी प्रखर
सदा वात्सल्य से पूरित
हमेशा प्रेममयी रहो
तुम सृष्टि
ऋता शेखर 'मधु''


फेसबुक पर आ० रश्मिप्रभा दी द्वारा एकत्रित शब्दों से रचित कविता...आभार रश्मि दी|

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

अभिवंचित...


अभिवंचित...

कुछ उनके दिल की सुनें
कुछ उनके मन को गुनें
त्रुटिपूर्ण तन मन से हम
चलकर कोई ख्वाब चुनें|

बन्द हैं दृगों के द्वार
स्याह है जिनका संसार
उनके अंतस-ज्योति में
संग चलें पग दो चार|

ब्रम्हा ने जिह्वा दी नहीं
दे देते पर नजर अपार
अभिव्यक्ति की अकुलाहट में
भर दें हम तो शब्द हजार|

भूलवश जो बधिर बने
देखें बोलें पर ना सुनें
इशारों ही इशारों में हम
अधरों पर हँसी भर दें|

किन्नर भी माँ की संतान
फिर क्यूँ ले आते मुस्कान
बोझिल मन को लें हम तोल
उनसे मीठे बोलें बोल|

बौनापन जो झेल रहे
उपहासों में खेल रहे
तन लघु मन के निर्मल
कभी उनसे न करना छल|

काया की अपूर्णता को
कभी समझना  अभिशाप
वामन अवतार ले विष्णु ने
गर्वित बलि को दिया संताप|

पीछे जो लौटे भूचक्र
वहाँ दिखेंगे अष्टावक्र
चारो वेदों के ज्ञाता रचते
गीता का अध्यात्म चक्र|

ईश्वर ने भरी जिनमे पूर्णता
क्यों भर जाती उनमे हीनता
नैन कद कंठ चक्षु के स्वामी
भाव भरे हैं मतलबी बेमानी

लम्बी काया सोच में बौने
नजर वाले करते औने पौने
पाई जिह्वा मीठा न बोलें
सुनने वाले मुँह न खोलें

ईश्वर जिनमें देते कमियाँ
भरते आत्मबल की कलियाँ
कभी देखकर मुँह न मोड़ो
दे कर प्रेम आशिष को जोड़ो
.........ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

वह प्यारी सी लड़की...

वह प्यारी सी लड़की...

वह प्यारी सी लड़की
भरना चाहती थी
आँचल में अपने
एक मुट्ठी आसमान
ब्रह्म से सांध्य निशा तक
पूर्व से पश्चिम दिशा तक
गगन का हर रंग
प्राची का हर छंद
इंद्रधनुषी ख्वाब
बटोर लाती आँचल में|

प्रात की मधुरिम बेला 
वेद ऋचा का गान लिए
पवित्र सी मुस्कान लिए
चकित देखती ध्रुवतारा
तोड़ लाती किरन एक
पिरो देती मुस्कुराकर
पंखुड़ियों पर बिखरे
कोमल शबनमी मोती
मखमली आँचल बनाती 
वह प्यारी सी लड़की|

भरी दोपहरी में
निज साया सिमटता
अपने ही आसपास
माँग लाती सूरज से
तपता सा लाल धागा
पिरो देती हुलसकर
दिव्य श्रम बिंदु
दिप दिप करता आँचल
देख देख इतराती
वह प्यारी सी लड़की|

शांत क्लांत साँझ नभ से
माँग लाती उधार
सुरमई सांतरी तार
टपक जाते स्निग्ध दृगों से
इंतेजार के मोती चार
मौन दर्द का साक्षी बन
मधुर मिलन नैनों में भर
झिलमिल झिलमिल
फैला लेती थी आँचल
वह प्यारी सी लड़की|

निशा की मूक बेला में
फलक से इकरार कर
चंदा से मनुहार कर
चट से तोड़ लाती
चाँदनी की ओढ़नी से
एक किरन रुपहली सी
टाँक कर तारे सितारे
अपने अम्बर आँचल पर
पुलकित हो जाती
वह प्यारी सी लड़की|

नव सृजन का प्रसव झेल
नींद के आगोश से निकल
नव प्रात की अँगड़ाई ले 
चहक जाती देखकर आँचल
अपरिमित विस्तार तले
गौरैया बुलबुल तितलियाँ
नन्हे छौने मृगों के
निर्भीक निडर सुरक्षित
उनकी नजरें उतारती
वह प्यारी सी लड़की|

अम्बर में फैले चार पहर|
कह जाते जीवन का सफर||
..............ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

सखी री..........

सखी री..........

भ्रमर ने गीत जब गाया
पपीहा प्रीत ले आया
शिखी के भी कदम थिरके
सखी री, फाग अब आया |
बजी जो धुन मनोहर सी
थिरक जाए यमुन जल भी
विकल हो गा रही राधा
सखी री मोहना आया|
कली चटखी गुलाबों की
जगे अरमान ख़्वाबों के
उड़ी खुशबू फ़िजाओं में
सखी ऋतुराज है आया|
गिरे थे शूल राहों में
खिले थे फूल बाहों में
ख़ता उसकी न तेरी थी
सखी बिखराव क्यूँ आया|
झुके से थे नयन उसके
रुके से थे कदम उसके
किया उसने इबादत भी
सखी री काम ना आया|
मिला जो वह बहारों में
लगा अपना हजारों में
जहाँ देखे वहाँ वो था
सखी ढूँढे नजारों में|
....ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

परिवर्तन


अपनी ही तपन
वह झेल न पाता
साँझ ढले 
सागर की गोद में 
धीरे से समाता
नहा धो कर 
नई ताजगी के साथ 
वह चाँद बन निकल आता
चाँदनी का दामन थाम
शुभ्र उज्जवल प्रभास से
जग को 
शीतल मुस्कान दे जाता
हाँ, साँझ ढलते ही 
वह प्रेमी  
प्रेमिका का 
उपमान बन
बच्चों का मामा बन जाता
तब वह रौद्र सूरज 
अपने दिल की मासूमियत 
माँ की लोरी में डाल
कितना भोला कितना प्यारा
कितना निश्छल कितना न्यारा
चन्द्रकिरन बन जाता|
हाँ, हमेशा कोई जल नहीं सकता
प्रचंड रूप में पल नहीं सकता
सूरज को चाँद बनना ही है
यही परिवर्तन है
यही सत्य है
यही शाश्वत है

...ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 24 जून 2014

बंधन में स्वतंत्रता

उड़ते परिंदे ने पूछा-
'अरी पतंग
उन्मुक्त गगन में
इधर उधर विचरती
तू बहुत खुश है न'
'हाँ, बहुत खुश हूँ'



'मगर तूने देखा
तेरे में जो डोर बँधी है
वह बाधक है
तेरी स्वच्छंंदता में
डोर ही तय करती है
तुम्हारी दिशा, गति
और उड़ान की ऊँचाई भी'

हौले से मुस्कुराई
फिर बोली पतंग
'वह डोर है मेरे संस्कारों की
उनमें चमकता है मेरा सिन्दूर
खनकती हैं मेरी चूड़ियाँ
चहकती हैं किलकारियाँ
और मैं चाहती हूँ
वह डोर इतनी मँझी रहे
इतनी अकाट्य रहे
कि उड़ती फिरूँ मैं निर्भीक'
.
परिंदे, तुम क्या जानो
बंधन में स्वतंत्रता का सुख
...ऋता
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