आखर-मोती बिखरें
मधुरिम भाव सजे
मन अम्बर-सा निखरे|१|
है जग की रीत यही
मीठी वाणी से
दिल में है प्रीत बही|२|
कुछ खर्च नहीं होता
मीठा बोल सदा
स्नेहिल रिश्ते बोता|३|
ओ बादल मतवाले
प्यासी है धरती
आ, उसको अपना ले|४|
किरणें रवि की आईं
खिलखिल करता दिन
कलियाँ भी मुसकाईं|५|
दो हाथ जुड़े रहते
बल और विनय का
हैं भाव सदा कहते|६|
अंक बराबर पाते
कर्म-गणित में तो
ना होते हैं नाते|७|
तितली उड़ती जाती
फूल भरी चुनरी
धरती की लहराती|८|
चाह रखो चलने की
हारेगी बाधा
राह मिले खिलने की|९|
ऋता शेखर ‘मधु’