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शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

डमरू घनाक्षरी


डमरू घनाक्षरी - शृंगार रस

वर्णिक छंद- 8, 8, 8, 8 की एक पंक्ति

हर अठकल अमात्रिक - त्रिकल त्रिकल द्विकल से

चार समतुकांत पंक्तियाँ


अनत जगत यह, सरल सहज वह,

करत नयन नत, मदन भजन रत।1

कमल नयन लख, चरण शरण रख,

असत गरल हत, नमन करत शत।2

तपन सहन कर, हवन भवन धर,

धरम करम गत, फलत रमन तत।3

बरस सघन घन, हरष रतन मन।

बढ़त फसल सत, मगन सदन बत। 4

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द्वितीय छंद


चमक दमक कर, कनक कलश  भर,

चलत अचल हल, जनमत सिय थल।1

चहक चहक खग, नटत अयन मग,

चहल पहल ढल, मगन भवन तल।2

जनक नगर घर, लखन दरस कर,

हरष हँसत जल, नवल कँवल दल।3

सकल चयन कर, वरण रमण वर,

सरल सहज पल, झरत सरस फल।4

- ऋता शेखर

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

पतझर


मनहरण घनाक्षरी...
पत्र विहीन पेड़ की उजड़ी हुई डाल को
दया भाव से कभी भी मन में न आँकिए
यहीं पर के नीड़ में अवतरित पंख हैं
उड़ रहे परिंदों में किरन भी टाँकिए
इसने भी तो जिया है हरे पात फूल फल
आज अस्त मौन बीच चुपके से झाँकिये
फिर बसंत आएगा किसलय भी फूटेंगे
पतझर में भले ही रेत सूखे फाँकिये

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

आया बसंत



मनहरण घनाक्षरी में बसंत का स्वागत...
पीत पुष्प-हार में नख शिख श्रृंगार में, शीतल बयार में बासंती उल्लास है
कली-दल खुल रहे भँवरे मचल रहे, डाल डाल पात पात प्रेम का प्रभास है
खिल रहे पलाश से गगन लालिमा बढ़ी, अमराई की गंध में बौर का विन्यास है
दर्पण इतरा रहे सजनी के रूप पर, सखियों संग झूले में प्रीत गीत रास है
*ऋता*

मुक्तक

पीत सुमन-हार में नख शिख श्रृंगार में कचनारी बयार में बासंती उल्लास है
कली-दल खुल रहे भँवरे मचल रहे, कण कण पराग में प्रेम का प्रभास है
पलाश लालिमा गढ़े हरसिंगार वेणियाँ, कँगना पाजेब बने गेंदा गुलदावदी
दर्पण इतरा रहे सजनी के रूप पर, सखियों संग झूले में प्रीत गीत रास है
*ऋता शेखर 'मधु'*

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

क्यारी-क्यारी लहराई, डाली-डाली मुसकाई-घनाक्षरी छंद




क्यारी-क्यारी लहराई, डाली-डाली मुसकाई,
ऋतुराज के आने से, छटा बसंती छाई|

सुमन-सितारे टँके, प्रकृति-परिधान में,
किसलय कोंपलों ने, ले ली है अँगड़ाई|

चहचह से चहकी, उषा मधुरहासिनी,
मंद-मंद बयार से, कलियाँ लहराईं|

पुष्पराग उड़ चला, चँदोबा बन के टँगा,
गेहूँ के गोरे गालों पे, तितली मँडराई|१|



मतवाले भौंरे डोलें, कुसुमों के अधरों पे,
पुखराज-सी बगिया, झूम के इठलाई|

पीले गुलाल के संग, निखरे गेंदा के रंग,
वागीशा की वीणा गूँजी, रस-रागिनी गाई|

जनक-वाटिका सोहे, राम जानकी से मिले,
इस मधु-मौसम में, सीता थी हरषाई|

ऋतूनां कुसुमाकरः,गीता-वाणी श्रीकृष्ण की
प्रभु ने पार्थ को अपनी महता बताई|२|

ऋता शेखर मधु
ऋतूनां कुसुमाकरः(ऋतुओं में मैं बसंत हूँ|)