सहनशीलता
होती है उसकी भी सीमा
मौन सहनशीलता नहीं
घातक बनती
तन मन दोनों के लिए
सहनशक्ति का पर्याय है धरती
पर क्या
अनवरत धूप से
दरारें नहीं फटतीं
निर्बाध बारिश से
उत्प्लावित नहीं होती
अंतस की अग्नि
ज्वालामुखी नहीं बनाती
बोलना
अपनी बातें समझाना
सहनशीलता की सीमा का
अतिक्रमण नहीं
अनर्गल बोलना
उद्दंडता से बोलना
हर बात में बोलना
परिधि पार करती हैं|
सही बात में चुप रह जाना
सर झुका तोहमतों को सह लेना
सहनशीलता नहीं
कायरता भी नहीं कह सकते
शायद संस्कार है
पर वैसे संस्कार का भी क्या
जो बना देती है
‘बेवकूफ’ और ‘बेचारा
कभी कभी मानसिक अपाहिज भी’|
ऋता शेखर ‘मधु’