चाँदनी की बात
कल रात चाँदनी से
मुलाकात हो गई
कुछ उसने कहा
कुछ मैंने कहा
ढेरों बात हो गई|
कुछ उसने सुना
कुछ मैंने सुना
बातें साफ़ हो गईं|
वह भी तो छुप जाती
अमावस की रात में
फिर खिलखिलाती
पूनम के साथ में
ज़िन्दगी को चाँद समझो
खुद को समझो चाँदनी
तुम्हे भी छुपना होगा
गमों की काली रात में
फिर खिलखिलाना भी होगा
मिल बसंत के साथ में
यही चाँद की नियति है
यही जीवन का धूप-छाँव
फिर इससे क्या घबड़ाना
बस,समय के साथ चलते जाना|
ऋता शेखर ‘मधु’