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मंगलवार, 15 मई 2012

'डेज़' से भरी टोकरी




सुबह सुबह
अलसाई सी आवाज़
मम्मा, आज कौन सा डे है
आज सन्डे है,अभी सो जाओ
वो वाला डे नहीं
स्पेशल वाला डे
ओ,अभी मालूम नहीं
सर्च करके बताती हूँ


डे डे डे
हर दिन मनता
कोई न कोई 'डे'
डे मनाने के पीछे
मानसिकता होती है
उसे बढ़ावा देने की
या उससे निजात पाने की
अर्थात् हर ''डे''
उनके नाम
जो आते हैं
''निरीह' की श्रेणी में

'विमेन्स डे'
महिला मतलब निरीह
'डाटर्स डे'
बेटियाँ मतलब निरीह
'मदर्स डे'
यह भी महिला
सम्माननीय
'चिल्डरेन्स डे'
बच्चों को 
संरक्षण की आवश्यकता
'एनवायरोन्मेंट डे'
पर्यावरण भी
इंसानो के कारनामों से
बन गया निरीह
आजकल हँसने की गुंजाइश नहीं
निरीह हँसी के लिए
''लाफ्टर्स डे''
प्यार जताने का समय नहीं
'वैलेन्टाइन्स डे' है ना!
बच्चों को बचाना है
खतरनाक श्रम से
'चाइल्ड लेबर डे'
एक दिन की बैठक
फिर बच्चे वहीं के वहीं
चौकलेट डे
स्लैप डे
हग डे
रोज़ डे
टेड्डी डे
फ्रेंडशिप डे
मतलब डे ही डे

पुरुष होते बलवान
इसलिए है नहीं
कोई भी डे
उनके नाम
किन्तु जब बनते
पति और पिता
वे भी होते निरीह
अर्थात्
'हस्बेन्ड्स डे'
'फादर्स डे'
:):):)

ऋता शेखर 'मधु'