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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

लघुकथा- हार की जीत



!! क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएँ !!
हार की जीत

दिसम्बर महीने की ठंढ थी| रजनी अपने घर के बाहर लान में बैठी धूप का आनन्द ले रही थी| तभी एक महिला अपनी दस वर्षीया पुत्री के साथ गेट पर खड़ी दिखी| महिला देखने में भले घर की लग रही थी| रजनी उठकर उसके पास गई और प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखा|
मैं बहुत मुसीबत में हूँ|महिला ने कहा|
क्या बात है,रजनी ने पूछा|
मैं पास के छोटे शहर से अपना इलाज करवाने यहाँ आई हूँ| मुझे माइग्रेन है| कभी-कभी मुझे यहाँ आकर दिखाना पड़ता है| मेरे साथ मेरी बच्ची है| मैं ने डाक्टर से दिखा लिया है| मेरा बटुआ किसी ने पार कर दिया है| मेरे पास घर लौटने के पैसे नहीं हैं| यदि आप घर लौटने के लिए गाड़ी का भाड़ा दे दें तो बहुत मेहरबानी होगी| मैं जब अगले महीने इलाज के लिए आऊँगी तो पैसे लौटा दूँगी|
यहाँ पर इतने सारे मकान हैं फिर आप मदद माँगने यहाँ ही क्यों आई हैं|रजनी ने जिज्ञासा प्रकट की|
क्योंकि मुझे आपके चेहरे पर धार्मिकता और दयालुता नज़र आई|
महिला का उत्तर सुन रजनी उसकी चापलूसी पर मन ही मन मुस्कुरा उठी|
वह घर के अन्दर गई और उसने अलमारी से तीन सौ रुपए निकाले| रजनी ने उस महिला को इस विश्वास पर पैसे दे दिए कि वह अगले महीने लौटा देगी|
     इस घटना को बीते दो साल हो चुके हैं| पैसे वापस नहीं आए| रजनी ने उस महिला की बातों और आँखों की सच्चाई पर विश्वास किया था , इसलिए आज भी उसे पैसे देने का पछतावा नहीं है|
आज जब भी वह इस घटना के बारे में सोचती है तो बचपन में पढ़ी  बाबा भारती और डाकू खड्गसिंह की कहानी को ‌याद करती है| इस कहानी में डाकू खड्गसिंह ने दीन-हीन याचक बनकर बाबा भारती का घोड़ा उड़ा लिया था| बाबा ने खड्गसिंह से विनती की थी कि वह इस बात को किसी से न बताए वरना लोग दीनों पर विश्वास करना छोड़ देंगे|

                                                     ऋता शेखर मधु