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मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

जली पतीली का दर्द



जली पतीली का दर्द

ये महिलाएँ भी न
पता नहीं
क्या समझती हैं खुद को,
कभी भी धैर्यपूर्वक
चुल्हे के पास खड़े होकर
दूध नहीं उबालतीं
उन्हें बड़ा नाज है
अपनी याददाश्त पर
पतीले में दूध डाला
उसे गैस पर चढ़ाया
पर वहाँ खड़े होकर
कौन बोर होने का सरदर्द ले
या तो तेज आँच पर ही
दूध को छोड़कर
गायब हो जाती हैं
यह सोचकर
बन्द कर दूँगी न
इधर दूध बेचारा भी क्या करे
उसे आदत है
उबलकर बाहर निकल जाने की
और नतीजा बड़ा सुहाना
हँस-हँस कर गाइए
हम उस घर के वासी हैं
जहाँ दूध की नदिया बहती हैJ

दूसरा विकल्प
गैस की आँच धीमी करो
फिर निकल जाओ गप्पें मारने
अब दूध बेचारा
उबलता रहा
उबलता रहा
आधा हुआ
उसका भी आधा हुआ
उफ! मालकिन अब भी गायब
पतीली ने सारा दूध पी लिया
अब क्या करे
उसने जले दूध की गंध
फ़िजाओं में घोल दिया
फिर रो-रो कर गाने लगी
मैं बैरन ऐसी जली

कोयला भई न राख’…J

.ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

स्त्रियों का पुराण


स्त्रियों का पुराण

नारी सौभाग्यशालिनी है
क्योंकि
वह दुर्गा है
वह लक्ष्मी है
वह सरस्वती है
वह सीता है
वह ममता है
वह त्याग की देवी है
वह सहगामिनी है
वह पार्वती है
वह राधा है
वह मीरा है
वह चरणदासी है

इतने सारे रूप हैं
सिर्फ़ नारियों के लिए
किन्तु ये सारे रूप
कहाँ तय किए गए
वेद-पुराण और ग्रंथों में !!
किसके द्वारा तय किए गए
पुरुषों के द्वारा न !!

इतना सारा सम्मान
नारियों को
इतराने के लिए काफी हैं
खुद को
देवी साबित करने के लिए
सारी उम्र
बिता देना काफी है...है न !!

अब हम नारियाँ भी
नए पुराण लिखना चाहती हैं
हे पुरुषों,
तुम ब्रह्मा हो
तुम विष्णु हो
तुम महेश हो
तुम राम हो
तुम त्याग के देवता हो
तुम ममता की मूरत हो
तुम सहगामी हो
तुम चरणदाााा...नहीं नहीं
स्त्रियाँ निर्दयी नहीं हो सकतीं
कोई दास या दासी नहीं होता
स्त्री हो या पुरुष
सभी इंसान ही होते हैं
सबकी मर्यादा होती है

बस गुजारिश है
अब तुम भी
खुद को
देवता साबित करने में
लगे रहो...लगे रहो...उम्र भर !!

ऋता शेखर मधु

सोमवार, 28 मई 2012

आ मेरे हमजोली आ...



‘‘आ मेरे हमजोली आ
खेलें आँखमिचोली आ’’
आप सोच रहे होंगे
मैं इसे क्यों गुनगुना रही हूँ
तो सुनिए...
आँखमिचोली का गेम
खेल रहे हैं दो लोग
एक मैं और एक
मेरे इलाके की बिजली
कभी मैं जीत जाती हूँ
कभी वह जीतती है.
मैं बज़ाप्ता
कम्प्यूटर के पास बैठती हूँ.
ब्लॉगर खोलती हूँ
साइन इन होती हूँ
कभी कोई रचना
पोस्ट करने के लिए
कभी टिप्पणी डालने के लिए
सारे पेज़ खोलती हूँ
लिखना शुरु करती हूँ
अचानक बिजली रानी
ठेंगा दिखाती हुई
गुल हो जाती है
जल्दी जल्दी
खुले पेज समेटती हूँ
मतलब सारी प्रक्रिया बेकार
फिर टकटकी लगाए इन्तेजा़र
फिर महारानी जी पधारती हैं
झट सारे प्रॉसेस दोहराती हूँ
एकाध जगह टिप्पणी डालने में
सफल हो जाती हूँ
विजय भाव से मुस्कुराकर
बिजली की ओर देखती हूँ
मानो मैंने गेम जीत लिया न!!
यू पी एस महोदय ने भी
दो टूक कह दिया
मैं इस आँखमिचोली में
साथ नहीं दे सकता
ठीक है भई,
मत दो साथ
मैं नहीं हारने वाली
आँखमिचोली का
यह खेल जारी है
हा हा हा...
आपने भी एनज्वाय किया न...

ऋता शेखर मधु

मंगलवार, 15 मई 2012

'डेज़' से भरी टोकरी




सुबह सुबह
अलसाई सी आवाज़
मम्मा, आज कौन सा डे है
आज सन्डे है,अभी सो जाओ
वो वाला डे नहीं
स्पेशल वाला डे
ओ,अभी मालूम नहीं
सर्च करके बताती हूँ


डे डे डे
हर दिन मनता
कोई न कोई 'डे'
डे मनाने के पीछे
मानसिकता होती है
उसे बढ़ावा देने की
या उससे निजात पाने की
अर्थात् हर ''डे''
उनके नाम
जो आते हैं
''निरीह' की श्रेणी में

'विमेन्स डे'
महिला मतलब निरीह
'डाटर्स डे'
बेटियाँ मतलब निरीह
'मदर्स डे'
यह भी महिला
सम्माननीय
'चिल्डरेन्स डे'
बच्चों को 
संरक्षण की आवश्यकता
'एनवायरोन्मेंट डे'
पर्यावरण भी
इंसानो के कारनामों से
बन गया निरीह
आजकल हँसने की गुंजाइश नहीं
निरीह हँसी के लिए
''लाफ्टर्स डे''
प्यार जताने का समय नहीं
'वैलेन्टाइन्स डे' है ना!
बच्चों को बचाना है
खतरनाक श्रम से
'चाइल्ड लेबर डे'
एक दिन की बैठक
फिर बच्चे वहीं के वहीं
चौकलेट डे
स्लैप डे
हग डे
रोज़ डे
टेड्डी डे
फ्रेंडशिप डे
मतलब डे ही डे

पुरुष होते बलवान
इसलिए है नहीं
कोई भी डे
उनके नाम
किन्तु जब बनते
पति और पिता
वे भी होते निरीह
अर्थात्
'हस्बेन्ड्स डे'
'फादर्स डे'
:):):)

ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

शिशु बेचारा



मैं बेचारा बेबस शिशु
सबके हाथों की कठपुतली
मैं वह करुं जो सब चाहें
कोई न समझे मैं क्या चाहूँ।

दादू का मै प्यारा पोता
समझते हैं वह मुझको तोता
दादा बोलो दादी बोलो
खुद तोता बन रट लगाते
मैं ना बोलूँ तो सर खुजाते।

सुबह सवेरे दादी आती
ना चाहूँ तो भी उठाती
घंटों बैठी मालिश करती
शरीर मोड़ व्यायाम कराती
यह बात मुझे जरा नहीं भाती।

ममा उठते ही दूध बनाती
खाओ पिओ का राग सुनाती
पेट है मेरा छोटा सा
उसको वह नाद समझती
मैं ना खाऊँ रुआँसी हो जाती
सुबक सुबक सबको बतलाती।

पापा मुझको विद्वान समझते
न्यूटन आर्किमिडिज बताते
चेकोस्लाविया मुझको बुलवाते
मैं नासमझ आँखें झपकाता
अपनी नासमझी पर वह खिसियाते।

चाचा मुझको गेंद समझते
झट से ऊपर उछला देते
मेरा दिल धक्-धक् हो जाता
उनका दिल गद्-गद् हो जाता।

भइया मेरा बड़ा ही नटखट
खिलौने लेकर भागता सरपट
देख ममा को छुप जाता झटपट
मेरी उससे रहती है खटपट।

सबसे प्यारी मेरी बहना
बैठ बगल में मुझे निहारती
कोमल हाथों से मुझे सहलाती
मेरी किलकारी पर खूब मुसकाती
मेरी मूक भाषा समझती
अपनी मरज़ी नहीं है थोपती।

दीदी को देख मेरा दिल गाता
“ फूलों का तारों का
सबका कहना है
एक हजा़रों में
मेरी बहना है।”

--
ऋता शेखर मधु

 रचनाकार: ऋता शेखर ‘मधु’ की बाल कविता - शिशु बेचारा http://www.rachanakar.org/2011/07/blog-post_8693.html#ixzz1s0YHyqYl

शनिवार, 31 मार्च 2012

किस्म-किस्म के फूल



गुलाब के फूल बागों में खिल रहे
चमेली के फूल चमन में चमक रहे
कमल के फूल जल में विचर रहे
बेली के फूल उपवन में बहक रहे
गुल्लड़ के फूल दिख नहीं रहे
गोभी के फूल उद्दान में चहक रहे
अप्रील के 'फ़ूल' यह पोस्ट पढ़ रहेः)))


अरे रे! बुरा न मानें...अन्तर्राष्ट्रीय मूर्ख दिवस की बधाई!!!
आए हैं तो अपनी उपस्थिति भी दर्ज कर दीजिए...टिप्पणी बॉक्स मेंः)))

सोमवार, 16 जनवरी 2012

Wish You Hadnt Dropped By--काश! तुम ना पधारते



आप सोच रहे होंगे कि हिन्दी ब्लॉग पर इंग्लिश पोयम का क्या काम है|यह पोयम मेरे सुपुत्र ने बॉस डे (१६ अक्टूबर-११)पर लिखा था जिसे ऑफिस में बहुत सराहना मिली|इसे मैं इस ब्लॉग पर डालना चाहती थी, तो नियम के अनुसार मेंने पुत्र महोदय से इसकी अनुमति माँगी तो आशा के प्रतिकूल मुझे यह जवाब मिला कि यह पोयम तभी मिलेगी जब मैं इसका हिन्दी में अनुवाद करूँ और वही भाव लाऊँ जिस भाव से उसने लिखा है-तो प्रस्तुत है दोनों version-
गूगल से साभार
Wish You Hadnt Dropped By

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Monday morning, sleepy eyes,
Week starts 'n emotions reprise...
A mountain of work,
*And the end is not nigh*
I just hope that you do not drop by...

They say - time likes to fly,
Weekdays differ, this notion they belie,
Here cometh the smiling you,
*Another query.. and yet another lie*
I just wish you hadn't dropped by...


But things aren't always bad,
I've seen clouds that silver lining had...
When times are rough,
There is only you to rely -
For once I'm glad you did drop by...


Adrift in my dreams,
With riches galore in faraway realms...
Peace it is - that I cannot deny,
Its weekend now, and you'll not drop by...

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गूगल से साभार
काश! तुम ना पधारते
सोमवार को होती जब भोर
उनींदी आँखें सिर्फ़ देखतीं
र्वत से कामों का ढेर
ऑफ़िस में उस बोझ तले
*अन्तहीन कार्यों के बीच*
मन में आती है सोच
बॉस, कहीं तुम पधार ना जाओ|

फिर बदलते हैं दिन
सप्ताह के मध्य में
कुछ काम निपट जाते
कुछ अधूरे ही रहते
आते तुम, आती तुम्हारी मुस्कान
*प्रश्नों के असंख्य बाणों को धारते*
ओह बॉस! काश! तुम अभी ना पधारते|

पर जीवन की इतनी भी बुरी नहीं है गाथा
काले मेघों में भी रुपहली रेखा देता है विधाता
जब समय होता है प्रतिकूल
अँखियाँ तुम्हारे पथ को निहारतीं
बॉस, मुझे खुशी होती
जब तुम मेरी कुटी में पधारते|

सप्ताह के अंत में
जब मन होता
सुखद स्वप्नों में विलीन
ऑफिस से दूर और कष्टहीन
इस सुख के बीच,
तुम कार्य नहीं लाओगे
क्योंकि  सप्ताहांत में
बॉस, तुम पधार ही नहीं पाओगे !

ऋता शेखर मधु