| गूगल से साभार |
कैसे उतरूँ पार
भवसागर में हूँ फँसी, आओ तारणहार|
मुझे राह सूझे नहीं, कैसे उतरूँ पार|
कैसे उतरूँ पार, बहुत ही गहरा सागर|
पाना चाहूँ थाह, भर दो भक्ति से गागर|
बस तुम में ही आस, सुनो हे नटवर नागर|
खेना मेरी नाव, पार हो यह भवसागर||
ऋता शेखर 'मधु'
पहली बार ये छंद लिख रही हूँ|त्रुटियों के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ|
विद्वतजनों का मार्गदर्शन मिले तो आभार होगा और मैं इनमें सुधार कर पाऊँगी|