सावधान...कहीं कुछ चीजें चुपके से प्रवेश तो नहीं कर रहीं...
सहेज रही थी फूल काँटा चुभा चुपके से
आने को थी बहार पतझड़ घुसा चुपके से
खुशियाँ दामन में भर सबको देने चली थी
अँखियों से दो मोती चू पड़े थे चुपके से
जीवन की राह को समतल बनाया जतन से
चलते चलते इक खाई आ गई चुपके से
सरल सहज बातें चाशनी में पगी होती
कब किस बात पे रंजिशें आ गईं चुपके से
सहयोग सम्मान की नींव पर बसता है घर
स्वार्थ की चिड़िया ने खोदा इसे चुपके से
ऐ विषादों, हमने तुम्हें बुलाया नहीं था
किस संकरे रास्ते से घुसी तुम चुपके से
सहयोग सम्मान की नींव पर बसता है घर
स्वार्थ की चिड़िया ने खोदा इसे चुपके से
ऐ विषादों, हमने तुम्हें बुलाया नहीं था
किस संकरे रास्ते से घुसी तुम चुपके से
इस भवकूप में दिल बहुत घबड़ाता है प्रभु
है इन्तेज़ार कि मौत आ जाए चुपके से
ऋता शेखर ‘मधु’