सुख और दुख जीवन के दो पहलू हैं...खुशियों में हम नाचते हैं...गाते हैं...पर कभी कभी किसी के व्यवहार से मन आहत होता है तो हमारे अन्दर एक सिसकी फँस जाती है...वह फँसी हुई
सिसकी कुछ कहना चाहती है...
मै हूँ,
हृदय में छुपी
एक छोटी सी सिसकी
वक्र निगाहें देख
बाहर निकलने में ठिठकी
कभी अश्रु बन टपकती
कभी नि:श्वास बन निकलती
कभी निर्विकार
सूनी आँखों से ताकती
कभी चेहरे पर
उदासी बन उभरती
कभी बेबस बन तड़पती
खुद को समझा लेती
हृदय पर ठेस लगती
दर्द महसूस करती
‘आह’ बन कराहती
अन्दर ही अन्दर
उमड़ घुमड़
रक्तचाप बढ़ाती
मैं, छोटी सी सिसकी|
छुपी छुपी उब जाती
मुस्कान की चुनर ओढ़
बाहर निकल टहलती,
महफ़िल में गर मैं होती
हंसी के फ़व्वारों में
चुपचाप बैठी रहती,
दिल में तुफ़ान लिए
कई कई सवाल लिए
मुस्कुराहटों की फुहार लिए,
अपनों की निगाहों से
छुप नहीं पाती
स्नेह- स्पर्श से
सदा पिघल जाती
मैं, छोटी सी सिसकी|
जहाँ ऐसा तलाशती
जहाँ क्रंदन कर पाती
चीख चीख कर
आर्तनाद गुंजाती
आँसुओं के सैलाब में
रुदन की नौका पर
बहकर विलीन हो जाती
बोझिल मासूम हृदय को
हल्का कर पाती,
मैं, नन्हीं सी सिसकी|
ऋता शेखर ‘मधु’