ओ धरती
तुम बरसी
वह तपिश थी ग्रीष्म की
जिसे तुम सहती रही
सूरज दहका
दहकी तुम
नदी ताल पोखर सागर
सब साक्षी थे
कि तुम तपती रही
भाप बन उड़ती रही
अम्बर तेरा मन
विकलता की बूँद-बूँद
जाकर वहाँ थमती रही
उमड़- घुमड़
मचलती रही
बूँद थे अनगिन
भार असह्य होना ही था
आखिर तुम
बरस ही पड़ी
मन आकाश में बदरा
कब तलक टिक पाते
कभी फुहार
कभी मुसलाधार
सबने कहा
यह है
यह है
सावन-भादो की झड़ी
रे मन
उमड़ घुमड़ कर
कुछ न पाएगा
बरस जाने दे
नयनों के रास्ते
सावन...भादो
फिर जो ठंढक मिलेगी
उस राहत
उस सुकून का
कहना ही क्या...!!!
ऋता शेखर ‘मधु’