कौम और मजहब की गिनती किसने गिनाई है
निर्दोष जन में अलगाव की आग किसने लगाई है
रोटी कपड़ा मकान की जरूरत है सभी को
अमीरी और गरीबी की रेखा किसने बनाई है
हवा की सरसराहटों में है खौफ़ का धुँआ
ख्वाबों की बस्ती में छा रही तन्हाई है
तीरगी में नूर-ए-अज़्म इस कदर चमका
अदब से जीस्त ने तज़ल्ली से हाथ मिलाई है
मुसव्विर की कारीगरी से आबाद है दुनिया
ऐ बशर, तू क्यों कर रहा उससे बेवफाई है
................ऋता