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सोमवार, 11 मई 2020

वह एक रात-कहानी

भुतिया हवेली की दास्ताँ - Horror Stories

मित्रों, एक प्रयास हॉरर कहानियाँ लिखने का...त्रुटियाँ अवशाय बताएँ जिससे आगे सुधार कर सकूँ| अच्छी लगे वह भी बताएँ उत्साहवर्धन हेतु|

वह एक रात

( भुतही हवेली पर आधारित)

नेहा को अपने गाँव पहुँचने में देर हो गई थी | ट्रेन पाँच घंटे देर थी जिस कारण से जो ट्रेन शाम सात बजे पहुँचने वाली थी वह रात के ग्यारह बजे पहुँची थी| नेहा ने घर में बताया नहीं था कि वह आ रही है| बताती तो बुआ परेशान हो जाती| नेहा शहर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी| जब भी तीन या चार दिनों की छुट्टी मिलती वह अपनी बुआ के पास गाँव चली आती थी| बचपन में ही माता पिता की मृत्यु हो चुकी थी, बुआ ने ही उसे रखकर पाला था| बुआ के दो बच्चे थे| उनके साथ ही रहती हुई, लड़ती झगड़ती, लाड़ लगाती बड़ी हुई थी| दोनों भाई- बहन बाहर के शहरों में नौकरी करते थे | फूफा जी नहीं थै| बुआ गाँव छोड़कर जाना नहीं चाहती थीं| नेहा पूरे गाँव की लाडली थी | सबके घरों में उसका आना जाना लगा रहता था | उसका विनोदी स्वभाव सभी को पसंद था|

ऐसी ही छुट्टी में वह गाँव आई थी रात के ग्यारह बजे चारो और सन्नाटा हो चुका था| नेहा बहुत सामान लेकर नहीं आती थी | पीठ पर एक बैग होता जिसमें ट्रेन में पढ़ने के लिए दो चार किताबें होतीं, पानी की बॉटल होती और रास्ते के लिए कुछ स्नैक्स होते थे| कपड़े तो लेती नहीं थी | बुआ के घर कपड़े लेकर जाने की आवश्यकता नहीं होती थी|

रेलवे स्टेशन से घर नजदीक ही था तो पीठ पर बैग लादे वह पैदल ही घर की ओर आने लगी| गाँव में प्रवेश करते ही उसे लगा कि कोई उसके पीछे- पीछे चल रहा है पलटकर देखी तो गाँव में सेठ की हवेली में रहने वाली उनकी बहु जैसी लगी|

“अरे भाभी आप! इतनी रात को बाहर क्या कर रही हो|”

उसने नेहा का हाथ पकड़ लिया और बोली,”हवेली चलो”

“पर क्यों, बुआ के घर जाऊँगी न|”

“नहीं, इतनी रात लड़कियों का बाहर चलना ठीक नहीं | हवेली में रात बिता लो, सवेरे चली जाना|”

“ठीक है भाभी ”, कहकर वह साथ साथ चलने लगी| रास्ते भर दोनों चुप रहे| नेहा ने कुछ बातें करने की कोशिश की तो भाभी ने उत्तर नहीं दिया|

हवेली पहुँच कर भाभी ने कहा कि नेहा हाथ मुँह धो ले उसके बाद वह खाना लगाती है| नेहा वॉशरूम चली गई| सब कुछ करीने से रखा हुआ था| नेहा ने ठंडे पानी से हाथ पैर धोया, चेहरे पर छींटे मारे और बाहर आ गई| तब तक भाभी ने डायनिंग टेबल पर खाना लगा दिया था| खकाना में बहुत सारी डिशेज बनी हुई थीं| नेहा ने सबसे पहले गाजर के हलवे पर हाथ साफ किया| फिर अन्य चीज़ें खाने लगी| भाभी लगातार वहीं पर हल्के घूँघट में बैठी रही| नेहा ने जब खाना खा लिया तो उसकी फेवरिट आइसक्रीम भी आई| उसे भी नेहा ने खाया | उस दौरान दोनों ही चुप रहे| अचानक नेहा ने पूछा, “भैया कहाँ हैं भाभी, और अंकल जी भी नहीं दिख रहे|”

“वो सहारनपुर गये हैं| कल ही उनकी वापसी है ट्रेन से| अच्छा, अब तुम कमरे में जाकर सो जाओ| मैं भी जाती हूँ| सवेरे अपने घर चली जाना|”

“ओके भाभी”, कहकर वह चली गई|

थोड़ी ही देर में वह गहरी निद्रा में थी| अचानक खटपट की आवाज से उसकी नींद खुल गई | उसे लगा जैसे किचेन का दरवाजा खुला और कोई वहाँ घुसा|

‘आधी रात को कौन हो सकता है, कहीं कोई चोर तो नहीं’, यह सोचकर वह धीरे से उठी और किचेन की ओर गई|

वहाँ कोई नहीं था, पर बेसिन का नल खुला था| कोई नजर नहीं आ रहा था किन्तु बरतन धोकर रैक पर रखे जा रहे था| नेहा बेआवाज खड़ी रही | उसके रोंगटे खड़े हो गए जब उसने देखा कि अचानक गैस स्टोव जला और किसी ने रोटियाँ सेंकनी शुरु कीं| बस इतना ही पता चल रहा था था कि रोटियाँ बेली जा रही थीं, तवे पर जा रही थीं और फिर कैसरोल में रखी जा रही थीं| वह भाभी के कमरे की ओर गई पर वह बंद था| उसने आवाज करना उचित नहीं समझा| वापस आकर बिस्तर पर सो गई| रसोई में खटपट जारी थी| कुछ देर बाद फिर से दरवाजा खुला और कोई चला गया| नेहा चुपके से उठी और किचेन में गई| सुबह के नाश्ते जैसा खाना करीने से रखा था| उसने सभी कैसरोल को ढक्कन उठा- उठाकर देखा| रोटियों के साथ पनीर की सब्जी, खीर, दही , रायता सब कुछ था| नेहा वापस कमरे में आ गई| थोड़ी देर में उसकी आँख लग गई| सुबह सुबह ही उसे घर जाना था किन्तु उसकी नींद नहीं खुली| कमरे में धूप आ चुकी थी| चिड़ियों की चहचहाहट मन को भा रही थी| उसने आँखें खोलीं| सामने दीवार घड़ी सुबह के आठ दिखा रही थी| अचानक नेहा को रात की घटना याद आ गई| उसके मस्तक पर पसीना चुहचुहा गया| बिना चप्पल पहने वह कमरे से बाहर झाँकने लगी| उसने देखा कि डायनिंग टेबल पर खाना लगा हुआ था| कुछ लोग खा भी रहे थे| पर कौन...कोई दिख नहीं रहा था और रोटियाँ प्लेट से घटती जा रही थीं| दस मिनट में सारी प्लेटें खाली थीं| लगता है खाने वाले तीन लोग थे क्योंकि तीन प्लेट ही खाली हुई थी| बाकी प्लेटें पलट कर रखी हुई थीं|

“आओ नेहा, तुम भी नाश्ता कर लो”, अचानक भाभी कहीं से प्रकट हो गईं

“भाभी, अब मैं घर जाना चाहती हूँ|”नेहा ने कँपकँपाती आवाज़ में कहा|

“नाश्ता कर लो फिर जाना,”लहजा थोड़ा आदेशात्मक था जिसे नेहा इंकार नहीं कर सकी| उसने खाना खाया पर आज उसे कुछ भी रुचिकर नहीं लग रहा था| किसी तरह पानी पीकर गटक गई और उठ खड़ी हुई| भाभी कहीं नहीं दिख रही थीं| उसने कहा, “भाभी जा रही हूँ”, पर किसी ने प्रत्उत्तर नहीं दिया| वह अपना बैग लेकर बाहर जाने लगी| बाहर का दरवाजा अपने आप ही खुल गया जैसे वहाँ पर कोई खड़ा था| उसने एक नजर ड्राइंग रूम पर डाली| सामने दीवार पर अंकल जी और भैया की बड़ी सी फोटो लगी थी और उनपर खुशबूदार चंदन की माला लटक रही थी| नेहा बेहोश होते होते बची| सारी शक्ति समेटकर वह बड़े बड़े डग भर दरवाजे से बाहर निकली | उसे लगा कि किसी ने दरवाजा बंद किया था| उसे पलटकर देखने की हिम्मत नेहा को न हुई|

वह तेजी से घर की ओर बढ़ी जा रही थी| उसने अहाते का गेट खोला और अन्दर घुसी| बुआ तुलसी को जल दे रही थीं| नेहा को देखते ही बुआ का चेहरा खिल गया|

“कब ई बेटी, आने से पहले बताना भी जरूरी नहीं समझती,” बुआ ने लाड़ लगाते हुए कहा|

“कल रात ही आई थी बुआ”,”बुझी हुई आवाज में नेहा ने कहा |

नेहा का चेहरा उड़ा हुआ था, बुआ को यह भाँपते देर न लगी |

“कल रात ही आई तो अब तक कहाँ थी”, किसी आशंका ने बुआ को घेर लिया|

“सामने अंकल जी की हवेली में थी, वहीं रात का खाना खाया| सुबह भी भाभी ने नाश्ता भी करवा दिया| किंतु भाभी ने यह क्यों कहा कि भैया और अंकल आज सहारनपुर से आने वाले हैं जबकि आते आते मैंने देखा कि भैया की फोटो पर माला लगी थी|”

“ओह, एक महीने पहले की बात है कि दोनों बाप बेटे ट्रेन से सहारनपुर से आ रहे थे| तेरी भाभी स्टेशन पर उनको लाने गई थी| अभी ट्रेन कुछ दूर पर थी खी एक तेज रफ्तार ट्रेन से उसकी टक्कर हो गई| उसी दुर्घटना में दोनों चल बसे| यह देखते ही भाभी का करुण क्रंदन गूँजा ‘मैं आपके बिना नहीं जी सकती” कहते हुए वह दूसरी पटरी पर आ रही ट्रेन के सामने आ गई और वह भी चली गई|”

“ओह”, झुरझुरी सी उठी नेहा के शरीर में|

“तब से वह हवेली भुतही हो गई| वहाँ कोई आता जाता नहीं|”

“लेकिन बुआ, वह हवेली अन्दर से साफ सुथरी है| वहाँ खाना भी पकता है तभी तो भाभी ने खिलाया|”

“भाभी ने खिलाया”, कहते हुए बुआ की तंद्रा टूटी ”सही सलामत आ गई मेरी बच्ची”कहते हुए बुआ ने नेहा को गले से लगा लिया|

भूत प्रेत पर विश्वास न करने वाली नेहा अब अविश्वास नहीं कर पा रही थी|

ऋता शेखर ‘मधु’

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

मैं वापस आऊँगा -- कहानी

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मैं वापस आऊँगा

     हवाई जहाज ने टेक ऑफ़ के बाद स्थिर रफ़्तार पकड़ ली थी| जल्द ही श्वेत बादलों को टक्कर देती हुई ऊँची उड़ान भरने लगी|पूरे आठ घंटे का सफर था|
     आज घर से निकलने के कुछ देर पहले पिता जी सीढ़ियों से गिर गये थे| कोई फ्रैक्चर तो नहीं हुआ था पर चोट अच्छी खासी आई थी| एक्स रे करवा लेना जरूरी था इसलिए उन्हें लेकर अस्पताल गया और समुचित इलाज करवाकर वापस आया| घर में पत्नी नेहा ने सब कुछ व्यवस्थित करके रखा हुआ था|

“पिता जी, मेरा मन अब जाने का नहीं हो रहा| जाने से मना कर दूँ क्या,” मैं चिंतित था||

“अरे नहीं बेटा, चोट लगी है तो धीरे धीरे ही ठीक होगी न| तू निश्चिंत हो कर जा| नेहा है न , वह सब संभाल लेगी|

मैंने नेहा की ओर देखा|

“पिता जी ठीक कह रहे रहे हैं, मैं उनकी देखभाल कर लूँगी| आप चिंता न करें|” नेहा ने भी स्वीकृति दे दी| नेहा के सेवा भाव और जिम्मेदार स्वभाव से मैं चार वर्षों में परिचित हो चुका था इसलिए नेहा पर पूरा विश्वास था|
     इसी भागदौड़ में मुझे थोड़ी थकावट हो गयी थी| हवाई ड्डे पर सभी औपचारिकताओं के समय भी मैं थका थका महसूस कर रहा था| हवाई जहाज में बैठकर स्थिरता आते ही मैंने आँखें बन्द कर लीं| मेरा ख्याल था कि मुझे नींद आ जाएगी|पर मन के भीतर का संसार इतना विशाल होता है कि पलक बन्द करते ही मनुष्य वहाँ विचरण करने लगता है| कम्पनी की ओर से वह लंदन जा रहा था| वहाँ मेरे मित्र नें अपने घर आने का न्योता दे रखा था| आँखें बंद करते ही मुझे वह दिन याद आ गया जब उसने आई आई टी कम्पीट करने के बाद काउंसेलिंग के लिए कॉलेज परिसर में कदम रखा था| सबने अपने अपने ब्रांच का चयन किया| उसके बाद बारी थी हॉस्टल में रूममेट चुनने की| लगभग सबने अपनी जोड़ी ढूँढ ली थी| मेरे पिता निर्णय नहीं ले पा रहे थे| कुछ लड़के दिग्गज लग रहे थै, कुछ के माता पिता की अकड़ देखने लायक थी| तभी एक सीधा सा लड़का अपने माता पिता के साथ वहाँ पर आया|

“क्या आप मेरे बेटे ऋषि के साथ अपने बेटे को रखना चाहेंगे| ये बहुत ही सीधा है| आपका बेटा भी मासूम लग रहा|”

मेरे पिता ने झट से हामी भर दी| वहीं से सफर शुरू हुआ हमारे साथ का| हमारी जोड़ी खूब जमने लगी| चार वर्षों तक हमने अपनी सभी बातें शेयर करना सीख लिया| यह भी संयोग ही था कि कैंपस सेलेक्शन में नौकरी भी हमें एक ही कंपनी में लगी|

     हमने मुंबई में साथ ही एक फ्लैट किराये पर लिया और रहने लगे| फ्लैट में अक्सर उसके पिता आकर रहते थे| कानपुर में उनका बिज़नेस था| ऋषि उनका इकलौता पुत्र था|

एक दिन उन्होंने बातों ही बातों में बताया कि वे अब ऋषि की शादी करना चाह रहे|

“अंकल ,आपने लड़की पसंद कर ली क्या?”

“हाँ बेटा, वह मेरे एक मित्र की लड़की है| बहुत ही शालीन , मृदुभाषी और मिलनसार लड़की है| बचपन से ही देखा है उसे| उन्हैं भी ऋषि पसंद है| हमारा फैमिली बिजनेस भी सँभल जाएगा|”

“अरे वाह अंकल, ये तो बहुत अच्छी बात है| अब देर किस बात की| फटाफट बहू लाइए|”

उसके एक महीने बाद ऋषि की शादी हो गयी|

     उसके बाद ऋषि ने अपना स्थानान्तरण कानपुर में ही करवा लिया| मुझे बहुत खुशी थी कि अंकल को सहारा मिल गया था बेटे- बहू का| चूंकि कंपनी एक ही थी तो अचानक एक दिन मेल पर पढ़ा कि ऋषि विदेश जा रहा| मैंने झट से उसे फोन लगाया|

“यार, सुना कि विदेश में बसने की तैयारी हो रही| अपना देश क्या बुरा है यार|”

‘बात अपने देश की नहीं साहिल, जाना है तो जाना है|”

“ऐसा भी क्या हो गया, अंकल के बारे में भी तो सोच|”

“पापा को हमदोनों से बहुत ज्यादा चाहतें है यार, इससे हमारे रिश्तों में दरार आने लगी है|मैं घर का बिजनेस नहीं सँभालना चाहता| बहुत मेहनत से पढाई की है तो नौकरी ही करूँगा| मेरी पत्नी भी नहीं चाहती कि टिपिकल भारतीय बहुओं की तरह घर के काम काज और माँ की सेवा में समय बिताए|”

“तब उसी शहर में अलग रह, भाभी को समझा| देश छोड़ कर भागने से क्या तू खुद को माफ कर पाएगा|”

इसका ऋषि ने कोई जवाब नहीं दिया|

अगले दस दिनों में ही वह पत्नी के साथ विदेश चला गया|

     वह सीधा सादा लड़का क्या सच में अन्दर से उतना ही सीधा था या फिर अंकल ने ही कुछ ज्यादा उम्मीदें पाल ली थीं, इसका उत्तर नहीं दे पाता था मन मेरा|

अब जब मुझे भी लंदन जाने का मौका मिला तो मैंने अंकल को फोन किया|

“अंकल, मैं लंदन जा रहा हूँ| क्या आप कुछ देना चाहेंगे ऋषि के लिए?”

“बेटा, मैं कुछ भी दूँगा तो वह लेगा या नहीं, यह तो नहीं मालूम| हाँ, उसके कुछ छोटे कपड़े हैं, वह ले जाओ उसके बेटे के लिए|”

“अरे वाह! आप दादा बन गये और ऋषि ने बताया भी नहीं| छोटे कपड़े दे दीजिए| और अंकल, आपके लिए क्या लाऊँ?”

“बस, अपने मोबाइल में कुछ फोटो ले आना जिसमें पोते को देखकर संतोष कर लूँगा|”

“जी,”कहते हुए मेरी आँख भर आई|

मैं पुराने दिनों की यादों में खोया हुआ था तभी जहाज लैंड करने की सूचना दी गयी| ओह! पिछले चार वर्षों को याद करते हुए पाँच घंटे बीत चुके थे|

लंदन पहुँचते ही सीधे ऋषि के घर गया| आवभगत की पूरी तैयारी थी| गपशप में समय निकल गया| रात का खाना खाकर ऋषि की पत्नी रसोई समेटने लगी| मैं ऋषि से अकेले में बात करना चाहता था इसलिए उसे लेकर बाहर निकल गया|

“अब बता ऋषि, क्या अंकल आंटी की याद नहीं आती?”

शायद ऋषि को भी इसी सवाल का इन्तेजार था| पर उसने कहा कुछ नहीं| बहाने से आँखों के पास हाथ ले जाकर उसने बूँदों को थाम लिया|

“ऋषि, अंकल ने तेरे लिए कुछ भेजा है| बिना पूछे देने की हिम्मत नहीं हुई| क्या देखना पसंद करेगा?”

“हाँ”, संक्षिप्त उत्तर देकर वह वापस घर की ओर मुड़ गया|

मैंने वह पैकेट ऋषि को थमा दिया| उसे देखते हुए फिर वह स्वयं को रोक नहीं पाया और फूटफूट कर रोने लगा| उसकी पत्नी भी शांत बैठी थी|

“अंकल के लिए कुछ देना चाहोगे ऋषि?”

“क्या दूँगा”

“मैं बताऊँ’, कहते हुए मैंने वीडियो कॉल लगा दिया|

दोनों एकटक एक दूसरे को देखते रहे| मैंने उसके बेटे को भी सामने कर दिया|

उस वक्त शब्द जरूरी न थे|

विडियो बंद करने से पहले मैंने पूछा,’कुछ कहना है?”

“मैं वापस आऊँगा पापा,” अचानक ऋषि ने कहा|

वीडियो कॉल बन्द करके मैं अपने बिस्तर पर चला गया| कभी कभी किसी रिश्ते को सुधारने के लिए किसी तीसरे का प्रवेश भी जरूरी हो जाता है, यह सोचते हुए धीरे धीरे मेरी पलकें मुँदने लगी थी|

मौलिक एवं अप्रकाशित

ऋता शेखर ‘मधु’

३१/०८/२०१९

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

पत्र...किसके नाम?


फेसबुक पर एक समूह में पत्र लेखन प्रतियोगिता थी|

62 प्रविष्टियों में...अच्छे पत्रों में हमारे पत्र को भी रखा गया इसके लिए खुश हूँ 😊अब आप सब भी पढ़िए।

पुणे
29/06/2019
प्रिय रौशन,
सदा प्रसन्न रहो।
अपनी रौशनी को रौशन के रूप में स्वीकार करने में थोड़ा समय लगेगा। बड़े नाजों से तुम्हें पाला है रौशनी। जब तुमने जो चाहा, दिया। तुम मेरी बड़ी बेटी हो। हमारे यहाँ दो पीढ़ियों से लड़की का जन्म नहीं हुआ था। तुम्हारे जन्म पर तुम्हारे दादा लक्ष्मी के रूप में तुम्हें पाकर अति प्रसन्न थे और उन्होंने पूरे गाँव में लड्डू बँटवाए थे। दादी तो रोज नए फ्राक सिलकर पहनाती तुम्हें। जब तुम सात वर्ष की थी तो तुम्हें लड़कों वाले खेल पसन्द आते थे। गिल्ली डंडा और कंचे खेलने में तुम्हारी रुचि बढ़ने लगी थी। अब दादी के फ्राक तुम्हें पसन्द नहीं आते थे। तुम हमेशा पैंट शर्ट की ज़िद करने लगी थी। बाल भी छोटे कटवाए थे जिद करके। यह सब बातें सामान्य समझ कर हम निश्चिंत रहे। समय के साथ तुम बड़ी होती गयी और उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहर चली गयी। पढ़ाई में अव्वल आती रही और कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। तुम जब भी छुट्टियों में घर आती, अपनी प्रिय सहेली रूबी की ढेर सारी बातें करती। उसकी पसंद नापसन्द तुम्हारे लिए बहुत मायने रखती थी। हम इसे भी सामान्य समझ कर दो सहेलियों का प्रेम समझते रहे। एक बार तुम उसे लेकर घर आई तो तुम दोनों के व्यवहार से कुछ तो खटका था मन में, पर इसे वहम समझकर दिमाग से झटक दिया था। जब विवाह योग्य हुई तो मैंने लड़कों की लिस्ट तुम्हारे सामने रख दी। तुमने विवाह के प्रति अपनी अनिच्छा जताई। बहुत पूछने पर तुमने जो कहा, वह सुनकर मेरे और तुम्हारी मम्मी के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
तुमने कहा था " मैं रूबी को जीवनसाथी बनाना चाहती हूँ, अब समलैंगिकों को साथ रहने का कानूनन अधिकार मिल गया है।" हम मूक रहकर सिर्फ तुम्हें देखते रहे। तुम बालिग और आत्मनिर्भर थी। अपना निर्णय लेने का अधिकार था तुम्हें, पर ये...। किसी भी चीज़ को किस्से कहानियों तक पढ़ना अलग बात होती है और खुद पर बीतना अलग।
लोग क्या कहेंगे...यह बात मन पर हावी होने लगी। दो दिनों के मानसिक उथलपुथल के बाद हमने इसे जैविक असमानता स्वीकार करते हुए समाज की परवाह छोड़ दी। तुम्हें डॉक्टर को दिखाया। अब फिर से भगवान ने एक अजूबे तथ्य से अवगत कराया। तुम्हारे शरीर में पुरुषों वाले अंग प्रत्यंग भी थे। कई जटिल प्रक्रियायों से गुजरते हुए आज तुम बेटा के रूप में सामने खड़ी हो। हम दामाद लाते, अब बहू लायेंगे।
रौशन, तुमने लड़की का जीवन भी जिया है।आशा है आगे उनके दर्द को भली भाँति समझ पाओगे।डॉक्टर ने कहा है कि ऐसे केस लाखों में एक होते हैं। समाज की परवाह न करना। हम तुम्हारे साथ हैं और रूबी को बहू के रूप में स्वीकार करते हैं । तुम दोनों की इज्जत पर कोई आँच नहीं आएगी।
हॉर्मोन्स की वजह से असामान्य लक्षण प्रकट होना ईश्वर प्रदत्त है बेटा, उनकी हँसी उड़ाने वालों को नासमझ समझ कर माफ़ कर देना।
बहुत प्यार
तुम्हारा पापा
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स्वरचित, अप्रकाशित, अप्रसारित
ऋता शेखर 'मधु'
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सोमवार, 24 जून 2019

नलिन की वापसी - कहानी

नलिन की वापसी
   सुपर फ़ास्ट ट्रेन तीव्र गति से अपने गंतव्य की ओर बढ़ती जा रही थी| जनरल डब्बे की निचली बर्थ पर खिड़की के पास बैठी सुमेधा पवन के शीतल झोंकों का आनन्द ले रही थी| मन के भीतर की खुशियाँ चेहरे पर झलक रही थीं, कभी एक उदासी भी झलक जा रही थी| वह अपने प्यारे बेटे के साथ बनारस जा रही थी | बेटे नलिन ने बारहवीं की परीक्षा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण की थी और साथ साथ आईआईटी भी निकाला था उसने| आगे की शिक्षा के लिए शिव के त्रिशूल पर टिकी नगरी वाराणसी में बीएचयू में दाखिला मिला था| वह उसे हॉस्टल छोड़ने जा रही थी| उसके बगल में बैठा नलिन चेतन भगट का नॉवेल ‘थ्री इडियट्स’ पढ़ने में तल्लीन था| उपन्यास पढ़ते हुए कभी उसके चेहरे पर मुस्कान भी आ जाती| सुमेधा ने यूँ ही पूछ लिया,”इस कहानी में क्या है नलिन?”

“तीन इडियट्स की कहानी जिन्होंने आईआईटी कॉलेज में नामांकन कराया है|”

“हा हा हा, आईआईटी वाले इडियट्स... अच्छा, तब तो तुम्हें मजा आ रहा होगा,”मुस्कुराती हुई सुमेधा पुनः बाहर के नजारे देखने लगी| ट्रेन की रफ़तार धीरे धीरे कम होने लगी थी| अगला स्टेशन शायद मुगलसराय था, जो अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन के नाम से जाना जाता है|

ट्रेन के रुकते ही कई यात्री उतर गए, कई चढ़े भी| साथ ही फल वाले, स्नैक्स वाले, पेपर सोप, ताला-चाबी वाले, चिनिया बादाम वाले भी चढ़ गए| शोर से पूरा डब्बा भर गया | चाय कॉफी की बिक्री दनादन होने लगी| सुमेधा और नलिन को इन सब चीज़ों से कोई मतलब नहीं था| नलिन अपने उपन्यास में उलझा रहा और सुमेधा स्टेशन के दृष्य देखने में लगी रही|

“मे आई सिट हियर...May I sit here,” फिरंगी टोन में पूछी गई इस बात से सुमेधा ने सामने देखा| एक गोरा चिट्ठा साधु सामने खड़ा था| एक नजर में ही सुमेधा ने उसके पूरे व्यक्तित्व का जायजा ले लिया| गेड़ुआ वस्त्र धारण किए हुए साधु में कहीं से भी भारतीय रूपरेखा की झलक नहीं थी सिवाय उस झोले के, जिसे उसने कंधे पर लटका रखा था|

“मे आई सिट हियर...क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?”, इस बार वह सुमेधा की आँखों में आँखें डालकर पूछ रहा था|

“यस, ऑफ़ कोर्स...हाँ हाँ क्यों नहीं”, सुमेधा ने अपने पलथी लगाए पैरों को नीचे रखते हुए कहा|

वह सुमेधा के बगल में बैठ गया| तब तक नलिन ने एक उड़ती निगाह उस साधु पर डाली | उसके बाद वह फिर से अपने उपन्यास में डूब गया| सुमेधा भी बाहर देख रही थी| ट्रेन में अजनबियों से बातें करने का उसे कोई शौक नहीं था|

“इज़ ही योर सन ?”, नलिन को देखते हुए उसने सुमेधा से पूछा|

“यस..हाँ”, कहते हुए सुमेधा की नजर नलिन से मिली|

“व्हाट इज़ योर नेम यंग बॉय”, उसने नलिन से पूछा|

“नलिन, हिज़ नेम इज़ नलिन....कैन यू अंडरस्टैंड हिन्दी?”, नलिन के बजाय सुमेधा ने जवाब देने के साथ ही सवाल भी ठोक दिया| वह नहीं चाहती थी कि वह फिर से नलिन से कोई सवाल करे|

“हाँ, मैं हिन्दी समझता हूँ और बोल भी लेता हूँ|” मुस्कुराते हुए उसने कहा|

“ओके”, कहकर सुमेधा फिर से बाहर देखने लगी|

“नलिन का क्या अर्थ होता है”, वह चाहता कि बातचीत का सिलसिला कायम रहे|

“लोटस...कमल” सुमेधा को बोलना पड़ा क्योंकि यह बताने में कोई हर्ज़ नहीं था|

“वाउ, गुड नेम| लगता है आपलोग भी वाराणसी जा रहे| वहाँ पढ़ते हो क्या नलिन?”

नलिन ने उपन्यास पर से आखें उठाई,”हाँ”, कहकर फिर पढ़ने लगा|

“मैं फिलिपिन्स से आया हूँ,”यह कहकर वह क्षणभर को चुप रहा|

“तो मैं क्या करूँ”, सोचते हुए सुमेधा ने यह दिखाया जैसे उसे उसकी बातों में कोई दिलचस्पी न हो|

“मैंने श्रीमद्भागवद्गीता पढ़ी है| आई लाइक लॉर्ड कृष्णा| उन्होंने स्वयं के बारे में कहा है...ऋतुओं में मैं बसंत हूँ, वृक्षों में मैं बरगद हूँ और....” वह आगे कुछ कहता उसके पहले ही सुमेधा बोल पड़ी,”बरगद नहीं पीपल”

“ओह, सही कहा, भूल गया था मैं”, भूला था या जानबूझकर कर उसने गलत कहा, यह सुमेधा समझ नहीं सकी|

“अंकल, आपका नाम क्या है,” नलिन ने उपन्यास एक ओर रखते हुए पूछा|

“अंकल मत कहो, डैनियल कहो माय सन” कहते हुए उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई|

“हमारे भारत में बड़ों का नाम नहीं लेते अंकल”नलिन ने मुस्कुराते हुए कहा|

“ओ हो हो हो...”उसकी चालाक सी हँसी तैर गई|

“वैसे अंकल, डैनियल का अर्थ क्या होता है|”

“डैनियल मीन्स गॉड इज़ माय जज़, और जिसका न्याय स्वयं ईश्वर करें वह भी तो सच्चा न्यायकर्ता होगा न”, अपनी व्याख्या पर खुद ही मुग्ध होता हुआ वह बोल पड़ा|

सुमेधा ने नलिन की ओर देखकर आँखों ही आँखों मना किया कि वह आगे बात न करे| नलिन चुप बैठ गया|

किन्तु वह भी कहाँ मानने वाला था,”मुझे भारत के युवाओं मे बहुत ऊर्जा दिखती है| पढ़ाई हो या कोई भी क्षेत्र, हर जगह वे अपनी छाप छोड़ते हैं| मैं कई वर्षों से इसी समय भारत आता हूँ| मुझे अक्सर बीएचयू के विद्याथी मिलते हैं ट्रेन में|”

“मैं भी तो...”अचानक नलिन बोल पड़ा और जिस बात से सुमेधा डर रही थी वह हो गया|नलिन ने अनजाने में अपने कॉलेज का खुलासा कर दिया| उसने उस फिलिपियन साधु की ओर देखा| उसके होठों के कोने पर उभरी कुटिल मुस्कान से वह दहल गई|

“किस शहर से आ रहे हो....नलिन?,”नाम लेकर सवाल पूछना जैसे उसके अधिकार क्षेत्र में चला गया था|

“यह बताना मैं जरूरी नहीं समझती”, कहते हुए सुमेधा की रुखाई झलक गई|

“ओके, ओके, कोई बात नहीं”, अपनी ऊँची गोरी नाक को छूता हुआ कह रहा था|

सुमेधा बोल पढ़ी, “आपने गीता पढ़ी है तो यह भी जानते होंगे कि कृष्णा सर्वव्यापी हैं| वह आपको आपके देश में भी मिल जाएँगे| उनके लिए भारत आने की क्या जरूरत है|”

“कृष्णा के लिए अनुयायी बनाने का काम करता हूँ|”

“मतलब? कैसे अनुयायी बनाते हैं आप?”

“छोड़िये, ये मेरे और कृष्णा के बीच की बातें है, आप नहीं समझेंगी,”कहता हुआ वह उठने का उपक्रम करने लगा क्योंकि ट्रेन अब रुकने ही वाली थी|

सुमेधा और नलिन भी सामान ठीक करने लगे| स्टेशन पर वह पहले उतर गया था किन्तु वहीं पर खड़ा रहा| चूँकि हॉस्टल में रहने की बात थी तो सुमेधा ने टिन का एक बक्स लिया था जिसमें रोज के कपड़ो के अलावा गरम कपड़े भी थे| भारी बक्से को दोनों माँ बेटा मिलकर उतारने की कोशिश कर रहे थे कि उसने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया| सुमेधा ने कहना चाहा कि उसे मदद की आवश्यकता नहीं, किन्तु चुप रही और उसे बक्से को उतारने दिया| इस दौरान उस गोरे फिरंगी साधु के चेहरे की एक एक रेखा से कुटिलता टपक रही थी|

“उफ! मैं भी कितनी शक्की हूँ, वह मदद ही तो कर रहा है”, यह सोचकर सुमेधा मुस्कुरा दी|

“मैं दो महीने भारत में रहूँगा, फिर अगले साल आऊँगा” कहता हुआ उसने नलिन से हाथ मिलाया और सुमेधा की ओर मुड़कर नमस्कार की मुद्रा में खड़ा हो गया| सुमेधा ने जल्दी से नमस्कार किया और आगे बढ़ने लगी| पता नहीं क्यों किसी अनहोनी की आशंका से उसका मन बार बार उसे सावधान कर रहा था| आने वाले खतरे को भाँप लेने की उसकी अंतर्दृष्टि को परिवार में भी सभी लोग मानते थे|

बीएचयू पहुँचने पर गेस्टरूम में सुमेधा को जगह मिल गई| नलिन को भी हॉस्टल में जगह मिल गई| नलिन के रूममेट के रूप में सही मित्र को देखकर सुमेधा ने चयन किया| अगले दिन आँखों में नमी लिये वह वापस लौट आई| नलिन भी माँ से बिछड़ते हुए भावुक हो गया| नई जगह , नए दोस्त मिले|”

”कैसे एडजस्ट कर पाएगा” कभी वह घर से बाहर नहीं रहा रहा था तो सुमेधा की चिंता वाज़िब थी|

अपने शहर वापस आकर सुमेधा अपनी नौकरी में लग गयी| जिस दौर में नलिन बीएचयू गया था, उस दौर में हर हाथ में मोबाइल नहीं सजे रहते थे| वह जमाना था कि टेलिफोन बूथ पर जाकर एसटीडी कोड के साथ लैंडलाइन पर नम्बर लगाने होते थे| नलिन से बात करने के लिए ऑफ़िस के नम्बर पर फ़ोन लगाना होता था| फिर वे लोग नलिन को बुलाते तब बात हो पाती| शुरू के सप्ताह में लगातार सुमेधा ने नलिन से बात की| एक बार नलिन ने कहा,”माँ, किसी के घर से हर दिन फ़ोन नहीं आता| आप रोज़ फ़ोन करती हैं तो मेरे दोस्त मज़ाक बनाते हैं|”

“ठीक है नलिन, मैं सप्ताह में एक दिन कर लूँगी, या जब सुविधा हो तब तुम ही कर लेना”|

“ठीक है माँ, हर शनिवार को मेस ऑफ़ रहता है तो हमलोग बाहर लंका जाते हैं खाना खाने| मैं वहीं बूथ से बात कर लूँगा|”

“अपना ख्याल रखना बेटा”, कहकर सुमेधा ने फ़ोन रख दिया|

धीरे धीरे सुमेधा भी अपनी दिनचर्या में रमकर नलिन के बारे में थोड़ा कम सोचने लगी| किन्तु शनिवार को फोन का इन्तेजार अवश्य करती| दो महीने से सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था| अब नलिन का फर्स्ट सेमेस्टर होने वाला था तो नलिन ने कह दिया था कि वह फ़ोन न कर पाए तो सुमेधा चिन्ता न करे| एक शनिवार सुमेधा का मन नहीं माना तो उसने हॉस्टल के ऑफ़िस में फ़ोन किया| पता चला कि नलिन कमरे में नहीं, कहीं बाहर गया है| अगले रविवार भी वह बाहर था तो उससे बात नहीं हो सकी| परीक्षा के समय कहाँ घूम रहा है, किसी आशंका ने सुमेधा की नींद उड़ा दी| उसने उसी शाम को फिर से फ़ोन लगाया तो नलिन से बात हो गई|

“कहाँ गए थे नलिन?”सुमेधा ने पूछा|

“इस्कॉन टेंपल गया था माँ, कुछ दिन पहले कॉलेज के गेट पर वही ट्रेन वाले डैनियल मिले थे| उन्होंने ही कहा कि लॉर्ड कृष्णा का ध्यान लगाने से जिंदगी की कई बाधाएँ दूर हो जाती हैं|” ऐसा लग रहा था जैसे नलिन किसी ध्यानमग्न अवस्था में बोल रहा था| सुमेधा के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई|

“अभी तुम्हारी परीक्षा है बेटा, कृष्णा भी उसी की मदद करते हैं जो पढ़ता है| उस डैनियल के चक्कर में मत पड़ो नलिन| वह इसी तरह युवा पीढ़ी को बहकाकर कृष्णा का अनुयायी बनाता है, यह अब मेरी समझ में आ रहा| इस बार वह मिले तो वहाँ जाने से मना कर देना|”

“पर माँ, वह शनिवार को गेट पर मिल जाते हैं और कहते हैं कि रविवार को हम सबको कुछ देर इस्कॉन में कृष्णा का ध्यान करना चाहिए|”

इन सब चीज़ों से दूर रहने वाला नलिन आज कैसी बातें कर रहा था| सुमेधा ने नलिन की परवरिश बहुत अच्छे संस्कार देकर की थी| उसकी उम्र के दूसरे बच्चे जहाँ देर रात तक बाहर रहते, नलिन ने कभी ऐसा नहीं किया था उसकी भाषा हमेशा शालीन रहती थी| रैगिंग के दौरान भी गाली न बोल पाने के कारण कई दिनों तक दोस्तों के बीच वह हँसी का पात्र बना रहा था किन्तु अडिग रहा| अभिभावक से दूर हुए बच्चे पर कृष्ण-भक्ति का नशा चढ़ाकर डैनियल आखिर धूर्तता कर ही गया|

“अगली बार मना करना नलिन”|

“शायद न कर पाऊँ”, शायद नलिन विवश था डैनियल के सामने|

“तुम क्या चाहते हो नलिन?”

“मैं नहीं जाना चाहता, पर कोई शक्ति है जो मुझे वहाँ जाने के लिए प्रेरित करती है माँ |”

“ठीक है, अगले रविवार तुम इस्कॉन जाना, मैं तुम्हें वहीं मिलूँगी किन्तु डैनियल को यह पता नहीं चलनी चाहिए”, खतरे को भाँपती हुई सुमेधा ने अगला कदम सोच लिया था|

“ठीक है माँ, आप आना जरूर”, नलिन की आवाज में राहत सी दिखी|

ट्रेन बनारस पहुँच चुकी थी| सुमेधा स्टेशन से सीधे इस्कॉन चली गई| “हरे रामा हरे कृष्णा” पर झूमते हुए कृष्ण के अनुयायियों का झुंड , जाने किस दुनिया में लीन था| अधिकतर विदेशी लग रहे थे| जाने किस शांति की तलाश थी उन्हें| बहुत सारे दुःख दर्द होंगे , तभी मन से वे उस लोक का विचरण कर रहे थे जहाँ उनका अवचेतन मन सब कुछ भूल जाना चाहता था| उन विदेशियों के बीच थे कुछ मासूम भारतीय चेहरे जो स्वेच्छा से तो नहीं ही आए होंगे| अठारह उन्नीस साल के भारतीय बच्चे अशांति के उस स्तर तक नहीं जाते कि उन्हें खुद को भूलना पड़े| उन्हें डैनियल जैसे साधुओं ने यहाँ आकर झूमने को प्रेरित किया होगा|

सुमेधा बेसब्री से नलिन का इन्तेजार कर रही थी|

कुछ देर बाद नलिन डैनियल के साथ आता हुआ दिखा| सुमेधा कृष्ण की प्रतिमा की ओर मुड़कर खड़ी हो गयी और हाथ जोड़कर ”ओम क्लीं कृष्णाय नमः”का जप करने लगी मानो अपने कान्हा को कह रही हो कि मैं हूँ न आपकी भक्ति के लिए|

कुछ देर बाद जब वह मुड़ी तो देखा कि नलिन उस झूमने वाले समूह का हिस्सा बना चुका है| सुमेधा की आँखें नम हो गयीं|

“अरे आप” कहता हुआ डैनियल सामने खड़ा था|

“मेरे बच्चे को बख्श दो डैनियल”, वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी|

“मैंने किया ही क्या है| संसार एक मायाजाल है, उस जाल से निकलने में मैं हेल्प करता हूँ और क्या”

“नहीं डैनियल, तुम्हें नहीं मालूम कि कितने घरों के अरमानों को ध्वस्त करते हो तुम| ये मासूम बच्चे जब अपने पेरेन्ट्स की छत्रछाया से दूर होते हैं तो नादान होते हैं| ईश्वर भक्ति में उन्हें कोई बुराई नजर नहीं आती इसलिये बात मान लेते हैं तुम्हारी| जीवन की मुख्य धारा से उन्हें अलग करने का प्रयास न करो|”

“अध्यात्म भी एक धारा है,” वह सुमेधा को आश्वस्त करना चाहता था|

“हर उम्र की धाराएँ अलग अलग होती हैं| अध्यात्म की धारा इन नादान बच्चों के लिए नहीं| क्या इस धारा में बहकर तुम खुश हो डैनियल? क्या तुम्हें अपने माता-पीता, भाई- बहन याद नहीं आते?”

अचानक वह कहीं खो गया| शायद अपने घरवालों को याद कर रहा था| उस वक्त वह भी वैसा ही मासूम दिख रहा था जैसे कि नलिन|

सुमेधा कहती जा रही थी,”मैं इसी धारा में अपने भाई को खो चुकी हूँ| घर और विवाह के प्रति उसकी विरक्ति ने हमारे घर को खोखला कर दिया| मुझसे मेरा बेटा मन छीनो डैनियल,” सुमेधा उस समय एक दयनीय याचक की तरह हाथ जोड़कर खड़ी थी|

अचानक डैनियल हँस पड़ा, “जाओ, तुम्हारा पुत्र तुम्हें वापस करता हूँ|”

“सिर्फ मेरा नहीं, इन सभी पढ़ने वाले बच्चों को छोड़ दो जो यहाँ बेसुध झूम रहे| मैं बाहर इन्तेजार कर रही”, कहकर सुमेधा बाहर निकल गई| कुछ देर बाद करीब दस बच्चों को लेकर वह बाहर आया| सभी बच्चों को सम्बोधित कर वह बोल रहा था,”अभी तुमलोगों की पढ़ने की उम्र है| कृष्ण भक्ति का यह मार्ग हमेशा खुला रहेगा| पहले माता पिता के सपनों को साकार करो बच्चों| जिस देश में ऐसी माँएँ हों वहाँ के बच्चों को मुख्यधारा से अलग नहीं किया सकता|”

सुमेधा सभी बच्चों को लेकर चली| कुछ दूर जाकर वह और नलिन पीछे मुड़े| डैनियल वहीं खड़ा उनलोगों को देख रहा था| दोनो ने वहीं से हाथ हिलाया, डैनियल ने भी हाथ हिलाकर उन्हें विदाई दी और मंदिर की ओर मुड़ गया|

अप्रकाशित और मौलिक

ऋता शेखर ‘मधु’

२९/०३/२०१९



यह कहानी है उन युवाओं की जो जीवन की मुख्य धारा से जाने अनजाने अलग हो जाते हैं|

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

देह का तिलस्म - कहानी


देह का तिलस्म

चारों ओर निशा पसरी हुई थी| निशा के स्याह आँचल पर नन्हें नन्हें सितारे जगमग कर उसकी सुन्दरता बढ़ा रहे थे| एक पूरा चाँद मुस्कुराता हुआ निशा के साँवले मुख को अलौकिक सुन्दरता प्रदान कर रहा था| सृष्टि के निर्माता ब्रम्हा जी धरती पर सागर के किनारे एकांत में बैठे विचारमग्न थे| सिर्फ धरती का कठौर तल, हहराते सागर, चमकता सूर्य, लुभावने सितारे. शातल चाँद के अलावा भी कुछ चाहिए था जो पूरी सृष्टि को मनभावन और चलायमान बना सके| यह सोचते हुए ब्रम्हा जी हाथों में भीगे रेत लेकर सके गोले बनाने लगे| उसे विभिन्न आकार देकर कुछ को धरती पर रहने लायक गढ़ते, कुछ आकार जो समुद्र में रह सकें और कुछ को आसमान में उड़ने लायक बनाया| अब उनकी कल्पना में वे सारे आकार चलने , उड़ने और तैरने लगे| हर गढ़न में अब उन्हें यह ख्याल भी रखना था कि वे शरीर की वृद्धि करें और बाद में खुद जैसे जीवों का निर्माण भी करें ताकि उनकी कृतियों का अस्तित्व बना रहे| अब सवाल यह था कि इन सभी कृतियों में जीवन कैसे भरें| ये तो मात्र देह का निर्माण हुआ था| सोचते सोचते उन्होंने एक प्रकाश पुंज का निर्माण किया| वह पुंज ब्रम्हा जी के सामने आकर पूछने लगा,’प्रभु, मेरे अवतरण का प्रयोजन क्या है’

‘तुम सभी अदृश्य टुकड़ों में विभाजित हो जाओ और अपने पसंद की आकृतियों में समा जाओ| तुम्हारे समाहित होने से ये सभी आकृतियाँ जीवित हो जाएँगी|’’

‘’ लेकिन प्रभु, हम उन आकृतियों में कब तक कैद रहेंगे?’’

‘’सभी आकृतियों का निश्चित जीवन काल होगा| उसके बाद तुम्हें शरीर से मुक्ति मिल जाएगी| ज्योंहि तुम बाहर निकलोगे, वे आकृतियाँ मृत कहलाएँगी| जब तक तुम देह के अन्दर रहोगे, आत्मा या प्राण कहलाओगे|’’

‘’हे प्रभु! इतना बता दीजिए कि हम देह में समाने के बाद क्या व्यवहार करेंगे|’’

‘’पहले तुम सभी आत्माएँ अपनी देह धारण करो| उस देह के अनुरूप जो आचरण उचित होगा वही करना|’’

सभी आत्माओं ने एक एक आकृति ले ली| अब उस निर्जीव निस्तब्ध स्थान पर हलचल मच गयी|तरह तरह की ध्वनियाँ वातावरण में गुँजायमान हो गईं| कुछ वहीं धरती पर उछल कूद करने लगे, कुछ सागर में उतरकर मजे से तैरने लगीं| कुछ ने पंखों का इस्तेमाल किया और आकाश में उड़ गए| ब्रह्मा जी सब देखकर आनंदित होने लगे| तभी एक देह ने दूसरे पर हमला किया और उसकी देह को क्षत विक्षत कर दिया| उस देह के अन्दर की आत्मा आजाद हो गई| किन्तु वह दुखी भी थी क्योंकि आजाद होने के क्रम में देह ने जो यातना झेली वह असहनीय थी| ब्रह्मा जी ने हमलावर प्राणी को बुलाया और पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया|

‘’प्रभु, मुझे जो आकृति मिली उसे पेट भरने के लिए दूसरे पशु की देह चाहिए थी,’ इसलिए मैंने उस अनुरूप आचरण किया|ब्रह्मा जी चुप रह गए क्योंकि इसमें उस शिकारी देह की कोई गल्ती नहीं थी| उसके निर्माता तो वही थे| उधर आसमान में उड़ने वाली एक देह ने अपने से छोटी देह वाली एक आकृति को गिरा दिया था| सृजन के साथ विध्वंस का सिलसिला होते देख ब्रह्मा जी चिंतामग्न हो गए|

अब वे ऐसी आकृति का निर्माण करना चाहते थे जो आपस में प्यार से रह सकें| इसी क्रम में दो नन्हीं आकृतियाँ गढ़ी गयीं जो बिल्कुल एक समान थीं| उन्हें समान बुद्धि और समान ताकत भर दिए| एक खासियत और दी कि वह अपनी जिह्वा का उपयोग करके तरह तरह की आवाजें निकाल सकते थे| अपनी इस कृति पर ब्रह्मा जी निहाल हो गए| उन्हें पूरा विश्वास था कि इन देहों में जाने वाले प्राण प्यार से रहेंगे| अब उन्होंने सृष्टि को आगे बढ़ाने के ख्याल से उनकी काया में थोढ़ा सुधार किया और दोनों मिलकर सृष्टि को आगे बढ़ा सकें, इसके लिए थोड़े से अंग परिवर्तन कर दिए| अब उन्होंने आत्माओं को आज्ञा दी कि अपनी पसंद की किसी देह में प्रविष्ट हो जाओ| आत्माओं ने प्रभु की आज्ञा का पालन किया और देः में प्रविष्ट हो गए| देह और आत्मा का यह साथ अत्यंत आह्लादकारी साबित हुआ| दोनों एक दूसरे की ओर आकर्षित हुए और प्रेमपूर्वक रमणीय स्थल चुनकर रहने लगे|

अब ब्रह्मा जी निश्चिंत हो गए कि उनका काम पूरा हो गया| आखिरकार उन्होंने देह और आत्मा का सुन्दर समायोजन कर लिया था|

दिन बीत चले समय आने पर दोनों काया ने मिलकर नयी काया का निर्माण किया| जिस काया ने नन्ही काया को खुद में समेटकर रखा था वह उसकी देखरेख में व्यस्त हो गई| स्वयं को उपेक्षित होता देख दूसरी काया नाराजगी जाहिर करने लगी| अब उनके बीच उपालम्भों का आदान प्रदान होने लगा| जब बात असह्य होने लगीतो दोनों अपनी शिकायतें लेकर प्रभु के पास पहुँचे| प्रभु ने उनकी बातें सुनी और कहा,’ तुम दोनों ने मेरी उम्मीद को धराशायी कर दिया| आखिर ये शिकायतें कैसी|’

‘प्रभु, आपने एक काया में ममता भरी और वह नम्रता सीख गयी| दूसरे में ताकत थी, वह अहंकारी हो गया,’ममतामयी काया कह उठी|

‘प्रभु, अब यह सवाल जवाब करने लगी है| उसने बुद्धि का उपयोग शुरू कर दिया है| मैं उसे तर्क से नहीं बल्कि ताकत से ही हरा सकता हूँ,’ये अहंकारी देह की आवाज थी|

‘क्या तुम दोनों आत्माएँ प्रेमपूर्वक नहीं रह सकतीं,’ प्रभु अपनी ही बनायी रचना के सामने विनीत भाव से बोले|

‘रह सकते हैं, जब हम इस देहरूपी बंधन से आजाद हो जाएँगे| जब तक हम दोनों के पास काया, वाणी और बुद्धि रहेगी, तर्क वितर्क चलते रहेंगे| इन सबके बावजूद भी हम एक दूसरे का ख्याल रखेंगे| यह देह का तिलस्म है प्रभु जी| अब आप भी इसमें कुछ नहीं कर सकते,’यह कहकर दोनों आत्माएँ ब्रह्मा को उनके ही तिलस्म में हैरान करके

एक दूसरे का हाथ पकड़कर मुस्कुराती हुई ओझल हो गईं|

-ऋता शेखर ‘मधु’

मानव तभी तक जीवित है जब तक उसके शरीर में आत्मा का वास है...वरना मृत है| आत्माओं का व्यवहार देह पाने के बाद बदल क्यों जाता है...चिंतन से उपजी एक कहानी आपको भी अवश्य पसंद आएगी|अपनी राय देंगे तो लेखन में सुधार जारी रहेगा, धन्यवाद मित्रों|

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

पसंदगी की रेंज

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‘हलो, मिस्टर वर्मा, मैने शादी डॉट कॉम पर आपके पुत्र के बारे में पढ़ा| आपको मैं अपनी बेटी की आई डी भेजती हूँ| आप देख लें और पसन्द आए तो हमलोग रिश्ते के बारे में सोच सकते हैं,’ ऊधर से मधुर आवाज में एक महिला बोल रही थीं|

‘जी, बताइए, मैं अपनी ओर से देख ही लेता हूँ क्योंकि अभी ऑनलाइन हूँ| आप चाहें तो कुछ देर लाइन पर बनी रह सकती हैं,’ वर्मा जी ने कहा और साथ ही दिए गए आई डी पर क्लिक भी किया| वहाँ एक प्यारी सी लड़की मोहक मुसक्न से सजी दिख रही थी| पूरी प्रोफ़ाइल देखने के बाद वर्मा जी ने कहा’’, मैडम,लड़की मुझे तो पसन्द आ रही| अब आप अपनी बिटिया का मोबाइल नम्बर दीजिए|’’

‘क्या !,’उधर से अचंभित स्वर उभरा|

‘देखिए मैडम, वह जमाना गया जब माता पिता शादियाँ तय करते थे और बाद में बच्चों की राय ली जाती थी| बच्चे भी ज्यादा विरोध नहीं करते थे| अब बच्चे चुनाव करते हैं, बाद में माता पिता की राय ली जाती है| आप बिटिया का नम्बर दें, मैं अपने पुत्र आशु को दे दूँगा| अपनी सुविधा से दोनों बात कर लेंगे| यदि दोनों ने एक दूसरे के विचारों को पसन्द किया तो फिर हमलोग आगे की बात कर लेंगे| दोनों ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में उच्च पदों पर हैं| उनकी पसन्द ही सर्वोपरि है,’ थोड़े से आहत स्वर में मिस्टर वर्मा बोल रहे थे|

इसके पहले भी दो जगहों पर बात आगे बढ़ी थी| एक जगह लड़की ने छोड़ा क्योंकि उसे घर में किसी भी बड़े बुज़ुर्ग को रखना स्वीकार्य नहीं था| एक जगह लड़के ने छोड़ा क्योंकि लड़की ने अँग्रेजी स्कूल से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी| मिस्टर वर्मा के अनुसार ये दोनों ही बातें कोई मायने नहीं रखती थीं|

“लड़की किसी के साथ नहीं रहना चाहती तो न रहे| समय के साथ और जरूरतों के अनुसार स्वयं सब ठीक हो जाता है| हर बात को गणित की तराजू पर तौलने से क्या डंडी सीथी मिलेगी ? नहीं न, पहले की शादियों में सामंजस्य बिठा ही लिया जाता था|”

“लेकिन पापा, हम सामंजस्य क्यों बिठाएँ| जब विचार ही नहीं मिलेंगे तो साथ कैसे रहेंगे,”वर्मा जी किसी भी दलील से पुत्र को नहीं समझा पाए|

‘आशु, जिस लड़की ने अँग्रेजी स्कूल से शिक्षा नहीं पाकर भी अपनी मेहनत के बल पर इतनी अच्छी नौकरी पाई है उसे तुम कमतर कैसे आँक सकते हो,’ उस दिन भी पिता पुत्र में वैचारिक मतभेद हो गया था| बाद में पिता ने ही चुप्पी का सहारा लिया|

मन में घुमड़ते हुए विचारों के समंदर में डूबे मिस्टर वर्मा यह भूल गए कि वह फ़ोन पर हैं|

“जी, मैं नम्बर दे देती हूँ,” यह सुनकर उनकी तन्द्रा टूटी|

उन्होंने नम्बर नोट किया और व्हाट्स एप पर आशु को भेज दिया| तुरन्त उभरी दो नीली रेखाओं ने संदेश पढ़ लिये जाने की चुगली कर दी| पहले इस तरह के संदेश पर आशु बिना विलम्ब के फ़ोन करता था किन्तु इस बार इन्तेज़ार के बाद भी उसने फ़ोन नहीं किया|

‘ अच्छा ही है, स्वयं बात कर लेगा तो बताएगा’, यह सोचकर वर्मा जी अपने काम में व्यस्त हो गए|

हर दिन बातें होतीं आशु से, पर उस लड़की के बारे में न पिता ने पूछा और न ही पुत्र ने बताया| एक दिन आशु ने कहा,”पापा, मैं एक महीने से लगातार उस लड़की से बात कर रहा हूँ| लगभग सभी विषयों पर हमारे विचार मिलते हैं| मुझे लगता है कि अब हमें आमने-सामने एक दूसरे से मिल लेना चाहिए| आप उसकी माँ को कहिए कि वह भी आ जाएँ और आप भी चलिए|”

सीधे सपाट शब्दों में कही गई बात वर्मा जी को अच्छी लगी| बेकार की संवेदनाओं में बहकर तो हमारी पीढ़ी बात करती थी| घर में ग़लत को कभी ग़लत कहने की हिम्मत नहीं होती थी|

दिन , समय, स्थान निश्चित किया गया| नियत समय पर सभी पहुँच गए| लड़की जैसी फ़ोटो में थी वैसी ही दिख रही थी| कुछ देर तक बातें हुई , उसके बाद आशु और वह लड़की थोड़ा अलग हट कर बातें करने लगे| वर्मा जी और लड़की की माँ ने तबतक विवाह की सारी रूपरेखा तय ली| घर में मण्डप सजेगा, शहनाइयाँ बजेंगी, इसकी प्रसन्नाता दोनों अभिभावकों को आह्लादित कर रही थी|

थोड़ी देर बाद दोनों वापस आ गए| दोनों के चेहरे पर तनाव की रेखाएँ साफ दिख रही थीं| वर्मा जी का दिल धड़क उठा| लक्षण ठीक नहीं लग रहे थे|

“पापा, अभी हम किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकते| मैं अपना देश नहीं छोड़ सकता| यदि हमारे देश में कुछ कमी है तो हम सभी मिलकर सुधार सकते हैं| देश को हम सभी की जरूरत है| ये क्या बात हुई कि पढ़े लिखे हैं अपने भारत में और सपनों का घर सजाएँ विदेश की धरती पर| यह मुझसे नहीं होगा|”

लड़की सिर झुकाए सुन रही थी| उसने कुछ नहीं कहा| माँ भी कुछ कह पाने में असमर्थ थीं|

इस बार मिस्टर वर्मा ने पुत्र की पीठ को सराहना के भाव से थपथपा दिया| आज पुत्र को वह गर्व भरी दृष्टि से देख रहे थे| पूर्व के मतभेद की दीवार गिर चुकी थी|

औपचारिक अभिवादन के बाद सभी जाने के लिये दरवाजे की ओर बढ़े| आशु जल्दी ही वहाँ से निकल जाना चाहता था| उसका मन अपने आप से ही क्षुब्ध था| बातें करने के दौरान उसने कल्पना भी नहीं की थी कि विदेश में बस जाने का प्रस्ताव भी रखा जा सकता है वरना वह पहले ही नकार देता| उसका गणितीय समीकरण गलत साबित हो गया था पर पिता की थपथपाहट से कुछ शांति अनुभव कर रहा था|

“आशु, मैं तो बस तुम्हारी परीक्षा ले रही थी| मैं भी अपने देश से उतना ही प्यार करती हूँ जितना तुम|”

अचानक आई इस आवाज पर आशु ने पलट कर देखा| लड़की मुस्कुराती हुई खड़ी थी| इधर समधी समधन एक दूसरे को बधाइयाँ दे रहे थे|

-ऋता शेखर “मधु”

बुधवार, 15 अगस्त 2018

बाबला- कहानी

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बाबला       
(कहानी पर आपकी राय बहुमूल्य है...इस विधा पर काम करना ठीक है या नहीं? कमियाँ/खूबियाँ बताएँ, धन्यवाद )

बेला की खुशियाँ थामे नहीं थम रही थी| चारो ओर से बधाइयों का ताँता लगा था| मम्मी पापा की इकलौती लाडली का मैट्रिक बोर्ड का परिणाम आ चुका था| अपने स्कूल में तो बेला ने टॉप किया ही था साथ ही जिले में भी दूसरे स्थान पर आई थी| बेला थोडी गम्भीर प्रकृति की थी पर इतनी भी नहीं कि खुशियाँ मनाने के समय नाच गा न सके| पिता की राजकुमारी बिटिया ने उनका नाम रौशन किया था| सबसे कहते फिर रहे थे,”कौन कहता है कि बेटियों से पिता का सर गर्व से ऊँचा नहीं होता| आज तो मैं सातवें आसमान पर हूँ|”

बेला के पिता उस जमाने के थे जब घर की बहुओं का नौकरी करना अच्छा नहीं माना जाता था| किन्तु वह औरतों की आजादी के समर्थक थे| उन्होंने अपनी इंटर पास पत्नी को स्नातक की डिग्री दिलवाई और शिक्षण प्रशिक्षण कोर्स करवाया| उसके बाद नौकरी के लिए राजी हुए और बेला की माँ विद्यालय में शिक्षिका बन गयी|

तब तक बेला का जन्म हो चुका था| बेला के कोख में आने से लेकर जन्म तक और उसके लालन पालन में बेला की माँ को पति और संयुक्त परिवार का भरपूर सहयोग मिला| विचारों के अग्रणी पिता ने दूसरी संतान को लाना उचित नहीं समझा| पिता की लाडली पढने में काफी होशियार थी| विद्यालय के हर कार्यकलाप में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती और पुरस्कार जीतती| विद्यालय में सबकी चहेती बन गई थी वह|

समय पंख लगाकर तेजी से उड़ चला था| बिटिया की पढाई के लिए हर संभव सहयोग के लिए तत्पर रहते| बेला के रिजल्ट ने साबित कर दिया था कि इस तरह के परिणाम के पीछे घर का वातावरण भी बहुत सहयोगी होता है|

घर में आयोजित हल्के फुल्के समारोह में कुछ रिश्तेदार और पड़ोसी शामिल थे|

‘हलो बेला, बहत बहुत मुबारक हो| और मिस्टर वर्मा, आपको भी बहुत बधाई हो| बिटिया के रिजल्ट से हम सभी बहुत गर्व का अनुभव कर रहे हैं|’ पड़ोस में नए आए अंकल को बेला नहीं पहचानती थी| वह ‘धन्यवाद’ कहकर आगे बढ़ गई|कुछ देर बाद वह अंकल फिर नेहा के सामने थे,’ देखो बेटा, यह है मेरा बेटा बाबला|’

‘अच्छा! हाय”, कहकर बेला ने नमस्ते की मुद्रा में हाथ जोड़ा| उसके बाद बेला ने महसूस किया कि वह जिधर भी जा रही है , उस बाबला की नजरें निरंतर उसका पीछा कर रही हैं| कुछ देर उसने अनदेखी की| बाद में वह असहज महसूस करने लगी| उस वक्त वह यह बात किसी से कह भी नहीं सकती थी| पार्टी खत्म होने से कुछ देर पहले ही बेला अपने कमरे में आकर बैठ गई|

‘’ अरे यार बेला, चल न डांस करते हैं’,सहेली सुवर्णा चहकते हुए कमरे में आ गई|

‘’नहीं सुवर्णा, मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही, तू पार्टी एंजॉय कर| मैं थोड़ी देर में आती हूँ|’ बेला को विश्वास था कि तबतक वो लड़का बाबला चला जाएगा|

थोड़ी देर बाद वह कमरे से बाहर आई और सच में उसे न पाकर बहे खुश हुई|

‘बेटा, अब कहाँ एडमिशन लेने का इरादा है’, एक आंटी ने पूछा|

‘महिला कॉलेज या फिर साइंस कॉलेज में’

‘ठीक है बेटा, मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं,’कहकर आंटी ने प्यार से उसे देखा|

दूसरे दिन बेला ने दोनो महाविद्यालयों में फॉर्म भर दिया| प्रथम सूची में ही उसका नाम आ गया, जैसा कि होना ही था| बेला की इच्छा थी कि वह विज्ञान महाविद्यालय में नाम लिखवाए किन्तु पहली बार उसने महसूस किया कि बंधन क्या होता है| दादाजी ने साफ शब्दों में मना कर दिया कि सहशिक्षा वाले कॉलेज में नहीं पढ़ेगी| घर में कोई विरोध न कर पाया या शायद पिताजी भी न चाहते होंगे| तभी तो यह कहकर टाल दिया कि दादा की मर्जी के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते| माँ ने भी चुप्पी साध ली| थोड़े बेमन से उसका नाम लिखवा दिया गया|

जब से क्लास शुरू होना था, उसके एक रात पहले का सारा समय रोमांच में बीत रहा था| बेला को खुशी थी कि अब वह स्कूल ड्रेस के बंधन से आजाद हो रही| समय पर प्रार्थना भी नहीं करना होगा| पूरे दिन भी नही रहना होगा जैसे स्कूल में बाँध कर रखा जाता है|अब वह अपनी मर्जी की मालकिन हो जाएगी| तरह तरह के ड्रेस के बारे में सोचती हुई वह सो गई| सुबह उठी तो जल्दी जल्दी उसने सारा काम किया क्योंकि समय पर कॉलेज बस पकड़ना था| समय पर बस स्टॉप पर पहुँच गई| वहाँ पर सीनियर लड़कियाँ भी थीं|

‘वाह बेला, चुड़ीदार में तो बहुत जँच रही’, एक सीनियर दीदी ने कहा तो बेला मुस्कुरा उठी|

‘अच्छा बेला, तुम्हें यह फिल्मी गीत याद है...रेशमी सलवार कुर्ता जाली का’

‘रूप सहा नहीं जाए नखरे वाली का’, आगे की पंक्ति गाते हुए बेला हँस पड़ी| हँसते हुए उसकी नजर थोड़ी दूर खड़े लड़कों पर पड़ गयी| वे सब भी बस के इंतेजार में खड़े थे| वह बाबला भी वहाँ खड़ा था और उसे एक टक देखे जा रहा था| बेला मुँह फेरकर खड़ी हो गई और सोचने लगी ”तो अब ये भी यहीं पर रहेगा, पर यह मुझे घूरता क्यों है’’| तब तक एक के बाद एक दो बसें आ गईं| एक बस लड़कियों की थी और दूसरी लड़कों की|

बस के अन्दर बेला ने राहत की साँस ली| दोनों बसें आपस में रेस लगाती चल रही थीं| कभी लड़कों की बस आगे होती तो लड़के चिल्लाते हुए अपनी खुशी जाहिर करतीं| जब लड़कियों की बस आगे जाती तो लड़कियाँ भी कहाँ पीछे रहतीम| उस समय बस शोर में डूब जाता| करीब पैंतालीस मिनट का समय लगा महिला महाविद्यालय आने में| सारी लड़कियाँ उतरने लगीं| बेला ने देखा कि लड़कों की बस आगे जा चुकी थी|

रंग बिरंगे कपड़ों में नई लड़कियों का हुजूम कॉलेज के अन्दर दाख़िल होने लगा|

‘ओए लालपरी, इधर अइयो जरा,एक आवाज आई|

बेला ने इधर उधर देखा|

‘अरे, इधर उधर क्या देख रही हो| इधर आओ मेरी लालपरी’,और उसके बाद लड़कियों का एक झुंड खिलखिला उठा|

बेला सकुचाती हुई वहाँ गई|

‘बोलिए दीदी’

“दीदी किसको बोल रही’

‘जी आपको,आप हमसे सीनियर हो न’

‘ये कैसे जाना कि हम सीनियर हैं’

बेला चुप रही| उसे अचानक याद आया कि सुवर्णा बता रही थी कि पहले दिन रैगिंग भी होता है| तब ज्यादा जवाब नहीं देना चाहिए|

‘ अब ये बताओ, ये ड्रेस कितने में ली,’ नया सवाल आया|

‘जी, माँ ने खरीदी है’’

‘ओए, यह तो दूध पीती बच्ची है| अभी तक माँ इसके कपड़े खरीदती है’, इतना कहकर वह ठठाकर हँस पड़ी और साथ ही हँस पड़ीं उसकी साथी लड़कियाँ| बेला रुआँसी हो गई| उसने इधर उधर देखा| सामने से वही दीदी आ रही थी जो बस स्टॉप पर मिली थी|

‘क्यों तंग कर रही बेचारी को, अच्छा बेला, एक गाना सुना दो हम सबको’

‘पर हमें तो गाना नहीं आता’,

‘वही सुना दो जो स्टॉपेज पर गा रही थी|

‘अच्छा, रेशमी सलवार कुर्ता जाली का....’बेला ने रुकते हुए किसी तरह से गाया|

‘रूप सहा नहीं जाए नखरे वाली का...’इस बोल को पूरा करते हुए दीदी ने कहा, अब जाओ|

‘क्यों जाने दिया, अभी और रैगिंग लेनी थी न,’ बेला ने जाते जाते सुना|

‘नहीं जी, सीधी है बेचारी, देखा नहीं कैसी रोनी सूरत बना ली थी उसने|’

आज तो दीदी ने बचा लिया, यह सोचती हुई वह आगे बढ़ी| तबतक उन शैतान लड़कियों ने दूसरा शिकार ढूँढ लिया और उसके पीछे पड़ गईं|

वह पहला दिन गुजर गया| नियत समय पर बस भी आ गई| स्टॉप पर वह उतरी और घर जाने लगी| कुछ दूर आगे बढ़ने पर उसने महसूस किया कि कोई उसे देख रहा है| वह झट पीछे मुड़ी तो देखा कि सड़क के पहले मकान की गेट पर वह खड़ा था| तेज गति से बढ़ती हुई आगे जाकर मुड़ी तब उसकी सांस आई|

दूसरे दिन, तीसरे दिन वैसा ही हुआ|

‘’माँ, जब मैं आती हूँ तो आप भी स्टॉपेज पर रहा करो,’बेला माँ से बोली|

‘’क्यों बेटा, क्या बात है’’

‘’वो वो...’इसके आगे वह कह नहीं पाई|

दूसरे दिन जब वह स्टॉप पर पहुँची तो माँ खड़ी थी| वह निश्चिंत होकर चलने लगी| किन्तु वह नजर नहीं आया| शायद माँ के कारण वहाँ पर नहीं था| माँ ने भी कुछ नहीं पूछा|

कॉलेज जाना आना बेला के लिए डरावना होता जा रहा था| लगता है माँ यह सब समझ पा रही थी पर बात क्या है यह जानने में असमर्थ थी| बेला की माँ ने अब दूर से ही नजर रखनी शुरू की| दो तीन दिनों में ही सारा माजरा समझ गयी|

‘बेला, कहो तो मैं उसके घर जाकर उसकी माँ से बात करूँ’|

‘पर क्या बोलोगी माँ, वह कुछ अभद्रता तो नहीं करता न| पर उसका मुझे लगातार देखते रहना अच्छा नहीं लगता| मान लो वो बदमाश हुआ तो कहीं तेजाब...या’

‘न न बेटा, ऐसा नहीं कहते| मैं बात करती हूँ न उससे’|’

‘पर क्या’, इसका जवाब माँ के पास भी नहीं था| कहीं उससे कुछ कहूँ तो बेला के बारे में कुछ उल्टा सीधा कहकर बदनाम न करे या सरेआम दुपट्टा न खींच ले| उस वक्त लड़कों की यह शैतानी प्रायः चलती थी| आज का जमाना नहीं था उस समय, अब तो दुपट्टे भी गुमनामी में जी रहे|

एक दिन बेला कॉलेज से घर पहुँची तो माँ पापा किसी लड़के के बारे में बात कर थे| बेला ने सुना कि लड़का अच्छी नौकरी करता है| घर भी संभ्रांत है| बेला अचकचा कर पूछ बैठी, ‘ये किस लड़के की बात कर रहे आपलोग’

‘तेरे रिश्ते की’

‘क्या, अभी तो मुझे बहुत पढ़ना है’

‘पढ़ लेना बेटा, पढ़ने से कौन रोकता है| शादी के बाद भी पढ़ा जा सकता है| इज्जत से बेटी विदा हो जाए इससे बढ़कर क्या हो सकता है,’ शायद उस लड़के का भय माँ को भी सताने लगा था|

जिस दिन बेला की बारात दरवाजे पर खड़ी हुई उस दिन बेला की फाइनल परीक्षा थी जो वह दे न सकी| दिल में अपार दुःख लिए उस बाबला को कोसती हुई ससुराल के लिए रवाना हो गई|

करीब दो वर्षों के बाद बेला मायके आयी|उसने फिर से इंटर की परीक्षा के लिए फॉर्म भरा था| छूट गई पढ़ाई को वह पुनः थामना चाहती थी जबकि यह आसान नहीं था| पूरे दो महीने की इजाजत मिली थी मायके में रहने की|

जिस दिन वह आयी, शाम को माँ कहीं जाने की तैयारी में थीं |

‘कहाँ जा रही माँ’

‘उस बाबला की बेटी की छठी है , उसकी माँ ने बुलाया है|’

बाबला का नाम सुनते ही बेला के चेहरे पर कड़वाहट फैल गयी|

‘मैं भी चलूँ माँ’, खुद को संयत करते हुए उसने पूछा|

‘चलो’

जब वह वहाँ पहुँची, बाबला की नजर फिर उसे एकटक देखने लगी|

अब बेला को डर नहीं लग रहा था|

‘’क्या कर लेगा, वह खुद बेटी का पिता बन गया है| अब उसे पता चलेगा कि बेटी वालों पर क्या बीतती है,’’ यही सब सोचती हुई रस्म वाले कमरे में गयी|

उसने बिटिया को बेला की गोद में देते हुए कहा,’’इसे आशीर्वाद दो बेला’’|

‘तुझे जीवन में कोई बाबला न मिले जिससे तेरी पढ़ाई छूट जाए’ फुसफुसाते हुए बेला ने कहा|

बाबला को उसके अस्फुट शब्द सुनाई न पड़े|

उसने कहना जारी रखा,’’ बेला, हम सिर्फ पाँच भाई हैं| इसकी कोई बुआ नहीं| काजल का रस्म तुम ही पूरा कर दो न| मुझे शुरु से ही तुम में बहन जैसा फ़ील आता था किन्तु कभी कह न सका| यह संयोग है कि आज तुम आ गई| और यह है राखी जो मैं खरीद कर रखा करता था किन्तु इसे मेरी कलाई पर बाँधने वाली कोई बहन नहीं थी|’’

बेला जड़वत् बैठी रही| उसकी नजरों से उमड़ते स्नेह को वह झेल न सकी और खुद भी आँसू बहाने लगी|

--ऋता शेखर ‘मधु’

शुक्रवार, 22 जून 2018

पुरस्कार

पुरस्कार 

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लगभग चार वर्ष पहले अनीता की नियुक्ति मध्य विद्यालय में हुई थी| जिस दिन वह विद्यालय में योगदान देने गईं , सभी शिक्षक और बच्चे बहुत खुश हुए थे क्योंकि वहाँ गणित के लिए कोई शिक्षक न था| 
योगदान देने के बाद प्रधानाध्यापिका ने उन्हें बैठने को कहा और बोलीं, “अनीता जी, आप कल से क्लास लीजिएगा| हम आपको आठवीं कक्षा की क्लास टीचर बनाएँगे|" 
उसके बाद उन्होंने एक बच्चे को पुकारा,”रोहित बेटा, ये नई मैडम आई हैं| जरा बाहर चाय वाले को कह दो कि चाय दे जाए|’ 
“जी मैम, “कहकर वह बाहर गेट पर के चायवाले को कह आया| 
“पर आपने बच्चे को क्यों भेजा,”बात अनीता के गले से न उतरी| 
“मध्य और प्राथमिक विद्यालयों के लिए सरकार ने चपरासी और क्लर्क का पद नहीं रखा है| इसलिए कुछ काम बच्चों से भी करवा लेते हैं|’जवाब सुनकर अनीता ने उनकी लाचारी को समझा| 
कुछ देर बाद किसी कागज की फोटो कॉपी करवाने और मध्यान्ह भोजन के लिए दाल मँगवाने के लिए उन्होंने रोहित को भेजा| 
“मैम, आप बार बार रोहित को ही क्यों भेजती हैं काम के लिए| किसी अन्य को भी भेजिए,”अनीता ने जिज्ञासा प्रकट की| 
“क्योंकि वह स्कूल का सबसे जिम्मेदार बच्चा है,” कह कर वह आफिस में चली गईं| 
दूसरे दिन अनीता समय से कुछ पूर्व विद्यालय पहुँचीं| उन्होंने देखा कि रोहित भी आ चुका था| उसने विद्यालय के सभी कमरों के ताले खोले| कुछ कुर्सियाँ निकाल कर बाहर बरामदे में रखी| प्रार्थना सत्र समाप्त हुआ तो सभी बच्चे अपनी अपनी कक्षा में चले गए| 
अनीता रजिस्टर लेकर आठवीं क्लास में गई| सबसे पहले बच्चों के स्तर को जाँचने के लिए उसने गणित का एक सवाल दिया| रोहित ने झटपट बना कर दिखा दिया| अनीता ने बोर्ड पर फिर दूसरा सवाल दिया| सभी बच्चे हल करने लगे| तभी बाहर से रोहित की पुकार हुई| 
“सुनकर आता हूँ मैम, “कहकर वह चला गया| अनीता ने उसकी कॉपी देखी| वह आधा सवाल हल कर चुका था| रोहित वापस आकर उत्तर पूरा करने लगा| पाँच मिनट बीत गये| दूसरे बच्चों ने तबतक दिखा दिया| रोहित के माथे पर पसीने की बूँदें थीं| 
‘ क्या हुआ रोहित, नहीं बन रहा क्या”,अनीता ने पूछा| 
“मैम, बार बार भाग देने में गल्ती हो जा रही|” 
अनीता समझ गई कि ध्यान भंग होने की वजह से ऐसा हो रहा| वह रोहित से कुछ कहने ही वाली थी कि बाहर से फिर बुलावा आ गया| इस बार रोहित ज्यों ही उठा, अनीता ने उसे बैठकर सवाल हल करने को कहा और स्वयं बाहर चली गई| 
“आप क्यों आ आईं क्लास छोड़कर,” हेड मैम को अनीता का आना अच्छा नहीं लगा था| 
“रोहित भी तो क्लास छोड़कर ही आता मैम| बताइए, क्या करना है| मैं कर देती हूँ| मैं अपने क्लास से पढ़ाई के दौरान किसी को निकलने नहीं दूँगी|” दृढ़ता से अनीता ने कहा| 
“वैसा कुछ काम नहीं है, आप जाइए,” अनीता वापस आ गई| रोहित ने वह सवाल हल कर लिया था| उसकी कॉपी देखते हुए अनीता ने पूछा,”देखो रोहित, काम करना अच्छी बात है किन्तु इससे एकाग्रता भंग होती है, तुमने देखा न अभी|पढ़ने वाले बच्चों को हमेशा पढ़ाई पर ही एकाग्र रहना चाहिए|” 
“किन्तु मैम, मुझे बुलाया जाए तो क्या करूँ, क्या कहूँ|” 
“देखो बेटा, तुम वे सारे काम लंच ब्रेक में भी कर सकते हो न| सुबह भी मैं बच्चों की पारी बनाकर विद्यालय खोलने की जिम्मेवारी बाँट दूँगी| सुबह का समय भी पढ़ाई में लगाया करो| पढ़ाई ही तुम्हारा भविष्य है| दसवीं में अच्छे नम्बर नहीं आए तो अच्छी जगह दाखिला नहीं मिलेगा|” 
उस दिन के बाद से रोहित को बीच कक्षा से नहीं बुलाया गया| आठवीं पूरी करके वह किसी दूसरे शहर चला गया था जहाँ उसके पिता का तबादला हो गया था| 
दसवीं की बोर्ड परीक्षा का परिणाम आ चुका था| विद्यालय में जिला शिक्षा पदाधिकारी का निमंत्रण पत्र आया हुआ था| बोर्ड परीक्षा में जिलास्तर और राज्यस्तर पर अच्छा रैंक लाने वाले बच्चों को आज सरकार की ओर से सम्मानित किया जाना था| वहाँ जाने की जिम्मेदारी अनीता को सौंपी गई| मंच पर कार्यक्रम शुरु हो चुका था| बच्चे आते और अपना सम्मान शिक्षा मंत्री से लेकर वापस चले जाते| अनीता का ध्यान आज रोहित की ओर जा रहा था| पता नहीं रोहित को कितने प्रतिशत नम्बर आए होंगे, बार बार यह बात जेहन में आ रही थी| 
“और जिला स्तर पर प्रथम स्थान पाने वाले बच्चे का नाम है, रोहित कुमार”, मंच पर आनेवाला बालक सम्मान ग्रहण कर चुका था| 
उससे पूछा गया,”तुम अपनी सफलता का श्रेय किसे देना चाहोगे|” “अनीता मैम को,”सुनकर अनीता की तंद्रा अचानक भंग हुई| 
“यदि अनीता मैम यहाँ हैं तो मंच पर आने की कृपा करें| मैं उनका आशीर्वाद लेना चाहता हूँ|” हॉल के पिछले सीट पर बैठी अनीता रोहित को पहचान नहीं पाई थी| 
अब उसके कदम मंच की ओर बढ़ रहे थे, आख की कोरों पर आई बूँदें ढलक जाना चाहती थीं| 
“मैम, आपने मुझे समझाया न होता तो आज मैं यहाँ नहीं होता,” कहते हुए रोहित अनीता के पैरों पर झुक गया| तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूँज रहा था| अनीता को लग रहा था जैसे रोहित ने उसे बेस्ट टीचर का पुरस्कार दिया है| 
@ऋता शेखर ‘मधु’

रविवार, 26 अगस्त 2012

बहू, घर चलो...


http://www.rachanakar.org/2012/08/51.html
रचनाकार पर कहानी प्रतियोगिता आयोजन में मेरी यह कहानी शामिल की गई है|
मैं अनु जी एवं वंदना गुप्ता जी की आभारी हूँ जिन्होंने रचनाकार पर इस कहानी को अपनी बहूमूल्य राय से सुशोभित किया है|आप भी पढ़ें...
बहू, घर चलो...

रात बीतने को आई किन्तु वकील साहब की आँखों में नींद नहीं थी| सारी सात वे अँधेरे में ही कमरे की छत की ओर आँखें गड़ाए ताकते रहे| कभी करवट बदलते, कभी उठकर बैठ जाते| लग रहा था बहुत ही उधेड़बुन में थे| जिन्दगी में अक्सर दोराहों का सामना हो जाता है जिनमें किसी एक रास्ते को चुनना बहुत कठिन लगता है| किन्तु निर्णय तो लेना ही पड़ता है उन्हें, जो सभ्य और संस्कारी होते हैं| जिनमें दूरदर्शिता नहीं होती उनके सामने कभी दोराहे नहीं आते...जीवन जैसे चल रहा है, बस ठीक है|
    वकील साहब का एक सुखी परिवार था| सुंदर पत्नी और शादी के लायक एक बेटा था जिसे वे बहुत प्यार करते थे| गाँव में अपनी खेती-बाड़ी थी, प्रैक्टिस भी खूब चलती थी| धनाढ्‌यों में गिनती होती थी उनकी| महल जैसा घर और घर में नए मॉडल की दो गाड़ियाँ थीं, एक उनके लिए और दूसरी उनके सुपुत्र के लिए| वकील साहब दिन भर किताबों में उलझे रहते| बेटे की देख-रेख का सारा भार उनकी पत्नी पर था| नवाबों की तरह वह पल रहा था| जब भी पैसे की जरूरत होती माँ इन्कार नहीं करती| बेटे से सख्ती नहीं कर पाती थीं| नतीजा यह रहा कि वह बिगड़ैल नवाब के रूप में जाना जाने लगा| किसी तरह से उसने ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की थी| आकर्षक डीलडौल, घुँघराले बाल, गोरा चिट्टा था| बचपन से कभी अभाव नहीं जाना था इसलिए पैसे को पानी की तरह बहाता था| गुस्सा तो नाक पर ही रहता| जब वह किसी तरह की कोई नौकरी में नहीं जा सका तो वकील साहब ने बिजनेस में लगा दिया| यहाँ वह सफल हुआ, क्योंकि उस बिजनेस में दबंग की ही जरुरत थी|
   इतने धनी-मानी घर में अपनी बेटी को देने के लिए कई पिता उत्सुक थे| खूब रिश्ते आने लगे| अन्त में हर प्रकार से जिसे योग्य समझा गया वह निहारिका थी| लड़की की सारी खूबियों से सुशोभित...अर्थात लम्बी , गोरी, घर के कामकाज में निपुण, सुशील और आज्ञाकारिणी| सभी खुश थे| वकील साहब की पत्नी बड़े ही शौक से शादी की खरीदारियाँ कर रही थीं| निश्चित समय पर विवाह संपन्न हुआ| घर में खूब रौनक आ गई| इस घर में आकर निहारिका भी अपने भाग्य सराह रही थी|
  सुंदर पत्नी पाकर वकील साहब का बेटा भी प्रसन्न था| हमेशा दोस्तों के साथ घूमने के बजाय घर में ही रहता| किन्तु अपने बेटे के स्वभाव को लेकर वकील साहब सदा सशंकित रहते| बहू की हर जरूरत और सुख सुविधा पर नजर रखते| बहू भी सास-ससुर की सेवा में तल्लीन रहती| समय बीता...वकील साहब और उनकी पत्नी दादा-दादी बने| पोते को गोद में ले फूले न समाते थे| दिन बीतने लगे|
एक दिन वही हुआ जिसका डर था...सभी लोग डायनिंग टेबल पर बैठे खाना खा रहे थे| बेटे ने निहारिका को गरम पराठा लाने को कहा...तभी मुन्ना रोने लगा| निहारिका उसे संभालने चली गई| नवाबज़ादे ने इसे अपनी तौहीन समझा और खाने की प्लेट जमीन में पटक दिया| माता-पिता तो उसके गुस्से से वाकिफ़ थे ही, किन्तु निहारिका के लिए पति का यह रूप नया था| वह सहम गई और रोने लगी| वकील साहब ने भी खतरे की घंटी को समझा| किसी तरह से बहू को समझाया| निहारिका बच्चे के कारण उसपर अधिक ध्यान नहीं दे पाती थी| इस कारण वह रईसजादा अधिकतर समय घर के बाहर बिताने लगा और बुरी  संगति में पड़ने लगा|
  उसके बाद इस तरह की घटनाएँ अक्सर घटने लगीं| मैके के अच्छे संस्कार लेकर आई थी, इसलिए घर को अखाड़ा नहीं बनाना चाहती थी| वह हरसंभव चुप रहने का प्रयास करती| निहारिका की चुप्पी वकील साहब के बेटे की हिम्मत बढ़ाती गई| अब वह कभी- कभी निहारिका पर हाथ भी उठा देता| यह निहारिका को बहुत बुरा लगता फिर भी सास- ससुर का ख्याल करके चुप रह जाती क्योंकि उनसे उसे कोई शिकायत नहीं थी|
  गुस्सैल तो वह था ही, किन्तु हर हमेशे  मार-पीट का माहौल निहारिका को बरदाश्त नहीं होने लगा| अब तो वह किसी किसी रात घर भी नहीं आता था| वकील साहब की चिन्ता बढ़ती जाती थी| बेटे को समझाना चाहा, लेकिन उसका मन तो कहीं और उलझ गया था| वह निहारिका की ओर देखना भी पसन्द नहीं करता था| एक बार निहारिका का मन हुआ कि वह सब कुछ छोड़छाड़ कर वापस मैके चली जाए किन्तु संस्कार यह कदम उठाने की इजाजत नहीं दे रहे थे|
  एक दिन तो हद ही हो गई...वह नशे में धुत लड़खड़ाता हुआ आया और पत्नी को घर से निकल जाने का आदेश दिया| वह सकते में आ गई| उसने ससुर जी की ओर देखा| वकील साहब ने उसे समझाने की कोशिश की किन्तु वह कहाँ समझने वाला था| उसने उनके साथ भी बदतमीजी से बात की| निहारिका कुछ बोलना चाह रही थी तो नवाबज़ादे ने उसे जोर से धक्का मारा| अचानक हुए इस प्रहार को वह झेल नहीं पाई| गोद में मुन्ना भी था| दोनों ही औंधे मुँह गिर पड़े| उसने किसी तरह मुन्ने को तो बचा लिया किन्तु खुद उसका सर जमीन से टकरा गया| सर से खून निकलने लगा| मुन्ना बेतहाशा रोए जा रहा था|  माँ ने कुछ कहना चाहा तो उन्हें भी चुप कर दिया| परिस्थिति बेकाबू हो गई थी| वकील साहब बेटे की इस हरकत से बहू के सामने शर्मिन्दगी महसूस कर रहे थे| समय पर बेटे पर अंकुश न लगाने का परिणाम सामने था| उन्होंने डॉक्टर को बुलाया और बहू की मरहम पट्टी करवाई| डॉक्टर से उन्होंने झूठ बोल दिया कि वह सीढ़ियों से गिर गई है|
  अभी तक निहारिका ने अपने मैके में कुछ नहीं बताया था| किन्तु वह पढ़ी-लिखी लड़की थी| जहाँ तक हो सका उसने सहनशीलता दिखाई...किन्तु कब तक? यह सवाल उसके जेहन में बार-बार उठने लगे| मुन्ने के भविष्य का सवाल भी सामने था|
     उसने घर छोड़ने का फैसला ले लिया| अश्रुपूरित नजरों से उसने सास-ससुर से विदाई ली| वकील साहब के पास कहने के लिए कोई शब्द ही नहीं थे|
   निहारिका पिता के घर के दरवाजे पर खड़ी थी| उसे विश्वास था कि पिता जी उसका साथ देंगे| काँपते हाँथों से उसने कॉलबेल बजाया| दरवाजा पिता ने ही खोला| बेटी के सर पर बँधी पट्टी देखकर उनका कलेजा मुँह को आ गया| अनुभवी आदमी थे, पल भर में ही सारा माजरा समझ गए| बेटी को गले से लगा लिया|पिता का स्नेहिल स्पर्श पाते ही वह फूट पड़ी| उसने रोते-रोते सबकुछ बताया| पिता ने निर्णय सुना दिया कि अब वह उस हैवान के पास वापस नहीं जाएगी|
     इधर सारी दुनिया के लिए लड़ने वाले वकील साहब को अचानक सामने दोराहा नजर आने लगा| एक तरफ बेटा था तथा दूसरी ओर बहू और पोता| इसी उधेड़बुन में उन्हें सारी रात नींद नहीं आई थी| बेटा को घर छोड़ने के लिए कहें , दिल यह मानने को तैयार नहीं था| बहू जिसने कभी शिकायत का मौका नहीं दिया, उसे कैसे बेघर कर दें| उनका दिमाग काम नहीं कर रहा था| बहुत सोच-विचार कर उन्होंने फैसला ले लिया| पत्नी मानने को राजी न थी| उसे भी समझाया|
  वकील साहब बहू के मैके पहुँचे| निहारिका और उसके पिता ने आवभगत में कोई कसर नहीं रखा| वकील साहब ने कहा- बहू, घर चलने के लिए तैयार हो जाओ|
निहारिका ने पिता की ओर देखा|
पिता ने कहा- क्षमा कीजिए वकील साहब, मैं आपकी इज्जत करता हूँ किन्तु बेटी को न भेजूँगा| मुझे उसकी जान पर खतरा नजर आ रहा है| शार्ट टेम्पर्ड व्यक्ति कब क्या कर बैठे, इसका कोई ठिकाना नहीं| आप यहाँ आते-जाते रहें, पर निहारिका को न भेजूँगा|
   मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, ऐसा कुछ न होगा| मेरा घर बहू और पोते का है, अपने बेटे को मैंने घर से निकाल दिया है| निहारिका सम्मान के साथ वहाँ रहेगी|
   निहारिका के पिता अवाक् रह गए| ऐसा भी होता है कि बहू के सम्मान के लिए इकलौते बेटे को घर से निकाल दें| जिसने भी सुना वकील साहब के न्याय पर दाँतों तले ऊँगली दबाकर रह ग‌या| वकील साहब बहू और पोते को आदर के साथ घर ले आए| बहू अपने स्वभाव के अनुरूप घर को सँभालती हुई मान मर्यादा से रहने लगी| पोते को उन्होंने बहुत अच्छी शिक्षा दी| अब वह एक ऊँचे पद पर कार्यरत था| एक बार वकील साहब के बेटे ने घर आने की कोशिश की किन्तु पिता से दो टूक जवाब सुनकर वापस लौट गया|
धीरे-धीरे वकील साहब का शरीर वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहा था| निहारिका और मुन्ना जी जान से उनकी सेवा करते| कभी किसी भी काम के लिए उन्हें दोबारा नहीं बोलना पड़ता| वकील साहब की पत्नी बेटे के लिए दुखी रहती थी पर बहू और पोते से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी| समय बीता, मौत आनी थी, आई| वकील साहब का निधन हो गया| निहारिका निःशब्द रोए जा रही थी| उसे यही लग रहा था कि यदि उन्होंने सहारा नहीं दिया होता तो पिता के घर में वह जी जाती किन्तु एक बेचारी की तरह जिन्दगी हो जाती| माता-पिता बेटी को घर में रखकर समाज की आलोचना का शिकार बनते सो अलग| 
  अब दाह-संस्कार की बारी आई|वकील साहब का बेटा भी पिता के अन्तिम दर्शन के लिए मौजूद था| मुखाग्नि वही देना चाहता था| वकील साहब ने कह रखा था कि मरने के बाद उनकी वसीयत तुरत पढ़ी जाए और उस अनुसार ही काम किया जाए| वसीयत में यह लिखा था कि दाह-संस्कार का काम पोते के हाथो ही संपन्न हो| पत्नी के निधन के उपरांत सारी जायदाद निहारिका के नांम लिखी गई थी| जिसने भी सुना वकील साहब के न्याय पर दंग रह गया| अपने बेटे को छोड़ दूसरे की बेटी को सहारा देकर वकील साहब ने समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था|

ऋता शेखर मधु

सोमवार, 7 मई 2012

कहानी-चिता की आग




शाम गहराने लगी थी.रजनी अपने कमरे में खड़ी खिड़की से दूर आकाश ताक रही थी.परिंदे अपने बसेरों की ओर लौट रहे थे.उसने कमरे की बत्ती भी नहीं जलाई थी.शायद जलाना नहीं चाहती थी.मन की आँखें अँधेरे में ज्यादा स्पष्ट देख पाती हैं.जब से उसने पूर्णिमा से बातें की थी उसका मन किसी भी काम में नहीं लग रहा था.पूर्णिमा उसकी स्कूल की सहेली थी.दोनों के घर अगल बगल थे इसलिए एक दूसरे के घरों में भी आना जाना था.समय पर उनकी शादियाँ हुईं.विवाह के बाद कुछ दिनों तक चिट्ठियों से उनका सम्पर्क बना रहा.फिर वे अपनी गृहस्थियों में उलझ गईं और धीरे धीरे चिट्ठियों के आदान प्रदान कम होते गए.पिछले पंद्रह सालों से कोई सम्पर्क स्थापित नहीं हो पा रहा था क्योंकि उनके ठिकाने बदल चुके थे.

बच्चे बड़े हो चुके थे.रजनी की व्यस्तता कम हो गई थी.खाली समय का सदुपयोग करने के लिए उसने कंप्यूटर का सहारा लिया .नेट पर आते ही उसने फेसबुक पर सबसे पहले अपनी सहेली पूर्णिमा को खोजा.उसकी कोशिश कामयाब हुई और इस आधुनिक तकनीक के जरिए दोनों बिछुड़ी हुई सहेलियाँ मिलीं.एक दूसरे के मोबाइल नम्बर लिए गए.आज दोनों सहेलियों की जमकर बातें हुई थीं...अपने घर परिवार और बच्चों के बारे में ढेर सारी बातें.बातों के दौरान रजनी ने पूर्णिमा से उसकी बूआ के बारे में पूछा.पूर्णिमा एकदम से चुप हो गई.रजनी को यूँ लगा कि यह बात पूछकर उसने कोई बहुत बड़ी गल्ती कर दी हो.चूँकि वह पूर्णिमा के घर जाती थी और पूरे परिवार से उसे बहुत स्नेह मिलता था इसलिए उसने पूछा था.सबसे ज्यादा वह पूर्णिमा की बूआ को पसंद करती थी.बहुत ही हँसमुख और प्यार करने वाली थीं वह.

थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने जो कुछ भी बताया वह अकल्पनीय था.बूआ की शादी रजनी के सामने ही हो चुकी थी.साँवली पर तीखे नैन नक्श वाली बूआ दुल्हन के रूप में बहुत आकर्षक लग रही थीं.हँसमुख चेहरे की शोभा देखते ही बन रही थी.बारात दरवाजे लगी तो दूल्हे का रूप भी खूब निखर रहा था.सब बूआ की किस्मत सराहने लगे.सब कुछ हँसी-खुशी सम्पन्न हो गया.डोली चढ़कर दुल्हन ससुराल चली गई अपना नया घर बसाने.ससुराल में नई दुल्हन का खूब स्वागत हुआ.सारे रस्मो-रिवाज़ निभाने के बाद बारी आई फूफाजी के दोस्तों से मिलने की.पूरा कमरा दोस्तों से भरा था.इतने सारे दोस्त...बूआ के तो हाथ पैर फूलने लगे.मित्तभाषी बूआ के लिए यह परीक्षा की घड़ी थी.उन्होंने एक बार नज़र उठाकर देखा,मित्रमंडली में महिला मित्र भी शामिल थीं.एक एक करके सबसे परिचय हुआ. देर रात तक हँसी ठहाकों का दौर चलता रहा.बूआ अपने आप में सिमटी रहीं.यह सीधी सादी भारतीय लड़की शायद फूफा जी को बहुत पसंद नहीं आई थी.धीरे धीरे सब विदा हो चुके थे.अब कमरे में सिर्फ एक मित्र बची थी.फूफाजी ने उससे बूआ का खास परिचय करवाया.उस लड़की मिताली ने फूफाजी को बाहर जाने का आदेश दिया.फिर वह हँस हँसकर बातें करने लगी.अपनी बातों से उसने बूआ का दिल जीत लिया था.उस वक्त निष्कपट बूआ को कहीं से भी यह आभास नहीं हुआ कि वह आसतीन का साँप बनने की तैयारी में थी.इस तरह बूआ को अपने विश्वास में लेकर आराम से घर में आने जाने लगी.घर की शांति भंग न हो इसलिए घरवाले चुप थे.घर में उसकी पसंद मायने रखती थी.सभी शौपिंग में वह बूआ के साथ होती थी.
जब पूर्णिमा यह सब बता रही थी तब रजनी के मन में एक स्वभाविक प्रश्न आया.उसने पूछा, तब दादी और तेरी माँ क्या कर रही थीं.पूर्णिमा ने बताया कि दादी और माँ ने बूआ को समझाने की कोशिश की थी लेकिन पता नहीं किस  कारण से वह चुप थीं.शायद असुरक्षा की भावना थी.या हो सकता है फूफाजी ने कुछ कहकर धमका दिया हो जो वह कहना नहीं चाहती थीं. उन्हे लगता था कि जब फूफाजी उसके साथ खुश हैं तो वह क्यों टाँग अड़ाए.उनकी हरकतें कहीं से भी अशोभनीय नहीं थीं.इसी तरह दिन बीत बीत रहे थे.समय के साथ साथ उनके माँ बनने के बारे में कानाफूसी शुरू हो गई थी.चार साल बीतने पर भी उनकी गोद खाली थी.मायके वालों ने डाक्टर से दिखाना शुरू किया.जाँच मे हर कुछ सही पाया गया.फिर शुरु हुआ तानों और अत्याचारों का सिलसिला.बूआ सब कुछ मौन रहकर सहने लगी.उन्हें मालूम था कि यदि सच बता दिया तो भूचाल आ जाएगा.फूफाजी ने उन्हें धोखे से वह दवा खिला दिया था जिससे वह सात आठ सालों तक वह माँ नहीं बन सकती थीं.और इस साजिश में वह मिताली शामिल थी...यह बात उन्हें बाद में पता चली.मायके वालों को वह दुखी नहीं करना चाहती थीं...वहाँ पर फूफा जी ने अपनी साफ सुथरी छवि बना के रखा थी.

यह सिर्फ एक नमूना है...जितनी बातें पूर्णिमा ने बताईं वह बातें लिखी जाएँ तो पढ़ने वालों के रोंगटे खड़े हो जाएँ,जिस पर बीती उसकी स्थिति तो सोच से भी परे है.

बूआ ने मुँह से कुछ नहीं कहा पर उनका शरीर दिन प्रतिदिन दुर्बल होता गया और एक दिन वे इस दुनिया के कड़वे अनुभवों को समेट कर विदा हो गईं.उस दिन हल्की बूँदाबाँदी हो रही थी...श्मशान घाट पर फूफाजी को ही मुखाग्नि देनी थी.सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं.अचानक बगल की जलती चिता से एक चिंगारी उड़ी और बूआ की चिता की ओर बढ़ी. चिता धू धू कर जल उठी...फूफा जी देखते ही रह गए.
''इस तरह से बूआ ने मरने के बाद मुखाग्नि को अस्वीकार कर अपना मौन बदला ले लिया था...''यह कहते कहते पूर्णिमा इतनी जोर से रो उठी कि रजनी कुछ नहीं कह पाई.अभी भी वही बात और वही रुलाई उसके कानों में गूंज रही थी.

ऋता शेखर 'मधु'