आज विद्यालय में बहुत चहल पहल थी.ग्यारहवीं कक्षा का आज से क्लास शुरू होना
था.विद्यालय में बहुत सारे दूसरे स्कूलों से नए नए बच्चे आ रहे थे.स्कूल के
अनुशासन से छूटे हुए बच्चों के लिए थोड़ी थोड़ी आजादी का दिन था.लड़कों के लिए वही
साधारण ड्रेस था-फैंट शर्ट का किन्तु लड़कियों ने थोड़ी सीमा लांघी थी|दुपट्टे
वाली ड्रेस का स्थान जीन्स और छोटे छोटे
टॉप ने ले रखा था|
आदर्श बाबू उस विद्यालय के वरिष्ठ
शिक्षक थे.वे दूर से ही सभी बच्चों को देख रहे थे और परखने की कोशिश कर रहे थे.कुछ
लड़कियों के लिबास उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रहे थे.उस विद्यालय ने ड्रेस कोड
नहीं लगाया था इसलिए बच्चों को अपनी पसंद के कपड़े पहनने की छूट थी.दूसरे दिन
नोटिस बोर्ड पर एक नोटिस लगा था जिसमें लड़कियों के लिए सलवार कुर्ता और दुपट्टा
पहनना अनिवार्य रखा गया था.कुछ लड़कियों ने इस नियम का पालन किया किन्तु कुछ
विरोधी प्रकृति की लड़कियों ने बात नहीं मानी और छोटे टॉप में ही आईं.इसके लिए
आदर्श बाबू ने शिक्षिकाओं को कहा कि वे उन लड़कियों को समझाएँ.फिर सब कुछ सही हो
गया.
एक दिन एक लड़की स्कूल में आई.कहीं से भी उस लड़की के कपड़े शालीन नहीं कहे जा
सकते थे.उसे अपने पापा से कुछ काम था इसलिए वह प्रिंसिपल की अनुमति पर आफिस में ही
बैठ कर इन्तेजार करने लगी.कुछ देर में अन्य शिक्षक शिक्षिकाएँ भी अपने अपने क्लास
से छुट्टी पाकर ऑफिस में आ गए.उस लड़की के कपडों को लेकर कानाफूसी हो ही रही थी
तभी आदर्श बाबू आते दिखे.सभी इस बात के लिए तैयार हो गए कि उस लड़की की खैरियत नहीं है.किन्तु उस लड़की ने
आदर्श बाबू को पापा कहकर सम्बोधित किया.सबकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं.इसे आदर्श
बाबू ने भी समझा. सबके मन में एक ही सवाल था-पूरे विद्यालय को शालीन कपड़े पहनने
का पाठ पढ़ाने वाले आदर्श बाबू अपनी ही बेटी को क्यों नहीं सिखा सके?
ऋता शेखर ‘मधु’