ग़ज़ल... उस खामोश लड़की के लिए
शिकायत कर नहीं पाती ख़िलाफ़त कर नहीं पाती
कभी सीखा नहीं उसने सबक़ ये दाँव- पेचों का
सितम सहती मगर दिल से सियासत कर नहीं पाती
जमाने का कहर सहना गवारा भी नहीं उसको
जवाबों को पलटने की हिमाकत कर नहीं पाती
खता कोई करे तो मुस्कुरा के टाल देती है
कभी आहत अहं की खुद हिफ़ाजत कर नहीं पाती
धरोहर में मिली संदूक भर के सीख जो उसको
लुटाती है खुले हाथों रियायत कर नहीं पाती
-ऋता शेखर 'मधु'
-ऋता शेखर 'मधु'
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